शनिवार, 29 जनवरी 2022

आम बजट

इस बार लगातार तीसरा साल होगा जब कोरोना संकट के बीच एक फरवरी को आम बजट आएगा। हालांकि पिछले दो सालों के मुकाबले हालात इस बार उतने खराब नहीं हैं। पर यह कहना भी सही नहीं होगा कि अर्थव्यवस्था संकट से निकल चुकी है। पिछले दो साल में अर्थव्यवस्था ने जिस तरह की भारी गिरावट झेली है, उद्योग-धंधे चौपट हुए हैं और उत्पादन गिरा है, उसका असर लंबे समय तक बने रहने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। 

सरकार की प्राथमिकता अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की है। ऐसे में इस बार भी सरकार बजट में ऐसे कदमों को ही प्राथमिकता दे सकती है जो अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने वाले हों। इसके लिए ढांचागत परियोजनाओं पर खर्च करने पर जोर देना पड़ेगा। इधर उद्योग जगत पहले ही करों में राहत से लेकर दूसरी रियायतों की मांग कर रहा है। वहीं छोटे और मझोले उद्योग अभी तक भी महामारी से उपजे संकट से उबर नहीं पाए हैं। इसलिए देखने की बात यह होगी कि सरकार अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले एमएसएमई क्षेत्र के लिए क्या बड़े कदम उठाती है।



बजट पर हर किसी की निगाहें इसलिए भी टिकी होती हैं कि कहीं कुछ मिल जाने की उम्मीद रहती है, चाहे व्यापारी हों या फिर आम आदमी। जहां तक सवाल है आम आदमी का, तो वह ऐसा बजट चाहता है जिसमें कर रियायतें हों, महंगाई बढ़ाने वाला न हो और बचत बढ़ाने वाला हो। आज आम आदमी जिन मुश्किलों से जूझ रहा है, उसमें बजट से उम्मीदें और बढ़ जाना कोई गलत नहीं है। पिछले दो सालों में महामारी से पैदा हालात ने आम आदमी की जेब पर बुरा असर डाला है। बचत तो दूर की बात, रोजाना का खर्च चलाना लोगों को भारी पड़ रहा है।

शनिवार, 18 सितंबर 2021

104 फीट ऊंचा 400 फीट परिधि वाला विश्व का सबसे ऊंचा स्तूप ,सरकारी उपेक्षा का शिकार

 

विश्व का सबसे ऊँचा स्तूप है केसरिया बौद्ध स्तूप :

केसरिया बौद्ध स्तूप की ऊंचाई आज 104 फीट है और इसकी परिधि लगभग 400 फीट है।
इसलिए इसे विश्व का सबसे ऊंचा स्तूप होने का गौरव प्राप्त है।इस बेहतरीन ढाँचा को भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा साल 1998 में खोजा गया था।
बौद्ध स्तूप में लगी ईटें मौर्य कालीन है। सभी मूर्तियां विभिन्न मुद्राओं में है। 1861-62 में इस स्तूप के संबंध में कर्निघम ने लिखा हैं कि केसरिया का यह स्तूप 200 ईसा से 700 ईसा के मध्य बना है। चीनी यात्री फाहियान के अनुसार केसेरिया के देउरा स्थल पर भगवान बुद्ध अपने महापरिनिर्वाण के ठीक पहले वैशाली से कुशीनगर जाने वक्त एक रात का विश्राम किया था। तथा साथ आये वैशाली के भीक्षुओं को अपना भीक्षा पात्र प्रदान कर कुशीनगर के लिए प्रस्थान किया था।

बौद्ध स्तूप की हालत दिन पर दिन ख़राब होते जा रहा है

दुनिया में भारत को पहचान दिलाने वाला बिहार के चंपारण के केसरिया बौद्ध स्तूप की हालत दिन पर दिन ख़राब होती जा रही है।बौद्ध स्तूप धीरे-धीरे खंडहर में बदलते जा रहा है।लेकिन सरकार की ध्यान अब तक नहीं पड़ा।पिछले कई सालों से इस स्तूप को बनाने के लिए सरकार से मांग की जा रही है।लेकिन सिर्फ समय बदल जाता है स्तूप की हालत बद से बदत्तर होती जा रही है।

बौद्ध स्‍तूप का बाढ़ के पानी से घिरना हर साल की समस्‍या है। पिछले साल भी स्‍तूप के प्रांगण में बाढ़ का पानी आ गया था। पानी के दबाव के कारण स्तूप के एक भाग की चारदीवारी भी गिर गई थी।

फिलहाल इस बौद्ध स्तूप की काफी जर्जर हो चुकी है,स्तूप के चारों तरफ जलजमाव है।पानी के बीचों बीच दुनिया के सबसे ऊंचा बौद्ध स्तूप विकास की उम्मीद लगाए बैठा है लेकिन अब तक विकास नहीं हो पाया।

युवाओं ने ट्वीट पर ट्रेंड  गया

पिछले कुछ दिनों में बिहार की युवा शक्ति भी एक जुटता दिखाते हुए ट्विटर पर #save_kesariyabaudhstupa ट्रेंड कराया था।राजद ने भी अपने अधिकारिक ट्विटर हैन्डल से इसके समर्थन में ट्वीट किया था।हालाकिं इस मुहिम को केसरिया विधायक शालिनि मिश्रा के अलावा क्षेत्र के किसी अन्य नेता का सहयोग नहीं मिला।  पूर्वी चंपारण संसदीय क्षेत्र से सांसद पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह और  जिले के अन्य 11 विधायकों ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली। भाजपा बिहार के वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष और पश्चिमी चंपारण के सांसद संजय जायसवाल ने भी इसको लेकर कोई आवाज़ नहीं उठाया।

