गुरुवार, 6 मई 2021

चौरासी : सत्य व्यास

 किताब : चौरासी

लेखकः सत्य व्यास

प्रकाशकः हिंद युग्म
पृष्ठः 160
मूल्यः 150 रुपए


सत्य व्यास के द्वारा लिखी गई 'चौरासी' में ऋषि और मनु की प्रेम कहानी है।1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के निधन के पश्चात हुए दंगों का विवरण हमें इस पुस्तक में देखने को मिलता है।कैसे अपने ही पड़ोसी और जान पहचान के लोग हमारे विरुद्ध खड़े होने पर उतारू हो गए, यह देखने को मिलता है।कैसे पूरे सिख समुदाय पर नरसंहार शुरू हो गई थी? किस प्रकार किताब का नायक ऋषि हिंसक दंगो से अपने प्रेमी के परिवार को बचाता है? जबकि कि वह स्वयं दंगाई था।किरदारों की बात करें तो किरदार ज़्यादा नहीं हैं. मनु, ऋषि, छाबड़ा साहब मुख्य हैं।मनु का किरदार काफी मज़बूत है. तमाम परिस्थितियों में भी कहीं से भी कमज़ोर नहीं होता।
सत्य व्यास ने प्रेम और हिंसा यानी दोनों ध्रुवों को गजब के संतुलन में लिखा है।एक तरफ जहां प्रेम/प्रेमिका के पहले स्पर्श को दर्शाता है तो दूसरी तरफ हिंसक दंगो के सामने खड़ी मौत से रूबरू कराता है।
कुल मिलाकर इस किताब के बारे अपने शब्दों में कहूँ तो  प्रेम भी है, देश भी है, विद्रोह भी है, लाचारी भी  है, मानवता के साथ स्वार्थ भी है, राजनीति भी है।भारत देश की एक छवि भी है।जिसे लेखक ने अपनी कलम से उस खूबसूरती को पिरोया है।
किताब की भाषा की बात करें तो हमेशा की तरह नई वाली सरल हिंदी है. पढ़ने में मज़ा आता है. किताब सीधे-सीधे पढ़ी जा सकती है. एक बार में खत्म की जा सकती है।


किताब के कुछ लाइनें, जिसका जिक्र जरूरी है


“प्रेम की किस्मत में  आज भी सीढ़ियां नहीं होती, लिफ्ट नहीं होती, एस्केलेटर नहीं होते, आज भी दरिया, वो भी आग वालों से ही गुज़ारना  पड़ता  है .”

“दुनिया का समस्त ज्ञान व्यर्थ है, यदि स्त्री के मन को नहीं पढ़ पाता.“

“अफ़वाह की सबसे विनाशकारी बात यह होती है कि यह नसों में लहू की जगह नफ़रत दौड़ाती है.”

“अदला-बदली पत्रोँ की ही नहीं, पीड़ाओं की भी होती है.” “लड़की जब अपने सपनों के साथ निकलती है तो सबसे ज्यादा सुरक्षा अपने सपनों की ही करती है.” “राह भर ही नहीं, रात भर मुस्कराती रही.”



सोमवार, 3 मई 2021

तो क्या प्रधानमंत्री मोदी की हार हुई?

 बंगाल चुनाव के बाद राजनीतिक बुद्धिजीवियों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी हार गए हैं।तो क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हार गए हैं? दरअसल हकीकत यह है कि एक प्रदेश की महिला मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के पूरी झुंड को बहुत जोरदार पटखनी दी है।ममता बनर्जी ने प्रचंड जीत हासिल की है।पिछ्ली बार से ज्यादा सीटें हासिल की है।बंगाल में कोई मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं था अगर जीत होती तो मोदी जी की होती।यानि बंगाल चुनाव के मुख्य चेहरा मोदी ही थे।अब अगर हार हुई है तो हार सेहरा भी मोदी जी पर ही बांधा जाना चाहिए।अब सवाल यह है कि बंगाल चुनाव में हार का ठिठरा किस पर फूटेगा? मोदी जी हर चुनाव में प्रधानमंत्री पद भूलकर प्रचारमंत्री बन जाते हैं।मुझे लगता है इस बात केलिए उनकी  तारीफ़ भी की जानी चाहिए कि वो अपनी पार्टी के जीत केलिए सबसे ज्यादा मेहनत करने वाले प्रधानमंत्री हैं।मतलब मोदी जी हैं तो भाजपा है।पार्टी के छोटे से छोटे काम भी मोदी जी के ही कंधे पर है।पार्टी में मोदी की छवि ऐसी हो गई है कि अब मोदी जी को मुख्यमंत्री बनाने की मशीन कहे जाने में कोई गुरेज़ नहीं होना चाहिए।मोदी जी जहाँ जाते हैं उधर से जीत हासिल करके ही आते हैं लेकिन बंगाल में ममता बनर्जी ने मोदी जी का जीत अभियान रोक दिया है।यह कहने में भी गुरेज नहीं होगा कि बंगाल चुनाव परिणाम के बाद मोदी जी के व्यक्तिगत छवि का नुकसान हुआ है। अब तक पार्टी एवं कार्यकत्ताओं केलिए मोदी जी किसी फरिश्ते से कम नहीं थे।लेकिन अब  देशवासियों के नजर से उतरते जा रहें हैं। इसके कई कारण हैं मेरे नजर में पहला कारण किसान आंदोलन।क्योंकि याद होगा किसान आंदोलन को भाजपा ने आतंकियों अड्डा बताया था।इसके बाद भी प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी।दूसरा कारण कोरोना जैसे आपदा के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने बंगाल चुनाव केलिए  जिस तरह से अपने कर्तव्य, अपनी जिम्मेदारियों को भुला।उससे देशवासियों के नजर में और गिर गए हैं।लोगों में यह संदेश साफ तौर पर पहुंचा है कि आये दिन लोग   हजारों की संख्या में मरते जा रहे थे लेकिन मोदी चुनाव में व्यस्त थे।एक के बाद एक तारातरा रैली करते जा रहे थे।लाखों की संख्या में उनकी रैलियों में लोग पहुँच रहे थे।वो भी बिना मास्क और बिना किसी सोशल डिस्टेंस के।जो खुद कहते हैं कि जब तक दवाई नहीं तब तक ढिलाई नहीं।दो गज-दूरी मास्क है जरूरी।जो खुद कहते हैं कि घर में रह कर ही कोरोना को हराया जा सकता है।लेकिन उन्होंने अपनी कही बात को एक बार फिर जुमला साबित कर दिया है।यह बात कहने में कही से संकोच नहीं कि जानी चाहिए देश के प्रधानमंत्री ने अपनी ही फायदे केलिए अपने ही देशवासियों को कोरोना के मुँह में झोंक दिया।लाशों की जाल बिछा दीं।इस कोरोना महामारी में जिन लोगों ने अपनों को खोया है।जिनको अस्पताल में जगह नहीं मिली।जिन्होंने ऑक्सीजन के बिना अपना प्राण त्याग दिया।जिनलोगों को दवाई नहीं मिली।जिनलोगों को शमशान में दो-दो-तीन-तीन दिन लाईन में लगानी पड़ रही थी।जिन लोगों को शमशान में लकड़ियां नहीं मिली।वो लोग तो प्रधानमंत्री की चुपड़ी - चुपड़ी बातों से मनने वाले तो नहीं हैं।

