शनिवार, 22 मार्च 2025

बिहार की राजनीति और नीतीश कुमार: क्या अब समय है सम्मानजनक सेवानिवृत्ति का?

 बिहार की राजनीति और नीतीश कुमार: क्या अब समय है सम्मानजनक सेवानिवृत्ति का?


बिहार की राजनीति में बीते दो दशकों से एक ही चेहरा सत्ता के केंद्र में बना हुआ है—नीतीश कुमार। बार-बार पाला बदलकर मुख्यमंत्री बने रहने वाले नीतीश कुमार का हालिया अस्वस्थ्य रूप सार्वजनिक मंचों पर स्पष्ट दिखने लगा है। हाल ही में राष्ट्रगान के दौरान उनका असामान्य व्यवहार कई सवाल खड़े करता है। क्या यह महज एक संयोग था, या उनके गिरते स्वास्थ्य का संकेत?


नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा को देखें तो उन्होंने बिहार को कई बड़े फैसले दिए, लेकिन क्या अब उनकी कार्यक्षमता पहले जैसी बनी हुई है? एक मुख्यमंत्री का पद केवल राजनीतिक अस्तित्व बनाए रखने का माध्यम नहीं हो सकता, बल्कि यह एक जिम्मेदारी भी है—जिसके लिए शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह सक्षम होना जरूरी है।


क्या अब बिहार को नए नेतृत्व की जरूरत है?


यदि कोई ड्राइवर उम्रदराज़ हो जाए और उसकी सेहत ऐसी न रहे कि वह सुरक्षित रूप से गाड़ी चला सके, तो क्या उसे जबरदस्ती गाड़ी चलाने के लिए कहा जाएगा, या फिर उसे सम्मानजनक सेवानिवृत्ति देकर आराम करने दिया जाएगा? यही सवाल बिहार की राजनीति पर भी लागू होता है। क्या बिहार की जनता को अब एक नए, ऊर्जावान और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप सोचने वाले नेतृत्व की आवश्यकता नहीं है?


बिहार देश का एक महत्वपूर्ण राज्य है, जिसे नई ऊर्जा, नए विजन और तेज़ निर्णय लेने की क्षमता वाले नेतृत्व की जरूरत है। यदि कोई नेता अपनी शारीरिक स्थिति के कारण प्रभावी तरीके से शासन नहीं कर सकता, तो उसका पद पर बने रहना न केवल उसके लिए अन्यायपूर्ण है, बल्कि पूरे राज्य के लिए भी हानिकारक हो सकता है।


नीतीश कुमार का योगदान और आगे की राह


नीतीश कुमार ने बिहार में कई बड़े बदलाव किए, लेकिन यह भी देखना होगा कि उन्होंने बिहार को क्या दिया और बिहार से क्या लिया। उनका शासनकाल कई महत्वपूर्ण फैसलों के लिए जाना जाएगा, लेकिन अब समय आ गया है कि उनके काम का निष्पक्ष और तथ्यपरक मूल्यांकन हो। राजनीति में किसी भी व्यक्ति का योगदान महत्वपूर्ण होता है, लेकिन सत्ता में बने रहने की जिद अगर राज्य की प्रगति में बाधा बनने लगे, तो यह लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है।


इसलिए, बिहार के हित में और स्वयं नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए, अब उन्हें एक सम्मानजनक सेवानिवृत्ति देकर नई पीढ़ी को आगे आने का मौका देना चाहिए। उनके लिए शुभकामनाएं कि वे एक मार्गदर्शक की भूमिका में बिहार की राजनीति को नई दिशा दें, लेकिन अब बिहार को एक नए नेतृत्व की जरूरत है, जो इस राज्य को नए ऊंचाइयों तक ले जाए।


बिहार कोई प्रयोगशाला नहीं है, जहां सत्ता किसी व्यक्ति विशेष की महत्वाकांक्षा के लिए कुर्बान की जाए। यह समय है नए बिहार, नए नेतृत्व और नए भविष्य की ओर बढ़ने का।



अरुणेश कुमार

मंगलवार, 28 जनवरी 2025

IITian बाबा: अभय सिंह का दर्शन और अद्वितीयता

 