वर्तमान डीएम और केसरिया विधायक स्तूप के विकास के लिए प्रयासरत

जिले के वर्तमान डीएम शीर्षत कपिल अशोक ने
बौद्ध स्तूप के सौंदर्यीकरण को लेकर कदम उठाये है। स्तूप के आसपास पानी लगने की समस्या के निराकरण और स्तूप तक जाने वाले पथ का निर्माण हेतु भूमि अधिग्रहण का कार्य पूर्ण हो गया है।
शालिनि मिश्रा बिहार विधानसभा में बौद्ध स्तूप को लेकर अपनी आवाज़ भी उठाई थी लेकिन इसके बावजूद भी अब तक विकास नहीं हो पाया।


सोमवार, 26 जुलाई 2021

सोशल मीडिया : लघुकथा

 अरे चाचा ! आपके कलम में तो जादू है जादू। कविता, कहानी,शायरी ,चुटकुले सब- कुछ कितना सुंदर लिखते हैं।

आपको तो 'सोशल मीडिया' पर लिखना चाहिए ताकि  लाखों लोगों के पास आपकी लेखनी पहुँच सके।

दरअसल, पहली बार भतीजा रोहण शहर से अपने गांव चाचा से मिलने आया था।चाचा रमेश अपनी डायरी पलटते हुए रोहण से पूछा ये बताओ सोशल मीडिया क्या होता? 

चाचा सोशल मीडिया पर आप कोई भी बात विचार लिख सकते हैं ,पढ़ सकते हैं ,आप अपने पसन्द के दोस्तों को जोड़ सकते हैं,कविता, कहानी लिखकर डाल सकते हैं ताकि देश के अन्य लोग भी पढ़ सकेंगे।

बेटा रोहण अब ये कैसे लिखेंगे, कैसे डालेंगे ये सब मुझे समझ में नहीं आता है?

नहीं आता तो क्या हुआ मैं हूँ न ,मैं सिखाऊंगा ?, कुछ ही दिनों में रोहण ने चाचा को फेसबुक पर पोस्ट करना और ब्लॉग लिखना सीखा दिया।फिर रोहण ने चाचा के लिए सोशल साइट पर एकाउंट बना दिया।

अब हर रोज रमेश अपने ब्लॉग पर और फेसबुक पर कविता ,कहानी लिखता है।धीरे-धीरे लाखों लोग रमेश के वॉल पर आ गए। ढ़लती उम्र के इस पड़ाव पर चाचा रमेश को एक नई पहचान मिल गई।

शुक्रवार, 9 जुलाई 2021

पडरौना से वाल्मीकिनगर की यात्रा

 


कोरोना महामारी के साथ लोगों की जिंदगी में आए बदलावों में वर्क फ्रॉम होम एक अहम हिस्सा है. वर्क फ्रॉम होम कोविड-19 से पहले भी मौजूद था, लेकिन महामारी के आने पर सोशल डिस्टैंसिंग की जरूरत की वजह से यह लोगों के लिए अनिवार्य हो गया. भारत में यह मार्च 2020 से ज्यादातर सरकारी और निजी कर्मचारी अपने दफ्तर का काम घर से ही कर रहे हैं. शुरुआत में, वर्क फ्रॉम होम को ज्यादातर लोगों ने पसंद किया.लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया वर्क फ्रॉम होम सर दर्द बनता गया. क्योंकि जब हम काम नहीं कर रहे होते हैं तो घर पर समय व्यतीत करने में कभी परेशानी नहीं होती है. लेकिन जब हम काम घर से कर रहे होते हैं तो घर पर रहना परेशानी का सबब बनते जाता है. ऐसे में काम से जब भी छुट्टी मिलती है तो हम सीधे कहीं न कहीं घूमने को सोचते हैं.


हम जहाँ रहते हैं वहां से घूमने के लिए कुशीनगर जा सकते हैं. जो मेरे यहाँ से लगभग 25 km की दूरी पर है लेकिन कोरोनाकाल में सब कुछ बंद होने की वजह से वहां जाना नामुमकिन है. लेकिन मेरे यहाँ से दूरी कम होने के कारण  बिहार जाना भी ज्यादा आसान है. पडरौना से वाल्मीकि नगर जाने के लिए दो रास्ते हैं. एक तरफ से 65 km तो दूसरा 95 km. हम दोनों रास्ते से जा सकते हैं लेकिन बारिश के मौसम होने के वजह से सड़क जर्जर हो चुकी है इसलिए मैं फिलहाल 95km वाला मार्ग को चुनता हूँ.वाल्मीकि नगर जाने में तकरीबन 2 घण्टे लगते हैं.सड़क कहीं ज्यादा खराब है तो कहीं कम.अभी बारिश के समय में कहीं कहीं सड़क के ऊपर से पानी का बहाव देखने को मिलता है.अब हम बगहा पहुँचते हैं,तो देखते हैं कि बहुत जगह सड़क के ऊपर से पानी बहने लगता है.देख कर डर भी लगता है।मन ही मन सोचने लगता हूँ.क्या इस समय वाल्मीकि नगर जाना सही था या नहीं? क्या हमें यही से लौट जाना चाहिए? 

