लेखक नीलोत्पल मृणाल की ये तीसरी किताब है, पहली दो किताब भी मैने पढ़ी है, तीनो किताब बिल्कुल अलग ही विषय वस्तु को आधार बना कर लिखी गई है।
यार जादूगर है गांव-कस्बों में रहते किरदारों की कहानी, व्यवस्था की कहानी, जीवन के सार की कहानी। सार का मतलब सामाजिक व्यवस्थाओं पर व्यंग्य से लेकर जीवन के अध्यात्म तक का यह पूरा पैकेज है। इसके पात्र हंसाते हैं लेकिन उनकी व्यंगात्मक शैली वर्तमान पर चोट भी करती है। किसी सीरियल की तरह दिमाग़ में दृश्य बनते जाते हैं।
प्रस्तुति अद्भुत है, शब्दो और मुहावरों का प्रयोग अति सुंदर है
पात्रों की भाषा, आम बोलचाल की भाषा है जिसे ठेठ बिहारी कह सकते हैं।
किताब के कुछ व्यंग्य हमें पिछली किताबों के नीलोत्पल मृणाल की याद दिला देते हैं।
अंत में इतना ही कहूंगा कि अगर नए लेखकों में दिलचस्पी रखते हैं तो इस किताब को पढ़ लेने में कोई गुरेज नहीं है।

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