लोग अब तक प्रधानमंत्री की हर बात मानते आए हैं चाहें वो नोटबन्दी हो ,ताली-थाली बजाना हो,दिया जलाना हो,पूरे देश में ताला बंदी करनी की बात हो।

मेरा मानना है बंगाल में केवल भाजपा की हार नहीं हुई है।बल्कि देश के अभिभावक,बड़े बुजुर्ग घर के सदस्य के तौर पर इनकी छवि धूमिल हुई है।चाहे वो टैगोर वाली छवि ही क्यों न हो। स्वघोषित प्रधानसेवक की छवि भी धूमिल हुई है।



शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

सरकारें मर चुकी है।

 "उत्तर प्रदेश प्राथमिक शिक्षक संघ ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, राज्य चुनाव आयोग और बेसिक शिक्षा मंत्री को लिखे पत्र में बताया है कि पंचायत चुनाव ड्यूटी के दौरान कोरोना संक्रमित हुए 706 प्राथमिक शिक्षकों और बेसिक शिक्षा विभाग के कर्मचारियों की जान गई है. संघ ने मतगणना टालने की मांग की है."

        हे भगवान!क्या हो रहा है इस देश में?अब तो सरकार नाम से ही घिन आती है।जनता के वोट से पालने वाली सरकार इतना मक्कार हो सकती है।एक के बाद एक मौत होती जा रही है लेकिन सरकार को सिर्फ चुनाव से मतलब है।चाहे वो चुनाव लाशों के ढ़ेर पर ही क्यों न हो?लानत है ऐसी सरकार और मतलबफरोस नेतागण जो चुनाव केलिए इस देश को श्मशान बना दिया है।क्या जरूरी है चुनाव कराना?क्या जरूरी है मतगणना करना? जब पता है कि सैकड़ो मतदानकर्मियों की मौत हो चुकी है।लेकिन फिर भी ये सरकार सोयी हुई है।अब भी समय है प्रधानसेवक जी यूपी (पंचायत चुनाव) समेत पांच राज्यों के मतगणना को रोक दीजिए।नहीं तो आगे क्या होगा? अब  भगवान ही मालिक हैं।

अगर अब भी सरकार चुप रहती है और मतगणना कराई जाती है तो हमें यह समझ लेना होगा कि सरकारों को आपके जान से कोई लेना देना नहीं है।आप सरकार के लिए सिर्फ संख्या मात्र हैं।इनको लाशों के ढ़ेर में चुनाव लड़ने में कई दिक्कत नहीं है।

आपको याद होगा हाल ही में मद्रास हाईकोर्ट ने कहा था कि चुनाव आयोग ने रैली क्यों नहीं रोकी? कोर्ट ने चुनाव आयोग को गैर-जिम्मेदार संस्था भी कहा था एवं इसके अधिकारियों पर हत्या का मामला चलाना चाहिए।लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह मामला चलायेगा कौन? क्योंकि इसके पीछे तो सरकार ही खड़ी है।



Arunesh Kumar

गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

आप प्रधानमंत्री हैं प्रचारमंत्री नहीं

 हे महाराज! चुनाव आप अपने देश में लड़ते हो तो यहीं लड़ो न।क्यों दूसरे देश में जाकर प्रचार करते हैं? इससे बनी बनाई रिश्ते खराब होते हैं।लीजिए बाइडेन ने भी कह दिया कि अब हम भारत को वैक्सीन बनाने वाले कच्चे माल नहीं देंगे।आपको तो सिर्फ चमचागिरी करना था।अबकी बार ट्रम्प सरकार-अबकी बार ट्रम्प सरकार।तो कीजिए एक के बाद एक रैली।इसलिए कहते हैं लुबुर-लुबुर करने से छवि ही खराब होती है।लेकिन ये बात आपको तोसमझ आएगी भी नहीं।

पिछले साल आप ट्रम्प को हाइड्रोऑक्सीड भेज रहे थे।दे- दना- दन भेजते जा रहे थे।लेकिन अंत में क्या हुआ कूटनीति सब धरे-के-धरे रह गया।

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

ऐसे में जनता क्या करें?

 हमें लगता है भारतीय नेताओं जैसी घोषणा दुनिया के किसी देश के नेता नहीं करते होंगे।घोषणा करके लोगों का ध्यान भटकाना कोई भारतीय नेताओं से सीखें।इस समय, जब देश को सबसे ज्यादा जरूरत अस्पतालों में ऑक्सीजन, बेड, दवाई ,डॉक्टर्स एवं अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की है, तब हमारे देश के नेतागण इस पर ठोस बात न करके एक मई से अठारह (18) वर्ष के ऊपर सभी लोगों को टीका लगाने की घोषणा कर रहें। भला यह कैसे होगा? इसका अभी तक कोई खाका तैयार नहीं किया गया। अमेरिका जैसे देश की आबादी हमारे देश की चौथाई भर है इसके बावजूद भी वहां टीके बनाने वाले कई कम्पनियां हैं।उसने अब जाकर सभी युवाओं को टीका देने की शुरुआत की है।मगर अपने यहां तो सिर्फ दो ही कम्पनियां है,जो सीमित मात्रा में टीके का उत्पादन कर रही है।हालांकि कुछ टीके का आयात करने का फैसला भी किया गया है लेकिन यह कब तक सम्भव होगा, पता नहीं।ऐसे में यह सवाल बड़ा गंभीर है कि  जब हम 45 साल के ऊपर वाले सभी लोगों को टीका नहीं दे पा रहे हैं, तो लगभग 70 करोड़ नई आबादी केलिए कहां से टीका आएगा? ऐसे तो पूरे देश में अफरा-तफरी मच जायेगी।