वहां से थोड़ा सा आगे बढ़ते हैं तो एक रेलवे स्टेशन आता है 'वाल्मीकि नगर रोड'. वहां से लगभग 6-7km तक सिंगल मेन रोड था जहाँ से दूसरी गाड़ी को साइड देना भी मुश्किल ही लग रहा था क्योंकि दोनों तरफ पानी ही पानी नजर आ रहा था. फिर मन ही मन सोचता हूँ कि अगर और आगे जाऊंगा तो कहीं और ख़राब दौर से गुजरना न पड़े।हालांकि मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ते जाता हूँ. थोड़ी दूर जाने के बाद पता चलता है कि आगे सड़क काफी अच्छी है और दोनों तरफ जंगल.साथ ही तराई का इलाका. प्रकृति का सुंदर दृश्य देखकर मन प्रफुल्लित हो गया.कुछ दूर चलने के बाद वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से संबंधित सूचना बोर्ड दिखायी देने लगे थे।जंगली जानवरों से संबंधित सूचनाएं मिलने लगी थीं।


वाल्मीकि नगर :


 वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान पश्चिमी चंपारण में शिवालिक पर्वत श्रेणी के बाहरी सीमा में स्थित है।यह राष्ट्रीय उद्यान मुख्य रूप से लुप्तप्राय प्राणियों का आवास है जैसे की चीता। यह अभयारण्य पूरी तरह से हरियाली से आच्छादित है।

900 गज में फैला वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना वर्ष 1990 में हुई थी। यह पार्क उत्तर में नेपाल के रॉयल चितवन नेशनल पार्क और पश्चिम में हिमालय पर्वत की गंडक नदी से घिरा हुआ है।यहां पर आप बाघ, स्‍लॉथ बीयर, भेडिए, हिरण, सीरो, चीते, अजगर, पीफोल, चीतल, सांभर, नील गाय, हाइना, भारतीय सीवेट, जंगली बिल्लियां, हॉग डीयर, जंगली कुत्ते, एक सींग वाले राइनोसिरोस तथा भारतीय भैंसे कभी कभार चितवन से चलकर वाल्‍मीकि नगर में आ जाते हैं। इस उद्यान में आप चीतल, काला हिरण, फिशिंग कैट्स, तेंदुए आदि भी देख सकते हैं।


हालांकि कोरोना के वजह से जंगल तो बंद है।अंदर घूमने की अनुमति नहीं मिलती है।फिर यहां से लगभग ढाई किलोमीटर पैदल चलने के बाद जटाशंकर मंदिर पहुँचते हैं,वहां घूमने के बाद हम वापस चले जाते हैं।क्योंकि गर्मी बहुत ज्यादा थी और साथ में छोटी बच्ची भी थी जो रोने लगती  है।तब हम सभी वही पर खाना खाते हैं और वापस चले आते हैं।खाना घर से ही लाये थे क्योंकि कोरोना के वजह से बाहर का खाना खाना सुरक्षित नहीं है।हम सभी कोरोना गाइडलाइंस को फॉलो करते हुए घूम रहे थे लेकिन यहां हमें कोई नहीं मिला जो फॉलो कर रहे हों सिर्फ हमारे सिवा।



वाल्मीकि नगर टूरिज्म के हिसाब से बहुत अच्छा जगह है. लेकिन उतना विकास नहीं हो सका है जितना होना चाहिए था.इसे बिहार का कश्मीर भी कहा जाता है.इस समय नदी में पानी बहुत ज्यादा थी,पानी का बहाव ज्यादा तेज थी. नदी के उस पार नेपाल दिख रही थी.रास्ता भी दिख रही थी लेकिन रास्ता बंद होने की वजह से वहां नहीं जा सका.

शुक्रवार, 25 जून 2021

आपातकाल का इतिहास

 

25 जून 1975, भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में इस दिन को देश के सबसे दुर्भाग्यपूर्ण दिन की संज्ञा दी जाती है. 46 साल पहले आज के ही दिन देश के लोगों ने रेडियो पर एक ऐलान सुना और पूरे देश में खबर फैल गई कि सारे भारत में अब आपातकाल की घोषणा कर दी गई है. 46 साल के बाद भले ही देश के लोकतंत्र की एक गरिमामयी तस्वीर सारी दुनिया में प्रशस्त हो रही हो, लेकिन आज भी अतीत में 25 जून का दिन डेमॉक्रेसी के एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है. 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 के बीच देश में 21 महीने तक आपातकाल लगाया गया. तत्कालीन राष्ट्रपति फख़रुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के अधीन देश में आपातकाल की घोषणा की थी. 25 जून और 26 जून की मध्य रात्रि में तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के हस्ताक्षर करने के साथ ही देश में पहला आपातकाल लागू हो गया था. अगली सुबह समूचे देश ने रेडियो पर इंदिरा की आवाज में संदेश सुना था, 'भाइयो और बहनो, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है. इससे आतंकित होने का कोई कारण नहीं है.'

अभिव्यक्ति का अधिकार तो छिना ही जीवन का अधिकार तक गया
आपातकाल की घोषणा के साथ ही सभी नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे. अभिव्यक्ति का अधिकार ही नहीं, लोगों के पास जीवन का अधिकार भी नहीं रह गया था. 25 जून की रात से ही देश में विपक्ष के नेताओं की गिरफ्तारियों का दौर शुरू हो गया था. जयप्रकाश नारायण, लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी, जॉर्ज फर्नाडीस आदि बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया गया था. जेलों में जगह नहीं बची थी. आपातकाल के बाद प्रशासन और पुलिस के द्वारा भारी उत्पीड़न की कहानियां सामने आई थीं. प्रेस पर भी सेंसरशिप लगा दी गई थी. हर अखबार में सेंसर अधिकारी बैठा दिया गया, उसकी अनुमति के बाद ही कोई समाचार छप सकता था. सरकार विरोधी समाचार छापने पर गिरफ्तारी हो सकती थी. यह सब तब थम सका, जब 23 जनवरी 1977 को मार्च महीने में चुनाव की घोषणा हो गई.

