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मंगलवार, 5 अप्रैल 2022

कांग्रेस का अध्यक्ष कौन ? गांधी परिवार या गैर-कांग्रेसी

 हाल ही में पाँच राज्यों का चुनावी नतीजे आए हैं।भाजपा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए प्रचंड जीत के साथ सरकार बनाई है।वहीं पंजाब में आम आदमी पार्टी पहली बार जबरदस्त जीत के साथ सरकार बनाई है।इसके साथ देश की सबसे पुरानी पार्टी को करारी हार का सामना पड़ा है।हार का कारण जो हो लेकिन कांग्रेस पार्टी के लिए अच्छी खबर नहीं है।

बीते कुछ विधानसभाओं पर नजर डाले तो कांग्रेस का प्रदर्शन काफ़ी निराशाजनक रहा है।बिहार से लेकर पश्चिम बंगाल और असम तक हर चुनाव में कांग्रेस पतन की ओर बढ़ रही है।इसे देखकर यह कहना उचित होगा कि कांग्रेस का चुनाव हारने का फार्मूला बहुत सफल रहा है।यही बात चुनाव परिणाम आने के बाद बीजेपी के युवा सांसद व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने भी कहा था "चुनाव कैसे हारते हैं ,ये कांग्रेस से सीखना चाहिए"।


दरअसल, कांग्रेस के इतिहास में एक साथ तीन नेता गांधी परिवार से सक्रिय राजनीति में है।ऐसे में पार्टी की ये हालात हो चुकी है कि आए दिन कांग्रेस डूबती जा रही है।पिछले दिनों करारी हार के बाद कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया पार्टी से इस्तीफा की पेशकश कर दी।इस्तीफा देते हुए कहा कि 'अगर हम तीनों यानी सोनिया गांधी ,राहुल गांधी और प्रियंका  गांधी से दिक्कत है तो हम कोई भी त्याग करने को तैयार हैं।हमारा मन बिल्कुल साफ है पार्टी के प्रति, पार्टी से बड़ा कोई नहीं।'

ऐसी प्रतिक्रिया तब आई जब कांग्रेस को 2014 के बाद लगातार हार का सामना करना पड़ रहा है।हालांकि कांग्रेस कमिटी ने अध्यक्ष के चुनाव तक अंतरिम अध्यक्ष बने रहने का अनुरोध किया।इसके साथ ही राजस्थान के मुख्यमंत्री समेत कई कांग्रेसी नेताओं ने राहुल गांधी को फिर से कांग्रेस की कमान संभालने की मांग की।


राजनीतिक पंडितों कहना है कि पार्टी अंदर की राजनीति से जब तक उबड़ नहीं पायेगी तब तक कांग्रेस पार्टी में अध्यक्ष पद का चुनाव नहीं होता।पार्टी के ही कुछ नेता जो राहुल और प्रियंका के समर्थन में मीडिया में बयान देते रहे हैं।यानी उनका कहना है कि कांग्रेस पार्टी का कमान इन दोनों के हाथ में होगा तो पार्टी बेहतर कर पायेगी।कार्यकर्ताओं में हिम्मत बढ़ेगी।

लेकिन राहुल गाँधी के राजनीति की बात करें तो उनका राजनीति ट्विटर से आगे नहीं बढ़ पाता।राहुल गांधी 2019 के  लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया था लेकिन इसके बावजूद भी पार्टी के कड़े निर्णय लेते नजर आए।जैसे पंजाब में मुख्यमंत्री बदलना और सिद्धू को प्रदेश अध्यक्ष बनाना ही पार्टी को डूबा दिया।

वहीं प्रियंका गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में सबसे करारी हार का सामना करना पड़ा।




हालांकि सच्चाई यहीं है कि सोनिया गांधी हो या कांग्रेस पार्टी के सदस्य सभी चाहते हैं कि राहुल गांधी को ही अध्यक्ष बनाना लेकिन पाँच राज्यों में करारी हार के बाद पार्टी का शीर्ष नेतृत्व व गांधी परिवार ही सवालों के घेरे में है।साथ ही एक साथ दो सवाल पार्टी में चल रही है।पहला राहुल गांधी को अध्यक्ष कैसे बनाया जाए? दूसरा, पार्टी को कैसे बचाया जाए?


शुक्रवार, 25 जून 2021

आपातकाल का इतिहास

 

25 जून 1975, भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में इस दिन को देश के सबसे दुर्भाग्यपूर्ण दिन की संज्ञा दी जाती है. 46 साल पहले आज के ही दिन देश के लोगों ने रेडियो पर एक ऐलान सुना और पूरे देश में खबर फैल गई कि सारे भारत में अब आपातकाल की घोषणा कर दी गई है. 46 साल के बाद भले ही देश के लोकतंत्र की एक गरिमामयी तस्वीर सारी दुनिया में प्रशस्त हो रही हो, लेकिन आज भी अतीत में 25 जून का दिन डेमॉक्रेसी के एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है. 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 के बीच देश में 21 महीने तक आपातकाल लगाया गया. तत्कालीन राष्ट्रपति फख़रुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के अधीन देश में आपातकाल की घोषणा की थी. 25 जून और 26 जून की मध्य रात्रि में तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के हस्ताक्षर करने के साथ ही देश में पहला आपातकाल लागू हो गया था. अगली सुबह समूचे देश ने रेडियो पर इंदिरा की आवाज में संदेश सुना था, 'भाइयो और बहनो, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है. इससे आतंकित होने का कोई कारण नहीं है.'