दूसरी स्थिति यह है कि जिन वरिष्ठ नागरिकों के टीके की दूसरी खुराक  नहीं मिल पा रही है,जिनके टीकाकरण का वक्त आगया है।समस्या यह हो चुकी है कि अस्पतालों में न टीके उपलब्ध हैं न इसकी आस-पास कोई व्यवस्था हो पा रही है।हालात तो ऐसे हो गए हैं कि बुजुर्ग लोग अस्पताल जा रहे हैं लेकिन टीका उपलब्ध न होने के कारण लौटकर  आ जा रहे हैं। ऐसे में बुजुर्ग क्या करें? कोरोना के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए हर अस्पताल के चक्कर भी नहीं लगाए जा सकते हैं।यानी कोरोना के मरीज लगातार बढ़ रहें हैं।लेकिन सरकार टीकाकरण अभियान का उचित प्रबंधन नहीं कर पा रही है।जहां भी कमियां सामने आ रही है,वहां हमारी सरकार को पूरी मुस्तैदी से काम करना चाहिए।लेकिन आलम यह है कि आज देश में कोरोना से कम लेकिन सरकार की व्यवस्था के कारण ज्यादा लोग मर रहें।



अरुणेश कुमार,

सोमवार, 19 अप्रैल 2021

बिहार के स्वास्थ्य व्यवस्था

 कोरोना वायरस लगातार बढ़ रहा है. बढ़ता कोरोना एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल रहा है. बिहार की राजधानी पटना में इलाज न मिलने से कई मरीजों की मौत हुई है. राजधानी पटना के सबसे बड़े दूसरे अस्पताल NMCH में कोरोना संक्रमित मरीजों की हो रही लगातार मौत से पीड़ित परिजनों में खासा आक्रोश है. पटना में कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच NMCH अस्पताल में सभी बेड भर गए हैं. अस्पताल के बाहर एम्बुलेंस में पड़े मरीज की मौत होने से परिजनों का रो-रो कर बुरा हाल है.

 

बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था हो या शिक्षा व्यवस्था आए दिन सवालों  के घेरे में रहता है।हैरानी तो तब हुई जब NMCH के सुपरिटेंडेंट ने सरकारी व्यवस्था के कारण इस्तीफे की पेशकश कर दी।कारण यह था कि अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी होई गई थी।सुपरिटेंडेंट के सभी प्रयास विफल हो रहे थे,अंत में इस्तीफे की पेशकश कर दी।

अफवाहों से बचे

 जब से कोरोना का कहर भारत मे शुरू हुआ है,तब से संक्रमण तो फैला ही है,पर उससे कहीं ज्यादा अफवाहें फैली है।कई तरह की बात सोशल मीडिया पर की जा रही है।खानपान से लेकर इलाज संबंधी जानकारियां लोगों द्वारा शेयर की जा रही है , अब इसमें कितनी सच्चाई है कोई नहीं जानता।अब एक बात तो स्पष्ट हो चुकी की जैसे जैसे कोरोना का संक्रमण बढ़ते जा रहा है वैसे वैसे झोला छाप डॉक्टरों की संख्या भी बढ़ती जा रही है।अब एक उदाहरण मास्क का ही ले लीजिए। चुनावी रैलियों में तमाम तस्वीरें दिखाकर मज़ाज बनाया जा रहा है।लोग तो यह कहने लगे हैं कि जहां चुनाव है वहां कोरोना नहीं है।वैसे लोगों को समझना चाहिए कि राजनीतिक दल तो अपनी अपनी सियासी रोटियां सेंककर निकल जाएंगे,लेकिन बाद में झेलना तो जनता को ही है।इसलिए अपनी सुरक्षा का ख़्याल रखना प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है।हमें ऐसी अफवाहें पर ध्यान न देते हुए कोरोना से बचाव के उपाय करने चाहिए।

शनिवार, 10 अप्रैल 2021

नैना : संजीव पालीवाल

 किताब : नैना -'एक मशहूर न्यूज एंकर की हत्या'

लेखक : संजीव पालीवाल

प्रकाशक : एका (वैस्टलैंड)

पृष्ठ : 272


'नैना' मर्डर मिस्ट्री पर आधारित लेखक और साहित्यकार संजीव पालीवाल की पहली उपन्यास है।इस किताब की कहानी नेशनल चैंनल के न्यूज़ एंकर के जीवन पर आधारित है।जिसका नाम नैना वशिष्ठ है।नैना एक खुशमिजाज लड़की है जिसको  अपने जीवन में करियर को लेकर  खुद को केंद्रित रहना ज्यादा पसंद है।नैना अपने जीवन में ऊंचाईयों पर जाने की चाह रखती है।उसकी हर वो सपना साकार होता है जो वो करना चाहती है। उसकी ज़िन्दगी में रुतबा, पैसा सब कुछ है। लेकिन एक रोज़ उसका कत़्ल हो जाता है। शक नैना के पति समेत दो लोग पर जाता है।लेकिन क़त्ल कौन करता है? ये तो किताब पढ़ने के बाद ही पता चलेगा। इस किताब में सबसे मजेदार तब लगती है जब नैना की मौत एक दिन पहले हो जाती है।लेकिन जब कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है सस्पेंस बढ़ते जाता है।  


लेखक ने बताने की कोशिश की है टीवी के चकाचौंध के पीछे की हकीकत कैसी होती है? कैसे ज़िन्दगी दौड़ती है, जिसमें आप इतनी तेज़ होते हैं कि वक्त पीछे छूटता सा लगता है। टीवी न्यूज़ चैनलों की दुनिया में क्या घटता है, कोई घुटता है, कैसे होता है वो सब जो हम बाहर से नहीं जान पाते, और किस तरह वो उसे महसूस करते हैं जो उस शोहरत भरी ज़िन्दगी को जी रहे हैं।

इस कहानी के जरिए टीवी की चकाचौंध की सच्चाई जाने पढ़कर चौंक सकते हैं।यह किताब में आजकल के समाज के रिश्तों को भी बयाँ करती है।

कुल मिलाकर इस किताब की कहानी रोचक और रहस्यमयी है।किताब की भाषा सरल और साधारण होने के कारण पाठक को अंत अंत बांधे रहता है।

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

इंडियन एक्सप्रेस की यह रिपोर्ट बेरोजगारी केलिए चिंता का विषय

 

कोरोना महामारी के बीच अनियोजित तरीके से लागू किए गए लॉकडाउन के चलते करोड़ों की संख्या में दिहाड़ी मजदूर अपने गांवों की ओर लौटने को मजबूर हुए थे. ऐसे में ग्रामीण रोजगार योजना मनरेगा उनकी आजीविका का एकमात्र जरिया बना.
साल 2006-07 में मनरेगा की शुरूआत के बाद से पहली बार ऐसा हुआ है कि इस योजना के तहत किसी एक वित्तीय वर्ष (2020-21) में 11 करोड़ से अधिक लोगों ने कार्य किया है. यह रिपोर्ट दिखाता है कि लॉकडाउन के कारण बेरोजगारी कितना चिंता जनक है।

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, एक अप्रैल तक के आंकड़ों के मुताबिक 2020-21 में 11.17 करोड़ लोगों ने कार्य किया, जो 2019-20 में कार्य किए 7.88 करोड़ लोगों की तुलना में 41.75 फीसदी अधिक है.