न्यायपालिका से टकराव बना आपातकाल की पृष्ठभूमि
लालबहादुर शास्त्री की मौत के बाद देश की प्रधानमंत्री बनीं इंदिरा गांधी का कुछ कारणों से न्यायपालिका से टकराव शुरू हो गया था. यही टकराव आपातकाल की पृष्ठभूमि बना था. आपातकाल के लिए 27 फरवरी, 1967 को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने बड़ी पृष्ठभूमि तैयार की. एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सुब्बाराव के नेतृत्व वाली एक खंडपीठ ने सात बनाम छह जजों के बहुमत से से सुनाए गए फैसले में यह कहा था कि संसद में दो तिहाई बहुमत के साथ भी किसी संविधान संशोधन के जरिये मूलभूत अधिकारों के प्रावधान को न तो खत्म किया जा सकता है और न ही इन्हें सीमित किया जा सकता है.

रायबरेली चुनाव निरस्त होने से खफा हो गई थीं इंदिरा गांधी
1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी ने अपनी पार्टी को अभूतपूर्व जीत दिलाई थी और खुद भी बड़े अंतर से जीती थीं. खुद इंदिरा गांधी की जीत पर सवाल उठाते हुए उनके चुनावी प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने 1971 में अदालत का दरवाजा खटखटाया था. संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर इंदिरा गांधी के सामने रायबरेली लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ने वाले राजनारायण ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया है. मामले की सुनवाई हुई और इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त कर दिया गया. इस फैसले से आक्रोशित होकर ही इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाने का फैसला किया. इंदिरा गांधी इतना क्रोधित हो गई थीं कि अगले दिन ही उन्होंने बिना कैबिनेट की औपचारिक बैठक के आपातकाल लगाने की अनुशंसा राष्ट्रपति से कर डाली, जिस पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने 25 जून और 26 जून की मध्य रात्रि में ही अपने हस्ताक्षर कर डाले और इस तरह देश में पहला आपातकाल लागू हो गया.

आपातकाल में हर कदम पर संजय के साथ थीं मेनका
इंदिरा गांधी के प्राइवेट सेक्रेटरी रहे दिवंगत आरके धवन ने कहा था कि सोनिया और राजीव गांधी के मन में आपातकाल को लेकर किसी तरह का संदेह या पछतावा नहीं था. और तो और, मेनका गांधी को आपातकाल से जुड़ी सारी बातें पता थीं और वह हर कदम पर पति संजय गांधी के साथ थीं. वह मासूम या अनजान होने का दावा नहीं कर सकतीं. दिवंगत आरके धवन ने यह खुलासा एक न्यूज चैनल को दिए गए इंटरव्यू में किया था. धवन ने बताया था कि पश्चिम बंगाल के तत्कालीन सीएम एसएस राय ने जनवरी 1975 में ही इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाने की सलाह दी थी. आपातकाल की योजना तो काफी पहले से ही बन गई थी. धवन ने बताया था कि तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को आपातकाल लागू करने के लिए उद्घोषणा पर हस्ताक्षर करने में कोई आपत्ति नहीं थी. वह तो इसके लिए तुरंत तैयार हो गए थे. धवन ने यह भी बताया था कि किस तरह आपातकाल के दौरान मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाकर उन्हें निर्देश दिया गया था कि आरएसएस के उन सदस्यों और विपक्ष के नेताओं की लिस्ट तैयार कर ली जाए, जिन्हें अरेस्ट किया जाना है. इसी तरह की तैयारियां दिल्ली में भी की गई थीं.

पहले इस्तीफा देने को तैयार थीं इंदिरा
धवन ने कहा था कि आपातकाल इंदिरा के राजनीतिक करियर को बचाने के लिए नहीं लागू किया गया था, बल्कि वह तो खुद ही इस्तीफा देने को तैयार थीं. जब इंदिरा ने जून 1975 में अपना चुनाव रद्द किए जाने का इलाहाबाद उच्च न्यायालय का आदेश सुना था, तो उनकी पहली प्रतिक्रिया इस्तीफे की थी और उन्होंने अपना त्यागपत्र लिखवाया था. उन्होंने कहा था कि वह त्यागपत्र टाइप किया गया लेकिन उस पर हस्ताक्षर कभी नहीं किए गए. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी उनसे मिलने आए और सबने जोर दिया कि उन्हें इस्तीफा नहीं देना चाहिए



मंगलवार, 15 जून 2021

चिराग के खिलाफ हुए 5 सांसद

 

लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के छह लोकसभा सदस्यों में से पांच ने, दल के मुखिया चिराग पासवान को संसद के निचले सदन में पार्टी के नेता के पद से हटाने के लिए हाथ मिला लिया है और उनकी जगह उनके चाचा पशुपति कुमार पारस को इस पद के लिए चुन लिया है।

वहीं, पारस ने सोमवार को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सराहना करते हुए उन्हें एक अच्छा नेता तथा ‘‘विकास पुरुष’’ बताया और इसके साथ ही पार्टी में एक बड़ी दरार उजागर हो गई क्योंकि पारस के भतीजे चिराग पासवान जद (यू) अध्यक्ष के धुर आलोचक रहे हैं।

हाजीपुर से सांसद पारस ने कहा, ‘‘ मैंने पार्टी को तोड़ा नहीं, बल्कि बचाया है।’’ उन्होंने कहा कि लोजपा के 99 प्रतिशत कार्यकर्ता पासवान के नेतृत्व में बिहार 2020 विधानसभा चुनाव में जद (यू) के खिलाफ पार्टी के लड़ने और खराब प्रदर्शन से नाखुश हैं।

पारस ने कहा कि उनका गुट भाजपा नीत राजग सरकार का हिस्सा बना रहेगा और पासवान भी संगठन का हिस्सा बने रह सकते हैं।

चिराग पासवान के खिलाफ हाथ मिलाने वाले पांच सांसदों के समूह ने पारस को सदन में लोजपा का नेता चुनने के अपने फैसले से लोकसभा अध्यक्ष को अवगत करा दिया है। हालांकि पारस ने इस संदर्भ में कोई टिप्पणी नहीं की।