अभिव्यक्ति का अधिकार तो छिना ही जीवन का अधिकार तक गया
आपातकाल की घोषणा के साथ ही सभी नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे. अभिव्यक्ति का अधिकार ही नहीं, लोगों के पास जीवन का अधिकार भी नहीं रह गया था. 25 जून की रात से ही देश में विपक्ष के नेताओं की गिरफ्तारियों का दौर शुरू हो गया था. जयप्रकाश नारायण, लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी, जॉर्ज फर्नाडीस आदि बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया गया था. जेलों में जगह नहीं बची थी. आपातकाल के बाद प्रशासन और पुलिस के द्वारा भारी उत्पीड़न की कहानियां सामने आई थीं. प्रेस पर भी सेंसरशिप लगा दी गई थी. हर अखबार में सेंसर अधिकारी बैठा दिया गया, उसकी अनुमति के बाद ही कोई समाचार छप सकता था. सरकार विरोधी समाचार छापने पर गिरफ्तारी हो सकती थी. यह सब तब थम सका, जब 23 जनवरी 1977 को मार्च महीने में चुनाव की घोषणा हो गई.

न्यायपालिका से टकराव बना आपातकाल की पृष्ठभूमि
लालबहादुर शास्त्री की मौत के बाद देश की प्रधानमंत्री बनीं इंदिरा गांधी का कुछ कारणों से न्यायपालिका से टकराव शुरू हो गया था. यही टकराव आपातकाल की पृष्ठभूमि बना था. आपातकाल के लिए 27 फरवरी, 1967 को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने बड़ी पृष्ठभूमि तैयार की. एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सुब्बाराव के नेतृत्व वाली एक खंडपीठ ने सात बनाम छह जजों के बहुमत से से सुनाए गए फैसले में यह कहा था कि संसद में दो तिहाई बहुमत के साथ भी किसी संविधान संशोधन के जरिये मूलभूत अधिकारों के प्रावधान को न तो खत्म किया जा सकता है और न ही इन्हें सीमित किया जा सकता है.

रायबरेली चुनाव निरस्त होने से खफा हो गई थीं इंदिरा गांधी
1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी ने अपनी पार्टी को अभूतपूर्व जीत दिलाई थी और खुद भी बड़े अंतर से जीती थीं. खुद इंदिरा गांधी की जीत पर सवाल उठाते हुए उनके चुनावी प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने 1971 में अदालत का दरवाजा खटखटाया था. संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर इंदिरा गांधी के सामने रायबरेली लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ने वाले राजनारायण ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया है. मामले की सुनवाई हुई और इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त कर दिया गया. इस फैसले से आक्रोशित होकर ही इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाने का फैसला किया. इंदिरा गांधी इतना क्रोधित हो गई थीं कि अगले दिन ही उन्होंने बिना कैबिनेट की औपचारिक बैठक के आपातकाल लगाने की अनुशंसा राष्ट्रपति से कर डाली, जिस पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने 25 जून और 26 जून की मध्य रात्रि में ही अपने हस्ताक्षर कर डाले और इस तरह देश में पहला आपातकाल लागू हो गया.

आपातकाल में हर कदम पर संजय के साथ थीं मेनका
इंदिरा गांधी के प्राइवेट सेक्रेटरी रहे दिवंगत आरके धवन ने कहा था कि सोनिया और राजीव गांधी के मन में आपातकाल को लेकर किसी तरह का संदेह या पछतावा नहीं था. और तो और, मेनका गांधी को आपातकाल से जुड़ी सारी बातें पता थीं और वह हर कदम पर पति संजय गांधी के साथ थीं. वह मासूम या अनजान होने का दावा नहीं कर सकतीं. दिवंगत आरके धवन ने यह खुलासा एक न्यूज चैनल को दिए गए इंटरव्यू में किया था. धवन ने बताया था कि पश्चिम बंगाल के तत्कालीन सीएम एसएस राय ने जनवरी 1975 में ही इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाने की सलाह दी थी. आपातकाल की योजना तो काफी पहले से ही बन गई थी. धवन ने बताया था कि तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को आपातकाल लागू करने के लिए उद्घोषणा पर हस्ताक्षर करने में कोई आपत्ति नहीं थी. वह तो इसके लिए तुरंत तैयार हो गए थे. धवन ने यह भी बताया था कि किस तरह आपातकाल के दौरान मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाकर उन्हें निर्देश दिया गया था कि आरएसएस के उन सदस्यों और विपक्ष के नेताओं की लिस्ट तैयार कर ली जाए, जिन्हें अरेस्ट किया जाना है. इसी तरह की तैयारियां दिल्ली में भी की गई थीं.

पहले इस्तीफा देने को तैयार थीं इंदिरा
धवन ने कहा था कि आपातकाल इंदिरा के राजनीतिक करियर को बचाने के लिए नहीं लागू किया गया था, बल्कि वह तो खुद ही इस्तीफा देने को तैयार थीं. जब इंदिरा ने जून 1975 में अपना चुनाव रद्द किए जाने का इलाहाबाद उच्च न्यायालय का आदेश सुना था, तो उनकी पहली प्रतिक्रिया इस्तीफे की थी और उन्होंने अपना त्यागपत्र लिखवाया था. उन्होंने कहा था कि वह त्यागपत्र टाइप किया गया लेकिन उस पर हस्ताक्षर कभी नहीं किए गए. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी उनसे मिलने आए और सबने जोर दिया कि उन्हें इस्तीफा नहीं देना चाहिए