उपलब्ध आंकड़े दर्शाते हैं कि इससे पहले 2013-14 से 2019-20 के बीच 6.21 करोड़ से 7.88 करोड़ लोगों ने मनरेगा के तहत रोजगार प्राप्त किया था.

वहीं यदि परिवारों के आंकड़ों को देखें तो वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान सबसे ज्यादा 7.54 करोड़ परिवारों ने मनरेगा में काम किया. यह 2019-20 में काम किए 5.48 करोड़ परिवारों की तुलना में 37.59 फीसदी अधिक है. इससे पहले सबसे ज्यादा परिवारों द्वारा मनरेगा में काम करने का रिकॉर्ड वर्ष 2010-11 का था, जब 5.5 करोड़ परिवारों ने काम किया था.

इसके साथ ही 2020-21 में सबसे ज्यादा 68.58 लाख परिवारों ने मनरेगा में 100 दिन के लिए काम किया, जो कि इससे पहले 2019-20 में 40.60 लाख परिवारों द्वारा पूरा किए गए 100 दिन के कार्य की तुलना में 68.91 फीसदी अधिक है.

कुल मिलाकर वित्त वर्ष 2020-21 में प्रति परिवार ने औसतन 51.51 दिन काम किया, जो कि इससे पहले 2019-20 में 48.4 दिन की तुलना में थोड़ा अधिक है.

याद हो कि कोरोना वायरस के चलते उत्पन्न हुए अप्रत्याशित संकट के समाधान के लिए मोदी सरकार ने ‘आत्मनिर्भर भारत योजना’ के तहत मनरेगा योजना के बजट में 40,000 करोड़ रुपये की वृद्धि की थी.

इस तरह पूर्व में निर्धारित 61,500 करोड़ रुपये को मिलाकर मौजूदा वित्त वर्ष 2020-21 के लिए मनरेगा योजना का बढ़कर 1.01 लाख करोड़ रुपये हो गया. किसी वित्त वर्ष के लिए यह अब तक का सर्वाधिक मनरेगा बजट था.

बुधवार, 24 मार्च 2021

अक्टूबर जंक्शन : दिव्य प्रकाश दुबे

 

अक्टूबर जंक्शन दिव्य प्रकाश दुबे की एक ऐसी किताब है। जिसकी कहानी दिल और दिमाग में चढ़ते जाता है
कहानी बनारस से शुरू होती है जहाँ चित्रा और सुदीप धोखे से एक-दूसरे से मिलते हैं और दुनिया की एक खूबसूरत प्रेम कहानी बनती चली जाती है। चित्रा और सुदीप की यह कहानी हर किसी के पढ़ने लायक है।

किताब की कुछ पंक्तियां जो दिल छू लेती हैं :-

एक अधूरी उम्मीद ही तो है जिसके सहारे हम बूढ़े होकर भी बूढ़े नहीं होते। किसी बूढ़े आशिक़ ने मरने से ठीक पहले कहा था कि एक छंटांक भर उम्मीद पर साली इतनी बड़ी दुनिया टिक सकती है तो मरने के बाद दूसरी दुनिया में उसकी उम्मीद बांधकर तो मर ही सकता हूँ। बूढों की उम्मीद भरी बातों को सुनना चाहिए।

किसी के साथ बैठकर चुप हो जाना और इस दुनिया को रत्ती भर भी बदलने की कोई भी कोशिश न करना ही तो प्यार है!

हर आदमी में एक औरत और हर औरत में एक आदमी होता है। हर आदमी अपने अंदर की अधूरी औरत को जिंदगी भर बाहर ढूँढता रहता है लेकिन वो औरत बड़ी मुश्किल से मिलती है। वैसे ही हर औरत अपने अंदर का अधूरा आदमी ढूँढती रहती है लेकिन वो अधूरा आदमी बड़ी मुश्किल से मिलता है। और कई बार वो अधूरा मिलता ही नहीं। लेकिन अगर एक बार अधूरा हिस्सा मिल जाए तो आदमी मरकर भी नहीं खोता। तू ध्यान से देख वो कहीं नहीं गया तेरे अंदर है। आधी तू आधा वो।

नदी और जिंदगी दोनों बहती हैं और दोनों ही धीरे-धीरे सूखती रहती हैं।

 


किताबः      अक्टूबर जंक्शन
लेखकः        दिव्य प्रकाश दुबे
पृष्ठः           150
मूल्यः          125 रुपए
प्रकाशकः     हिंद युग्म

बुधवार, 17 मार्च 2021

जुहू चौपाटी : साधना जैन

 

जुहू चौपाटी , साधना जैन का उपन्यास है जिसकी कहानी एक फ़िल्म अभिनेत्री के इर्दगिर्द घूमती है।यह साधना जी की पहली किताब है।इनकी भाषा की पकड़ जानना हो तो इस किताब को पढ़ सकते हैं।किसी भी राईटर केलिए  सरल और सहज भाषा में लिखना बहुत मुश्किल होता है।
इस किताब में एक भूतपूर्व अभिनेत्री की कहानी है जो मर चुकी है।उस अभिनेत्री का नाम मीरा है।मीरा की अचानक मृत्यु हो जाती है।जब उसकी आत्मा खुद को मृत देखती है तो उसको बिल्कुल विश्वास नहीं होता है। "दुनिया से भागा जा सकता है, खुद से नहीं।" मीरा वहां से अचानक घबराई हुई लड़की की तरह भाग जाती है।जिस दिशा में वह जा रही थी वो रास्ता 'जुहू चौपाटी' की तरफ जाता था।जुहू चौपाटी मुंबई शहर का सबसे प्रसिद्ध तट है।मीरा भी इसी तट पर बैठकर अपने मरने की वजह खोज रही है।दरअसल उसको यह भी नहीं मालूम है कि उसकी हत्या किसने की? सब कुछ वो यही से याद करती है।शिमला वाला घर छोड़ कर दिल्ली क्यों आई थी? वहां से मुंबई क्यों गई? कैसे बॉलीवुड में अभिनेत्री बनी? क्यों उसने बॉलीवुड की बड़ी अभिनेत्री होने के बावजूद फिल्मों से काम करना छोड़ दिया? मीरा की मृत्यु कैसे और क्यों होती है? राजी,संदीप,राजीव, रीना ,शास्त्री जी और मीठी से क्या संबंध थे मीरा की।इन सब प्रश्नों का उत्तर उपन्यास पढ़ने के बाद ही मिल सकता है।