पारस के पत्रकारों से बात करने के बाद चिराग पासवान राष्ट्रीय राजधानी स्थित उनके चाचा के आवास पर उनसे मिलने पहुंचे। पासवान के रिश्ते के भाई एवं सांसद प्रिंस राज भी इसी आवास में रहते हैं।

पारस और प्रिंस के आवास पर करीब 90 मिनट तक रुकने के बाद पासवान वहां से मीडिया से बात किए बिना ही चले गए। ऐसा माना जा रहा है कि दोनों असंतुष्ट सांसदों में से उनसे किसी ने मुलाकात नहीं की। एक घरेलू सहायक ने बताया कि पासवान जब आए तब दोनों सांसद घर पर मौजूद नहीं थे।

सूत्रों ने बताया कि असंतुष्ट लोजपा सांसदों में प्रिंस राज, चंदन सिंह, वीना देवी और महबूब अली कैसर शामिल हैं, जो चिराग के काम करने के तरीके से नाखुश हैं। 2020 में पिता रामविलास पासवान के निधन के बाद लोजपा का कार्यभार संभालने वाले चिराग अब पार्टी में अलग-थलग पड़ते नजर आ रहे हैं।

उनके करीबी सूत्रों ने जनता दल (यूनाइटेड) को इस विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि पार्टी लंबे समय से लोजपा अध्यक्ष को अलग-थलग करने की कोशिश कर रही थी क्योंकि 2020 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ जाने के चिराग के फैसले से सत्ताधारी पार्टी को काफी नुकसान पहुंचा था।

 


शुक्रवार, 11 जून 2021

बिखरता कुनबा

 वैसे तो कांग्रेस पार्टी हमेशा सुर्खियों में रहती है,लेकिन इस बार राहुल गांधी के करीबी रहे जितिन प्रसाद के भाजपा में शामिल होने से यह फिर से चर्चा आई है।उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ऐन पहले जितिन प्रसाद का पार्टी छोड़ना भाजपा के लिए फायदेमंद होगा, उससे कहीं ज्यादा  कांग्रेस केलिए नुकसानदेह हो सकता है।आये दिन कांग्रेस के नेतागण पार्टी छोड़कर जा रहे हैं, जिससे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर सवाल उठना लाजिमी है।ज्योतिरादित्य सिंधिया के बाद जितिन प्रसाद का जाना राहुल गांधी के लिए बहुत बड़ा झटका है।अब तो राजस्थान कांग्रेस का भी विवाद फिर से सुर्खियों में है और पंजाब में मुख्यमंत्री और नवजोत

सिंह सिद्धू आमने- सामने हैं।इन सबसे पता चलता है कि कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं है और उसके अन्दरखाने का विवाद  पूरी तरह से सतह पर आ चुका है।देखना अब यह है कि पार्टी अपना कुनबा कितना संभाल सकती है? बेहतर होगा कि शीर्ष नेतृत्व इसको लेकर संजीदगी दिखाए।


गुरुवार, 10 जून 2021

हाशिये पर कांग्रेस

 ऐसे तो कांग्रेस पार्टी हमेशा सुर्खियों में रहती है।लेकिन इस बार राहुल गांधी के करीबी रहें जितिन प्रसाद के बीजेपी शामिल होने के बाद सुर्खियों में है।यूपी विधानसभा चुनाव से पहले जितिन प्रसाद का जाना भाजपा के लिए जितना फायदा होगा उससे ज्यादा कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।आये दिन कांग्रेस पार्टी के एक के बाद एक नेता पार्टी छोड़कर जा रहे हैं ऐसे में शीर्ष नेतृत्व पर सवाल उठना लाजिमी है।ज्योतिरादित्य सिंधिया के बाद जितिन प्रसाद का जाना राहुल गांधी के लिए सबसे बड़ा झटका है।अब तो राजस्थान कांग्रेस में भी विवाद फिर से सुर्खियों में है।राहुल गांधी के करीबी सचिन पायलट भी नाराज चल रहे हैं।उधर पंजाब में भी मुख्यमंत्री और सिद्दू आमने-सामने हैं। इससे पता चलता है कि कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं है।कांग्रेस की परेशानी साफ दिखाई दे रही है।इतनी परेशान तो कांग्रेस कभी नहीं थी आज इस हालत में हो चुकी है कि अभी तक अपना अध्यक्ष का चुनाव भी नहीं करा पा रही है। क्या पता जून में होगा भी या नहीं ये कहना मुश्किल है? क्योंकि जिस प्रकार से नेतृत्व कांग्रेस कर रही है ये विचारणीय तो है ही।लगातार कांग्रेस कमजोर होती नजर आ रही है।हाल ही में लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद राहुल गांधी ने यह कहते हुए अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था कि अब गांधी परिवार से बाहर से कोई अध्यक्ष पद केलिए चयनित होगा।लेकिन आखिर में फिर से सोनिया गांधी को बना दिया गया।उसके बाद भी माना जा रहा था कि यह चुनाव कुछ समय केलिए ही की गई है,पर अब एक साल से ज्यादा हो चुकी है लेकिन अब तक कुछ हुआ नहीं।

ऐसा देखा गया है कि जो नेता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर सवाल करता है या गांधी परिवार से बाहर के नेता को अध्यक्ष बनाने की बात करता है वो या तो पार्टी से बाहर चला जाता है या वो पार्टी के नजरों में आ जाता है।