IITian बाबा अभय सिंह को समझना हर किसी के वश की बात नहीं है। उनकी सोच और विचारधारा इतनी गहन और तर्कसंगत हैं कि उन्हें समझने के लिए आपको अपनी पूर्वधारणाओं और सीमित सोच से ऊपर उठना होगा। ये एकमात्र ऐसे बाबा हैं, जो परंपरागत ढोंग से अलग हटकर सटीक और तार्किक बातें करते हैं। उन्हें समझने के लिए न सिर्फ तर्क-वितर्क के परे जाना होगा, बल्कि उस स्तर की सोच अपनानी होगी, जो साधारण इंसान के लिए मुश्किल है।


उनकी विदेहता राजा जनक जैसी है—जीते-जी मोक्ष को प्राप्त कर लेना। उनकी हंसी खुद पर नहीं, बल्कि हमारी मूर्खताओं पर है। उनका आध्यात्मिक और दार्शनिक ज्ञान इस समय अपने चरम पर है। शायद ही कोई और बाबा इस स्तर तक पहुंच पाया हो। यही कारण है कि कई लोग उनके पीछे पड़े हैं, लेकिन उनकी विदेहता के कारण उन्हें इन सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता।


द्वैत और अद्वैत के गूढ़ सिद्धांत को जिस सरलता से उन्होंने एक वाक्य में समझाया है, वह अद्भुत और अनूठा है। यदि इसे आप समझ पाए, तो न केवल मोक्ष को प्राप्त करेंगे, बल्कि स्वर्ग-नरक, इहलोक-परलोक और कर्मकांड के जाल से मुक्त हो जाएंगे।


बाबा के 2-3 इंटरव्यू सुनने का अवसर मिला। अधिकांश पत्रकारों में न तो उनकी गहराई को समझने की योग्यता है और न ही उनकी बातों को सही संदर्भ में प्रस्तुत करने की क्षमता। अगर इस बाबा को उचित मंच और समय मिला, तो यह न केवल भारतीय दर्शन को एक नई ऊंचाई पर ले जाएगा, बल्कि इसे वैश्विक स्तर पर स्थापित करेगा।


बाबा अभय सिंह का स्वागत कीजिए। यह न केवल आधुनिक दौर के लिए एक नई रोशनी हैं, बल्कि वह व्यक्ति हैं जो भारत के आध्यात्मिक और दार्शनिक धरोहर को दुनिया के सामने प्रभावी रूप से रख सकते हैं। समय का इंतजार कीजिए और देखिए कि यह यात्रा हमें कहां ले जाती है।


#IITianBaba #AbhaySingh



बुधवार, 16 अक्टूबर 2024

शरद पूर्णिमा

 शरद पूर्णिमा हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जिसे अश्विन माह की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इसे रास पूर्णिमा या कोजागरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। शरद पूर्णिमा को विशेष इसलिए माना जाता है क्योंकि इस दिन चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है और अपनी किरणों से धरती पर अमृत बरसाता है।


इस दिन से जुड़ी एक खास परंपरा है कि लोग रात में खुले आसमान के नीचे खीर रखते हैं, ऐसा माना जाता है कि चंद्रमा की किरणें इस खीर पर पड़ती हैं, जिससे उसमें औषधीय गुण आ जाते हैं। अगले दिन यह खीर प्रसाद के रूप में ग्रहण की जाती है।


शरद पूर्णिमा के साथ कई धार्मिक मान्यताएं भी जुड़ी हैं, जैसे इस दिन भगवान कृष्ण ने गोपियों के साथ रासलीला की थी। वहीं, इसे माता लक्ष्मी की आराधना के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है, खासतौर पर "कोजागरी व्रत" रखने वालों के लिए, जो रात भर जागकर मां लक्ष्मी से धन और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।