कुछ पंक्तियां जिन्होंने बहुत कुछ कह दिया उनका उल्लेख जरूरी है-
"हमारा वर्तमान हमारे अतीत का अपग्रेड वर्जन ही तो है।हम चाहें भी तो अपने ओल्डसेल्फ़ मे वापस नहीं जा सकते।जिस तरह मुँह से निकले हुए हमारे शब्द पराए हो जाते हैं, उसी तरह हमारा जिया हुआ कल हमारे आज से अजनबी होता जाता है।"


"हमारी सोच ,हमारे विचार हमारी भावनाएं, हमारी पसंद सब वक्त के साथ बदल जाते हैं।और ये बदलाव पलक झपकते ही नहीं हो जाता।ये प्रक्रिया हर सेकेंड चालू रहती है जिसका हमें पता भी नहीं चलता।और एक दिन हम पाते हैं हम वह रहे ही नहीं जो कल थे।"


"कई बार हम ऐसा कुछ कर जाते हैं जिसे करने के बाद हमें खुद हैरानी  होती है।कुछ ऐसा जो हम कब का करना छोड़ चुके होते हैं या वह हमने अपनी जिंदगी में कभी किया ही नहीं होता।फिर अचानक ऐसा कुछ घट जाता है जिसके बाद हम वह काम इस तरह से कर जाते हैं, मानो ये प्यास लगने पर पानी पीने जैसी आम बात हो।"


"जिस पल रात सुबह में बदल रही होती है उस पल को देखकर ऐसा लगता है जैसे पूरा आसमान हमसे कहना चाहता हो कि कुछ भी हमेशा के लिए नहीं रहता।हर रात की मंजिल सुबह है।हर दुःख का अंत सुख है।और सुख की भी एक निश्चित उम्र है।"


"दो लोगों के बीच की वैचारिक क्षमता का वजन जब होने वाली बातचीत के तराजू के दोनों पलड़ों में बराबर पड़ता है तभी यह तय होता है कि उनके बीच बनने वाला रिश्ता कितना गहरा होगा!दूर कितना जाता है इस बात से कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता है।"


"इंसान जिंदा हो या मरा हुआ उसे किसी न किसी का साथ चाहिए।वह अकेले बचा तो रहता है मगर मानसिक तौर पर बीमार होता जाता है।
"

लिखने केलिए तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है लेकिन प्रतिक्रिया की भी अपनी सीमा होती है।अंत में मैं लेखिका को बहुत बहुत धन्यवाद देता हूँ कि जिसने एक नए तरीके से कहानी को पेश की।आशा करता हूँ कि आगे भी ऐसे ही कुछ नया लिखने का कोशिश करेंगी।
पुस्तक : जुहू चौपाटी
लेखिका : साधना जैन
प्रकाशन : हिन्द युग्म
मूल्य : 150 रुपये मात्र


मंगलवार, 16 मार्च 2021

कांग्रेस को आत्मविश्लेषण की जरूरत

 कांग्रेस पार्टी केलिए चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के विधानसभा चुनाव कितने महत्वपूर्ण हैं ये बताने की जरूरत नहीं है।इस समय कांग्रेस की स्थिति क्या हो चुकी है ये भी बताने की जरूरत नहीं है।जाहिर सी बात है कि कांग्रेस की दशा देखकर कट्टर समर्थक भी हताश हो रहे होंगे।दरअसल कांग्रेस की स्थिति इतनी खराब होने के पीछे भी कांग्रेस नेताओं का हाथ है।आपने देखा होगा राहुल गांधी  सिर्फ केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में प्रचार करते दिख रहे हैं। वही प्रियंका गांधी असम में दिख रही है।इसका मतलब क्या है? वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सिर्फ सोशल मीडिया पर अपने उलूल-जलूल बयान देते नजर आ रहें हैं।दरअसल जिस समय कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को जी जान लगाकर चुनावी अभियान लगाना चाहिए था,तब ये लोग अपने ही पार्टी के खिलाफ अजीबोगरीब बयान देकर फंसते नजर आते हैं।चाहे वो राहुल गांधी का बयान हो या किसी अन्य वरिष्ठ नेताओं का,हमेशा से सवालों के घेरे में ही रहता है। विडंबना तो यह है कि अगर कोई नेता पार्टी के हित में सच्चाई दिखाने की कोशिश करता है तो उसके खिलाफ अन्य सदस्य पार्टी से बाहर निकालने केलिए एक अलग मोर्चा खड़ा कर देते हैं।हाल ही में गुलाब नबी आजाद के साथ क्या हो रहा है ये बताने की जरूरत नहीं है। दरअसल यह परिदृश्य सिर्फ कांग्रेस पार्टी की ही नहीं है अन्य पार्टीयों में भी ऐसा होते रहा है।आजकल तो सरकार के नीतियों के खिलाफ कुछ बोलने की कोशिश करते हैं तो उनके समर्थक देशद्रोही घोषित करने लगते हैं।दरअसल यही सच्चाई है।