जहाँ तक जितिन प्रसाद की बात है तो वो एक समय में मनमोहन सिंह के सरकार में मंत्री हुआ करते थे लेकिन पिछले दो चुनाव में खुद अपना शीट नहीं बचा सके थे।बताया जा रहा है कि जब से उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी सक्रिय हुई है उसके बाद से ही जितिन प्रसाद हाशिये पर चले गए थे।अब सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अपने नेताओं को बचा पायेगी या ऐसे ही पार्टी के नेता जाते रहेंगे और कांग्रेस हाथ पर हाथ रख के सोयी रहेगी या कोई स्थायी समाधान निकालने में सफल रहेगी।

कांग्रेस के लिए बेहतर होगा कि नेतृत्व को मजबूत करें और यही भी समझे कि इन सबका जिम्मेदार वह स्वयं खुद है।



रविवार, 6 जून 2021

बिहार के अनपढ़ महिला के मुख्यमंत्री बनने की कहानी दिखाती है 'महारानी,

 महारानी वेब सीरीज में एक अनपढ़ ग्रामीण महिला का किरदार निभा रही हैं, जिन्हें बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया जाता है।जिसको कहा जा रहा है कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी पर फिल्माया गया है।लेकिन मेरे नजर में 'महारानी' वेब सीरीज़ में लालू यादव-राबड़ी देवी की कहानी नहीं है, लेकिन उनकी जैसी राजनीति को क़रीब से दिखाने का प्रयास किया गया है। राबड़ी देवी ने अपने शासनकाल में किस तरह बिहार की राजनीति को प्रभावित किया, क्या बेहतर किया, क्या बर्बाद किया, यह सब समझना और जानना चाहते हैं तो वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक अनुरंजन झा की किताब गांधी मैदान पढ़ना चाहिए।

अभिनेत्री हुमा कुरैशी ने ‘महारानी’ सीरीज में ‘रानी भारती’ की भूमिका निभाई है।रानी भारती बिहार के एक गांव की  अनपढ़ साधारण औरत है और गाय,भैंस ,बकरी पाल कर अपना जीवन यापन करती है।हालांकि उसके पति बिहार राज्य के मुख्यमंत्री हैं।रानी भारती के जीवन में एक ऐसा  मोड़ आता है कि उसके पति को गोली मार दिया जाता है अचानक तबियत बिगड़ने लगती है।इसके बाद उस अनपढ़ महिला को मुख्यमंत्री बनाया जाता है।जो राजनीति को भी नहीं समझती है।हालांकि धीरे-धीरे राजनीति को भी समझती है और भ्रष्टाचार पर भी नकेल कसने की कोशिश भी करती है।पशुपालन जैसे तमाम घोटाले को उजागर भी करती है और अपने पति यानी पूर्व मुख्यमंत्री को जेल भी भेजवाती है।

अभिनेत्री का अभिनय काबिलेतारीफ है।जैसे किरदार है हूबहू उतारने का प्रयास की है।ठेठ बिहारी के रूप में जो अभिनय किया है वो देखने लायक है।बाकी कलाकारों ने भी कमाल का अभिनय किया है।

सीरीज की डायलॉग की बात करें तो डायलॉग एक से एक है एक डायलॉग जो मुझे काफी पसंद आई और याद भी है।जिसमें रानी भारती कहती है -"आप अपनी पत्नी से मिलना चाहेंगे, तो मैं मिलूंगी, अगर सीएम से मिलना चाहेंगे तो रानी भारती से मुलाकात होगी"।इस सीरीज की डायलॉग एक मजबूत कड़ी है।

अगर हम इस सीरीज की कमी की बात करें तो कई जगह खामियां नजर आई।कहीं कहीं कहानी को खींचने का प्रयास किया गया है जिसको थोड़ा कम करके भी दिखाया जा सकता था।सीरीज के बीच में एक बाबा को प्रवेश कराया जाता है जिसकी आवश्यक ही नहीं थी।

अंत में बस यहीं कहेंगे, सब कुछ नजरअंदाज करके थोड़ा समय महारानी सीरीज को दे दीजिए, राजनीति भी समझ जाएंगे, एंटरटेनमेंट भी हो जाएगा और कोरोना काल में एक शानदार सीरीज भी देख लेंगे और हाँ गांधी मैदान जरूर पढ़ें।



गुरुवार, 3 जून 2021

तीसरी लहर का डर

 कोरोना की पहली लहर और दूसरी लहर के बाद अब तीसरी लहर की चर्चा जोरों पर है।वैज्ञानिक अभी से ही कमर कसने की बात कर रहे हैं। वाकई, आग लगने पर कुआं खोदने से बेहतर होगा अविलंब तीसरी लहर के खिलाफ आगे की रणनीति बना लेनी चाहिए।तीसरी लहर में बच्चों के संक्रमित होने की आशंका सबसे ज्यादा जताई जा रही है।इसका ख़ास ध्यान रखकर पूरी योजना बना लेनी चाहिए,तब ही हम इस तीसरी लहर से सामना कर सकते हैं। अब सरकार को भी शिक्षा और स्वास्थ्य पर बजट बढ़ा देनी चाहिए।अगर हमारा समाज शिक्षित होगा तब ही इस अदृश्य वायरस से लड़ने में कामयाब हो सकते हैं।


अरुणेश कुमार, चंपारण (मोतिहारी)