बुधवार, 21 सितंबर 2022

राहुल गांधी की पदयात्रा,भाजपा में खलबली

 राहुल गांधी की पदयात्रा,भाजपा में खलबली


जब राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा पर निकलने से पहले हल्ला बोल रैली किए।तब सबसे पहले लीटर और आटा का विवाद सामने आ गया।जैसे कुछ वर्ष पहले आलू से सोना वाला बयान को वारयल किया गया था।इस बार भी वीडियो को वायरल करने की कोशिश की गई।लेकिन भाजपा को बहुत बड़ी कामयाबी नहीं मिली।क्योंकि अब लोगों को बहुत ज्यादा पसंद नहीं आता। सच बात तो यही है भाजपा ने राहुल गांधी पर वार करने की कोई कसर नहीं छोड़ा है।और भाजपा को सबसे बड़ी कामयाबी भी मिली है।चाहे तो 2014 का चुनाव हो या 2019 का।लेकिन मुझे लगता है इस बार यानि 2024 के चुनाव ये वार काम नहीं आने वाला। भाजपा को अब कुछ और तरीके तलाशने होंगे। क्योंकि हाल ही जैसे ही भाजपा ने टी-शर्ट पर सवाल उठाया उसमें वो खुद फंसने लगी। जैसे ही भारत जोड़ो यात्रा को भारत छोड़ो कहने की कोशिश की गई।लेकिन दांव उलटी पड़ गयी।जैसे ही स्मृति ईरानी ने विवेकानंद को लेकर राहुल गांधी पर सवाल किया।लेकिन फिर से भाजपा की फजीहत हुई।

भारत जोड़ो यात्रा जैसे जैसे बढ़ रही है वैसे वैसे कई पुरानी यात्राओं का जिक्र सामने आ रहा है।चाहे वो राजीव गांधी की यात्रा हो,चाहे वो विनोद भावे की यात्रा हो ,चाहे वो पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की यात्रा हो। इन सारी यात्राओं को याद करने की वजह यह है को इन सारी यात्राओं के बाद भारत की सियासत में बदलाव हुए हैं। तो क्या कांग्रेस देश का माहौल बदलने में कामयाब होगी?

राहुल गांधी ने यात्रा की शुरुआत दक्षिण से किया है।दक्षिण वो कमजोर कड़ी है जहां पर भाजपा आज भी कमजोर है।तब जब वो अपने सबसे अच्छे दौर में है।हालांकि भाजपा को अनुमान है कि इस बार दक्षिण में बेहतर प्रदर्शन करेगी।भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का यह बयान नहीं भूलना चाहिए जब उन्होंने कहा था कि बीजेपी के अलावा कोई पार्टी इस देश में नहीं बचेगी।चाहे वो क्षेत्रीय दल हो या राष्ट्रीय। इस बयान का मतलब सिर्फ राजनीति ही हो सकता है। क्योंकि अगर कांग्रेस ख़त्म हो जाती है उसके बाद क्षेत्रीय दल भी खत्म हो जाएंगे फिर बचेगा कौन? कुछ दिन पहले शरद पवार ने भी कहा था कि जैसे जैसे कांग्रेस कमजोर हो रही है वैसे वैसे क्षेत्रीय दल मजबूत होती जा रही है।निश्चित तौर पर शरद पवार की बात सही भी लगती है जैसे अगर देखा जाए केजरीवाल की पार्टी एक क्षेत्रीय पार्टी है जिस तरह से उन्होंने दिल्ली से पंजाब तक विस्तार किया अब गुजरात में भी कोशिश कर रहे हैं। वैसे ही बंगाल में ममता बनर्जी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।हालांकि नीतीश कुमार और शरद यादव ने पहले ही कह दिया है कि कांग्रेस के बिना केंद्र की राजनीति सम्भव नहीं है।


दरअसल लोकसभा की राजनीति अलग क़िस्म की होती है।जहां दो दल आमने सामने होते हैं। जैसे एनडीए और यूपीए। आज के दौर में बीजेपी जितना मजबूत स्थिति में है उसके इर्दगिर्द भी कांग्रेस नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे एक जमाने में कांग्रेस भी हुआ करती थी। लेकिन एक सवाल यह भी है कि आज जिस स्थिति में बीजेपी है क्या वह अपने प्रदर्शन को बरकरार रख सकती है? यह अपने आप में बहुत बड़ा सवाल है। क्योंकि कांग्रेस को जितना खोना था उतना खो चुकी है।कांग्रेस के लिए इससे बुरी स्थिति क्या हो सकती है पार्टी के शीर्ष नेता ही पार्टी छोड़ कर जा चुके हो। चाहे वो गुलाम नबी आजाद हो या कपिल सिब्बल जैसे दिग्गज नेता।इसलिए देखा जाए तो कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं है। लेकिन फिलहाल बीजेपी को भरोसा है कि वो अपने प्रदर्शन को बरकरार रख सकती है।लेकिन फिर भी बीजेपी के लिए 2024 का चुनाव चुनौतीपूर्ण होने वाला है।


अरुणेश कुमार, चंपारण