जिस  समय कांग्रेस को नरेंद्र मोदी और अमित शाह  के खिलाफ मोर्चा संभालना चाहिए था उस समय पार्टी अपने ही नेताओं के बयान से उलझे हुए है।हाल में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा ने पार्टी के हित में बंगाल के पीरज़ादा अब्बास सिद्धिकी के साथ होने वाले  गठबंधन का विरोध किया तो कांग्रेस पार्टी के दूसरे नेता अधीर रंजन चौधरी उनका किस तरह से माजक बनाया यह बताने की आवश्यकता नहीं है।
ध्यान देने की बात है जब कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी के संगठन मजबूत करने केलिए और स्थाई अध्यक्ष केलिए जो पत्र लिखा गया था उसमें भी वही नेता थे जो पार्टी के हित चाहते थे।हालांकि उनके पत्र पर कोई विचार तक नहीं किया गया।दरअसल होना यह चाहिए था कि पार्टी के अध्यक्ष एक बैठक बुलाते सर्वसम्मति से पार्टी के हित मे चर्चा की जाती,विचार विमर्श होती।लेकिन ऐसा हुआ नहीं।अगर ऐसा हुआ रहता तो ऐसी नौबत ही नहीं आती।आज कांग्रेस इस स्थिति हो चुकी है भाजपा के खिलाफ खड़ा होने में भी सोचना पड़ता है।इसका नतीजा पिछले चुनावों के आंकड़ों से देखा जा सकता है।
     कांग्रेस की मौजूदा  स्थिति से यही अनुमान लगाया जा सकता है कि अगर ऐसी हालात रही तो आगामी विधानसभा चुनाव में वही स्थिति रहेगी जो पिछले छः सालों से देखने को मिल रहा है।संयोग से अगर कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहा तो पार्टी के चाटूकार लोग गांधी परिवार की चाटूकारिता करते हुए नज़र आएंगे।इससे कांग्रेस का भविष्य क्या होगा देखना बड़ा दिलचस्प होगा?


रविवार, 14 मार्च 2021

ये कैसी चोट थी,24 घण्टे में कटा प्लास्टर ममता पर रविकिशन का तंज

 

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 के दिन जितने नजदीक आ रहे हैं सियासी माहौल उतना ही गरम होता जा रहा है। प्रदेश में छिटपुट हिंसा के साथ नेताओं के आराेप- प्रत्यारोप का दौर जारी है। ममता बनर्जी पर कथित हमले को बीजेपी के ‘नौटंकी' करार दिया है तो वहीं मुख्यमंत्री का कहना है कि उन पर हमला किया गया है। अभिनेता और बीजेपी के गोरखपुर से सांसद रवि किशन ने ममता बनर्जी के अस्पताल से निकलकर व्हीलचेयर पर चुनाव प्रचार करने पर तंज साधा है। उन्होंने अपने ट्विटर पर एक ट्वीट से माध्यम से कहा कि कैसी चोट थी जो 24 घंटे में ही प्लास्टर कट गया।


रवि किशन ने अपने ट्वीटर पर लिखा, ‘व्हीलचेयर पर दीदी बैठे, सबसे मांगे वोट। 24 घंटे ने प्लास्टर कटा, ये कैसी थी चोट। जोगिरा सा रा रा रा...।'



रविवार, 28 फ़रवरी 2021

चुनाव यात्रा

 नेताओं को अपनी भागीदारी को समझना बहुत जरूरी होता है।लेकिन ये नेता लोग खुद को कभी भी उस लायक नहीं बना सकते हैं ताकि गरीब लोग उनको एक मसीहा के तौर पर देखें।अगर कुछ करते भी हैं तो सिर्फ चुनाव लड़ने केलिए किस व्यक्ति से किस प्रकार से वोट लेना या फिर वोट खरीदना है? ये तरीका बखूबी निभाते हैं।

लोकतंत्र में जनता के द्वारा चुना गया व्यक्ति ही प्रतिनिधित्व करता है। लेकिन जमीनी स्तर पर देखा जाए तो बड़ा हास्यास्पद लगता है।

बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में ,जब मैं अपने गांव के  चौक-चौराहे पर घूम रहा था,उस वक्त लोगों से ओपिनियन लेने की कोशिश करता था।कभी कोई मिल गया तो बात कर लेते थे,जैसे कभी कोई कंडीडेट ही मिल गया तब चुनाव संबंधी बात हो जाती थी।सच तो ये भी है कि चुनाव के समय में पूरे देश में कोरोना अपने चरम पर था।ऐसे में बाहर निकलने में रिस्क़ तो था ही। खैर, तो मैं ऐसे ही एक मित्र के किराना दुकान पर बैठा हुआ था।तब ही एक बुजुर्ग औरत आयी,उम्र तकरीबन साठ-सत्तर के आसपास होगा।दुकानदार से सत्तु खरीद रही थी।समय तकरीबन दिन के एक बजे रहे थे।उसी समय चुनाव  प्रचार में निकले भाजपा की गाड़ी आगई। बुजुर्ग महिला गाड़ी को देखते ही बोलने लगी 'नेता सब खाली वोट लेवेला आवेला केहू ग़रीब के कुछ ना देवेला।आज हम दो दिन से भूखे बानी लेकिन केहू नेता हमरा से हाल चाल भी ना पूछे ला।गरीब के केहू करेवाला नइखे।अब आओ ना लोग तब बिना पैसा लेके ना देम।' मुझे बड़ा आश्चर्य लगा कि एक बुजुर्ग महिला वोट पैसे से देने की बात कर रही थी।फिर हमने पूछना शुरु किया। वोट पैसा लेके देम का? महिला का जवाब देते हुए बोली ' एकरा पहिले वोट देनी तब हमरा चापाकल ना मिलल, राशन में नाम कट गइल कोई नेता लोग मदद ना कईल।' अगला सवाल केतना पैसा में वोट देम ? फिर महिला का जवाब था एक हजार।अगला सवाल पूछने ही वाले थे कि महिला अपना समान लेकर चली गई।

कुछ ही देर में एक दूसरी महिला आई और बिना कुछ पूछे ही बोलने लगी 'हम तs वोट मोदी के ही देम'।फिर हमने सोचा कुछ पूछते हैं तब तक वो खुद बोलने लगी 'केहू के नमक खा के नमकखरामी ना करे के।आज हमरा घर मे गेहूँ-चावल ,तेल,बिजली, पानी सब मोदिया ही देले बा.हमनी का वोट ओकरे के देम'. फिर हमने पूछा 'अरे मोदी जी इहा थोड़े खड़ा बारनs'? महिला का बोलने लगी कि 'केहू होखो लेकिन वोट हम फूल छाप के ही देम'. दरअसल बिहार में चुनावी माहौल में जहाँ भी जाइए चौक-चैराहे हर जगह चुनाव पर चर्चा होना तो लाज़मी है।

शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

ट्वेल्थ फेल : अनुराग पाठक

 