गुरुवार, 13 मई 2021

नकारात्मकता के माहौल में सकारात्मक कैसे रहें

 अब कुछ मीडिया संस्थान एवं सरकारें द्वारा एक नया ट्रेंड चलाया जा रहा है कि सकारात्मक रहो,खुश रहो।वो भी तक जब आपके आस पड़ोस में चीख-पुकार की शोर सुनाई दे रही हो।आखिर ये कौन लोग हैं जो हमारे समाज को अलग करने पर तुले हैं? यह वही लोग हैं जो कल तक सरकार के हर मुद्दे पर लिपा-पोती करके सरकार की नाकामियों को छुपाने का प्रयास करते रहे हैं।कुछ मुद्दे से भटकाने में लगे हैं तो कुछ समाजिक अलगाव पैदा करने में।आज वही लोग हमें सकारात्मक रहने का ज्ञान बांट रहे हैं।चलिए मान लेते हैं कि हम सकारात्मक रह लेंगे।फिर सवाल आता है कि सकारात्मक रहें तो कैसे रहें? जब देश में लाशें सड़ रही हैं,  दवाई नहीं मिल रही है, ऑक्सीजन नहीं मिल रहा है,अस्पतालों में मरीजों को बेड नहीं मिल रहा है, जरूरतमंद मरीजों को रेमडीसीवर नहीं मिल रहा है,श्मशानों में जगह नहीं, लाशें जलाने केलिए लकड़ी नहीं मिल रही है तब सकारात्मक कैसे रह सकते हैं? वे लोग सकारात्मक कैसे रह सकते हैं? जिनके परिजनों की मृत्यु ऑक्सीजन,दवाई, बेड, अस्पताल, एम्बुलेंस न मिलने के कारण हुई हो,जिसने अपनी माँ को खोया हो,जिसने अपने पिता को खोया हो,जिसने अपने माता-पिता को खोया हो,जिसने अपने भाई-बेटा खोया हो,जिसने अपनी बेटी-बहन खोया हो।भला उन्हें कैसे कह सकते हैं कि तुम सकारात्मक रहो?

हाँ ये बात बिल्कुल ठीक है कि आप सकारात्मक रहें, सकारात्मक सोचें। लेकिन ये ज्ञान तब बांटी जा रही है जब आपके अंदर सरकार से पूछने के लिए तमाम सवाल उधेड़ रही है।

ये वही लोग हैं जो पिछले सात सालों से माइंडवाश करते आये हैं।कभी हिंदू-मुस्लिम, कभी राष्ट्रवाद, कभी देशद्रोही, तो कभी जय श्रीराम जैसे मुद्दों पर जहर उगलकर आपको नकारात्मक बनाने का कोई कसर नहीं छोड़ा।इनका कोई काम नहीं है हमेशा जहर उगलते रहना है।चाहे वो तब थे या अब हैं।



गुरुवार, 6 मई 2021

चौरासी : सत्य व्यास

 किताब : चौरासी

लेखकः सत्य व्यास

प्रकाशकः हिंद युग्म
पृष्ठः 160
मूल्यः 150 रुपए


सत्य व्यास के द्वारा लिखी गई 'चौरासी' में ऋषि और मनु की प्रेम कहानी है।1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के निधन के पश्चात हुए दंगों का विवरण हमें इस पुस्तक में देखने को मिलता है।कैसे अपने ही पड़ोसी और जान पहचान के लोग हमारे विरुद्ध खड़े होने पर उतारू हो गए, यह देखने को मिलता है।कैसे पूरे सिख समुदाय पर नरसंहार शुरू हो गई थी? किस प्रकार किताब का नायक ऋषि हिंसक दंगो से अपने प्रेमी के परिवार को बचाता है? जबकि कि वह स्वयं दंगाई था।किरदारों की बात करें तो किरदार ज़्यादा नहीं हैं. मनु, ऋषि, छाबड़ा साहब मुख्य हैं।मनु का किरदार काफी मज़बूत है. तमाम परिस्थितियों में भी कहीं से भी कमज़ोर नहीं होता।
सत्य व्यास ने प्रेम और हिंसा यानी दोनों ध्रुवों को गजब के संतुलन में लिखा है।एक तरफ जहां प्रेम/प्रेमिका के पहले स्पर्श को दर्शाता है तो दूसरी तरफ हिंसक दंगो के सामने खड़ी मौत से रूबरू कराता है।
कुल मिलाकर इस किताब के बारे अपने शब्दों में कहूँ तो  प्रेम भी है, देश भी है, विद्रोह भी है, लाचारी भी  है, मानवता के साथ स्वार्थ भी है, राजनीति भी है।भारत देश की एक छवि भी है।जिसे लेखक ने अपनी कलम से उस खूबसूरती को पिरोया है।
किताब की भाषा की बात करें तो हमेशा की तरह नई वाली सरल हिंदी है. पढ़ने में मज़ा आता है. किताब सीधे-सीधे पढ़ी जा सकती है. एक बार में खत्म की जा सकती है।


किताब के कुछ लाइनें, जिसका जिक्र जरूरी है


“प्रेम की किस्मत में  आज भी सीढ़ियां नहीं होती, लिफ्ट नहीं होती, एस्केलेटर नहीं होते, आज भी दरिया, वो भी आग वालों से ही गुज़ारना  पड़ता  है .”

“दुनिया का समस्त ज्ञान व्यर्थ है, यदि स्त्री के मन को नहीं पढ़ पाता.“

“अफ़वाह की सबसे विनाशकारी बात यह होती है कि यह नसों में लहू की जगह नफ़रत दौड़ाती है.”

“अदला-बदली पत्रोँ की ही नहीं, पीड़ाओं की भी होती है.” “लड़की जब अपने सपनों के साथ निकलती है तो सबसे ज्यादा सुरक्षा अपने सपनों की ही करती है.” “राह भर ही नहीं, रात भर मुस्कराती रही.”



सोमवार, 3 मई 2021

तो क्या प्रधानमंत्री मोदी की हार हुई?