अनुराग पाठक की किताब ‘12th फेल.. हारा वही जो लड़ा नहीं’ नियो लिट पब्लिकेशन ने छापी है।अनुराग पाठक पेशे से डिप्टी कमिश्नर हैं।इस क़िताब को 2005 बैच मनोज शर्मा पर लिखी गई है।जो महाराष्ट्र कैडर से आईपीएस हैं।इस किताब में मनोज शर्मा के पूरा जीवन की कहानी लिखी गई है।
कहानी की शुरुआत ट्वेल्थ की पढ़ाई कर रहे मनोज से होता है।जो हर रोज खुद केलिए नहीं आस पास को दिखाने पढ़ता था।मैथ भी बोल कर पढ़ता था ताकि लोगों को यह पता चले कि मनोज पढ़ रहा है।पर ऐसे पढ़ने के कारण ही ट्वेल्थ फेल कर जाता है।इसके बात से ही उसकी जिंदगी में कैसे बदलाव आते हैं? क्या क्या परेशानियां एक गरीब परिवार के बच्चों को आती है? एक ग़रीब परिवार का लड़का कुत्तों को  घूमने का काम करते हुए कैसे आईपीएस का सफर तय करता है? कैसा रहा सफर टेम्पू चलाने से लेकर आईपीएस तक का यह जानने केलिए अनुराग पाठक की 'टवेल्थ फेल' (12th fail) को पढ़ना चाहिए।



बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

बेतुका बयान

अपने खून-पसीने से तैयार की गई फसल को क्या कोई किसान आग लगा सकता है? शायद कभी नहीं। कोई भी किसान बिना सोचे समझे ऐसा नहीं कर सकता है।क्योंकि वह अच्छी तरह से जानता है कि एक फसल को तैयार करने में कितना मेहनत और समय लगता है।हाँ पशुओं को चारा के रूप में खिला सकता है या फिर उसे मिट्टी में नष्ट कर सकता।परंतु जलाना तो शायद किसान नहीं कर सकता है।ऐसे में किसानों के नेता राकेश टिकैत का कहना कि किसान अपने फसलों में आग लगा देंगे, बिल्कुल सही नहीं है।यह बयान काफी आपत्तिजनक एवं हानिकारक बयान है। उन्हें यह बिल्कुल नहीं भूलना चाहिए कि वो एक किसान नेता हैं और एक बड़े आंदोलन का नेतृत्व कर रहें हैं।ऐसे में उनके एक-एक बयान काफी महत्वपूर्ण हो जाता है।इस तरह से बेतुका बयान देने की बजाय उन्हें अपने साथियों के साथ मिलकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी लड़ाई लड़नी चाहिए।

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

रुकतापुर : पुष्यमित्र

 

रुकतापुर' , घुमंतू पत्रकार पुष्यमित्र द्वारा रचित पुस्तक में बिहार के 73 वर्षों का लेख-जोखा है।इस किताब को एक पत्रकार की डायरी कह सकते हैं।जिसमें पुष्यमित्र के द्वारा आँखों देखी घटनाओं को तथ्यपरक विश्लेषण किया गया है।पुष्यमित्र ने  पूरी कहानी एक रिपोर्टर के अंदाज़ में ही लिखी है-
पुष्यमित्र पहले रेलों की ख़बर लेते हैं. किताब का नाम 'रुकतापुर' भी रेलवे की दुनिया से ही लिया गया है. 2015 में वे सहरसा से सुपौल जा रहे हैं. वे जिस ट्रेन में बैठे हैं, वह राघोपुर तक जाती है. बुलेट ट्रेन की कल्पना और चर्चा के इस ज़माने में इस ट्रेन को सहरसा से राघोपुर की 63 किलोमीटर की दूरी तय करने में चार घंटे लगते हैं- यानी 16 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ़्तार. मैदानी इलाक़ों में इतनी धीमी ट्रेन शायद ही दुनिया के किसी हिस्से में हो. पता चलता है, यह ट्रेन कहीं भी रोक ली जाती है. ऐसा ही एक स्टेशन है- मुक्तापुर, जिसकी तर्ज पर लोगों ने रुकतापुर बना लिया- यानी जहां भी ट्रेन रोक दी जाए- वह रुकतापुर स्टेशन है.ट्रेनों की कहानी को पुष्यमित्र बिल्कुल पटना तक ले आते हैं. 2018 तक पटना के हड़ताली मोड़ से चलने वाली एक ट्रेन का ज़िक्र बिल्कुल हैरान करने वाला है. जिसने वाकई वह ट्रेन चलती नहीं देखी है, उसके लिए यक़ीन करना मुश्किल होगा कि बीच पटना से ऐसी ट्रेन भी गुज़रा करती थी जिसे लोगों को सड़क से हटाने के लिए हॉर्न बजाना पड़ता था और कभी-कभी पटरी से लगी किसी गाड़ी के हटाए जाने का इंतज़ार करना पड़ता था. वे इस बात को पहचानते हैं कि बिहार में ट्रेनें बस मज़दूरों को ढोने और बाहर से पूजा के अवसरों पर घर लाने का काम कर रही हैं.

2019 में पूरे देश की नज़रें मुज़फ़्फ़रपुर की तरफ तब जा मुड़ी थी जब वहां इंसेफेलाइटिस यानी चमकी बुखार से बच्चों की मौत की खबरें सामने आ रही थी. लेखक ने प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर एक साफ दृष्टि देने का काम किताब में किया है. जहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर अस्पतालों तक की कमी है और डॉक्टर तो डिबिया लेकर घूमने पर भी नहीं मिलेगा.


आंकड़ों का हवाला देकर लेखक बताता है, ‘राज्य सरकार ने जुलाई 2019 में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर जानकारी दी थी कि उनके राज्य में डॉक्टरों के 57 फीसदी पद और नर्सों के 71 फीसदी पद रिक्त हैं.’

इससे साफ समझा जा सकता है कि प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं का आखिर हाल कैसा होगा. कोरोना काल का ही जिक्र करें तो हमारे सामने ऐसी कई तस्वीरें आई थी जहां अस्पतालों में डॉक्टर नहीं है और स्टाफ की भारी कमी का सामना लोगों को अपनी जान गंवा कर करना पड़ा. ये भी विडंबना ही कही जाएगी कि महामारी के दौरान ही राज्य में कई बार स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव को बदलना पड़ गया.

बिहार में महिलाओं की स्थिति भी कोई बेहतर नहीं है. एक तरफ तो वो शोषण का शिकार होती हैं वहीं सामाजिक दंश को भी झेलती हैं. लेखक उन प्रसंगों का ज़िक्र करता है जहां उत्तर प्रदेश और हरियाणा से आकर लोग प्रदेश की बेटियों से शादी करते हैं. लेकिन इसके पीछे की सच्चाई दिल-दहलाने वाली है. उन प्रदेशों में उनके साथ काफी खराब बर्ताव होता है और तस्करी का पूरा रैकेट काम करता है. लेकिन एक सच्चाई ये भी है कि प्रदेश की महिलाओं की शादियां भी नहीं होती हैं जिसके कारण जीवन काटना उनके लिए दूभर हो जाता है.

रोज़गार के सवाल पर भी प्रदेश की स्थिति काफी खराब है. प्रवास इस राज्य की हकीकत बन गई है. राज्य में नए उद्योग लग नहीं रहे हैं और जो पहले से हैं उनकी उतनी क्षमता नहीं है कि वो लोगों को रोज़गार दे सके. इसलिए दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, गुजरात जैसे राज्यों की तरफ लोगों को रोजगार की तलाश में जाना ही पड़ता है.

बिहार की कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती. रेलवे,बेरोजगारी,गरीबी, स्वास्थ्य, देहव्यापार, बाल विवाह, बिजली ,बाढ़,पानी जैसे तमाम समस्याओं का लेखा-जोखा  अपने कलमों के माध्यम से  उजागर करने का प्रयास किया है।कुल मिलाकर यह किताब कड़वाहट भरा तो है ही दर्द भरा भी है।बिहार के  तमाम घटनाओं को जानने समझने के लिए इस किताब को पढ़ सकते हैं।जो सरकार और बिहार की जमीनी हकीकत को बतलाती है।इस किताब (रुकतापुर) को राजकमल  प्रकाशन ने छापा है।



जनता पस्त , सरकार मस्त

 जो लोग कल तक पेट्रोल-डीजल और गैसों की महंगाई पर साइकिल और गैस सिलेंडर लेकर बाहर निकल जाते थे।वो आज कल चुप्पी साधे हुए हैं।उनके लिए ये महंगाई देशहित है।वो ये बताने में पुर जोर तरीके से जुट गए हैं कि देश के राजस्व में वृद्धि हो रही है।जब 2014 में मोदी सरकार सत्ता में आयी तब लोगों को उम्मीद थी कि महंगाई पर लगाम लगेगी।क्योंकि तत्कालीन विपक्ष में बैठे नेताओं का अहम मुद्दा था "बहुत हुई महंगाई की मार,अबकी बार मोदी सरकार"।नोटबन्दी के बाद प्रधानमंत्री ने एक साक्षात्कार में कहा था कि 2014 से पहले हेडलाइन बनती थी महंगाई, लेकिन अब कोई मुद्दा नहीं है।पर,आज पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छू रहें हैं और गैस की कीमत घर में आग लगा रही है।सच्चाई तो यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमत में कोई खास वृद्धि नहीं हुआ है लेकिन केन्द्र सरकार और राज्य सरकार दोनों मिलकर एक्साइज ड्यूटी और टैक्स लगा कर अपनी अपनी तिजोरी भरने में लगी है।इधर महंगाई आम जनमानस की कमर तोड़ने में लगी है।महंगाई के अनुपात में लोगों की आमदनी भी बढ़ती तो कुछ हद तक जायज होता।लेकिन यहां जनता पस्त और सरकार मस्त हो चुकी है।

आश्चर्य की बात तो यह है कि जिस सरकार की बुनियाद ही महंगाई थी वो आज महंगाई पर चुप्पी साधे हुए  कैसे बैठ सकती है।यह अपने आप में  हास्यास्पद लगता है।




अतिक्रमण

शहर की प्रमुख सड़कों पर अतिक्रमण के कारण आए दिन जाम लग रहा है। नगर पालिका प्रशासन व अन्य जिम्मेदार तमाम प्रयासों के बाद भी शहर की प्रमुख सड़कों से अतिक्रमण हटवाकर जाम की समस्या का निराकरण नहीं करा पा रहे हैं। इसका खामियाजा शहरवासियों को जाम में फंसकर भुगतना पड़ता है।हालांकि समय-समय पर अतिक्रमण हटाने के लिए कार्रवाई भी की जाती है लेकिन उसके कुछ दिन बाद उन स्थानों पर अतिक्रमण फिर से हो जाता है।कहीं-कहीं दुकानों के आगे ठेले वालों ने मार्ग को घेर रखा है. साथ ही कस्बे के मुख्य चौराहे पर डग्गामार वाहनों और टेंपो वालों का कब्जा रहता है. इसके कारण यहां से एक गुजरने वाले वाहनों को घंटों जाम से जूझना पड़ता है. इस कारण आए दिन कोई न कोई घटना होती रहती है. आलम यह है कि एंबुलेंस तक जाम में फंस रह जाती है लेकिन प्रशासन का इस तरफ कोई ध्यान नहीं है. अब प्रशासन से मांग  है कि जल्द ही शहर को अतिक्रमणमुक्त किया जाए. ताकि जाम के झाम से लोगों को निजात मिल सके.

रविवार, 21 फ़रवरी 2021

स्वच्छता मिशन की हकीकत

  2 अक्टूबर, 2014 को स्वच्छ भारत मिशन देश भर में व्यापक तौर पर राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में शुरू किया गया था।साथ ही केंद्र सरकार ने 2 अक्टूबर 2019 तक खुले में शौंच मुक्त  भारत को हासिल करने का लक्ष्य रखा था और महात्मा गांधी के जन्म की 150 वीं वर्षगांठ तक ग्रामीण भारत में 1.96 लाख करोड़ रुपये की अनुमानित लागत के 1.2 करोड़ शौचालयों का निर्माण करने का भी लक्ष्य रखा गया था।जिसे सरकारी आंकड़ों के अनुसार पूरा भी किया जा चुका है।सरकारी योजनाएं कोई भी हो भ्रष्टाचारी अधिकारी कर्मचारी उसमें पैसे कमाने का तरीका खोज ही लेते है। इसी तरह से स्वच्छ भारत अभियान में पैसे कमाने के लिए अधिकारियों ने अनोखे जुगाड़ बनाया। ‘स्वच्छ भारत मिशन’ के तहत शौचालय निर्माण के लिए लाभार्थियों को 12-12 हजार रुपये देने के बजाय कथित तौर पर दलालों के जरिये हड़प लिए गए जा रहें।अगर जाँच हो तो मिशन के तहत बनने वाले शौचालय में लाखो का घोटाला सामने आ सकती है, एक ही शौचालय की फोटो को कई कई शौचालय की फोटो दिखाकर  योजनाओं का लाभ उठा जा चुका है।जितने भी शौचालय बनाये गए थे वो अब जर्जर हालात में पाए जा रहे हैं।फिर से लोग बाहर जाने को मजबूर हो गए।इसकी स्वतंत्र न्यायिक जांच होनी चाहिए।