 बंगाल चुनाव के बाद राजनीतिक बुद्धिजीवियों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी हार गए हैं।तो क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हार गए हैं? दरअसल हकीकत यह है कि एक प्रदेश की महिला मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के पूरी झुंड को बहुत जोरदार पटखनी दी है।ममता बनर्जी ने प्रचंड जीत हासिल की है।पिछ्ली बार से ज्यादा सीटें हासिल की है।बंगाल में कोई मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं था अगर जीत होती तो मोदी जी की होती।यानि बंगाल चुनाव के मुख्य चेहरा मोदी ही थे।अब अगर हार हुई है तो हार सेहरा भी मोदी जी पर ही बांधा जाना चाहिए।अब सवाल यह है कि बंगाल चुनाव में हार का ठिठरा किस पर फूटेगा? मोदी जी हर चुनाव में प्रधानमंत्री पद भूलकर प्रचारमंत्री बन जाते हैं।मुझे लगता है इस बात केलिए उनकी  तारीफ़ भी की जानी चाहिए कि वो अपनी पार्टी के जीत केलिए सबसे ज्यादा मेहनत करने वाले प्रधानमंत्री हैं।मतलब मोदी जी हैं तो भाजपा है।पार्टी के छोटे से छोटे काम भी मोदी जी के ही कंधे पर है।पार्टी में मोदी की छवि ऐसी हो गई है कि अब मोदी जी को मुख्यमंत्री बनाने की मशीन कहे जाने में कोई गुरेज़ नहीं होना चाहिए।मोदी जी जहाँ जाते हैं उधर से जीत हासिल करके ही आते हैं लेकिन बंगाल में ममता बनर्जी ने मोदी जी का जीत अभियान रोक दिया है।यह कहने में भी गुरेज नहीं होगा कि बंगाल चुनाव परिणाम के बाद मोदी जी के व्यक्तिगत छवि का नुकसान हुआ है। अब तक पार्टी एवं कार्यकत्ताओं केलिए मोदी जी किसी फरिश्ते से कम नहीं थे।लेकिन अब  देशवासियों के नजर से उतरते जा रहें हैं। इसके कई कारण हैं मेरे नजर में पहला कारण किसान आंदोलन।क्योंकि याद होगा किसान आंदोलन को भाजपा ने आतंकियों अड्डा बताया था।इसके बाद भी प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी।दूसरा कारण कोरोना जैसे आपदा के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने बंगाल चुनाव केलिए  जिस तरह से अपने कर्तव्य, अपनी जिम्मेदारियों को भुला।उससे देशवासियों के नजर में और गिर गए हैं।लोगों में यह संदेश साफ तौर पर पहुंचा है कि आये दिन लोग   हजारों की संख्या में मरते जा रहे थे लेकिन मोदी चुनाव में व्यस्त थे।एक के बाद एक तारातरा रैली करते जा रहे थे।लाखों की संख्या में उनकी रैलियों में लोग पहुँच रहे थे।वो भी बिना मास्क और बिना किसी सोशल डिस्टेंस के।जो खुद कहते हैं कि जब तक दवाई नहीं तब तक ढिलाई नहीं।दो गज-दूरी मास्क है जरूरी।जो खुद कहते हैं कि घर में रह कर ही कोरोना को हराया जा सकता है।लेकिन उन्होंने अपनी कही बात को एक बार फिर जुमला साबित कर दिया है।यह बात कहने में कही से संकोच नहीं कि जानी चाहिए देश के प्रधानमंत्री ने अपनी ही फायदे केलिए अपने ही देशवासियों को कोरोना के मुँह में झोंक दिया।लाशों की जाल बिछा दीं।इस कोरोना महामारी में जिन लोगों ने अपनों को खोया है।जिनको अस्पताल में जगह नहीं मिली।जिन्होंने ऑक्सीजन के बिना अपना प्राण त्याग दिया।जिनलोगों को दवाई नहीं मिली।जिनलोगों को शमशान में दो-दो-तीन-तीन दिन लाईन में लगानी पड़ रही थी।जिन लोगों को शमशान में लकड़ियां नहीं मिली।वो लोग तो प्रधानमंत्री की चुपड़ी - चुपड़ी बातों से मनने वाले तो नहीं हैं।

लोग अब तक प्रधानमंत्री की हर बात मानते आए हैं चाहें वो नोटबन्दी हो ,ताली-थाली बजाना हो,दिया जलाना हो,पूरे देश में ताला बंदी करनी की बात हो।

मेरा मानना है बंगाल में केवल भाजपा की हार नहीं हुई है।बल्कि देश के अभिभावक,बड़े बुजुर्ग घर के सदस्य के तौर पर इनकी छवि धूमिल हुई है।चाहे वो टैगोर वाली छवि ही क्यों न हो। स्वघोषित प्रधानसेवक की छवि भी धूमिल हुई है।



शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

सरकारें मर चुकी है।

 "उत्तर प्रदेश प्राथमिक शिक्षक संघ ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, राज्य चुनाव आयोग और बेसिक शिक्षा मंत्री को लिखे पत्र में बताया है कि पंचायत चुनाव ड्यूटी के दौरान कोरोना संक्रमित हुए 706 प्राथमिक शिक्षकों और बेसिक शिक्षा विभाग के कर्मचारियों की जान गई है. संघ ने मतगणना टालने की मांग की है."

        हे भगवान!क्या हो रहा है इस देश में?अब तो सरकार नाम से ही घिन आती है।जनता के वोट से पालने वाली सरकार इतना मक्कार हो सकती है।एक के बाद एक मौत होती जा रही है लेकिन सरकार को सिर्फ चुनाव से मतलब है।चाहे वो चुनाव लाशों के ढ़ेर पर ही क्यों न हो?लानत है ऐसी सरकार और मतलबफरोस नेतागण जो चुनाव केलिए इस देश को श्मशान बना दिया है।क्या जरूरी है चुनाव कराना?क्या जरूरी है मतगणना करना? जब पता है कि सैकड़ो मतदानकर्मियों की मौत हो चुकी है।लेकिन फिर भी ये सरकार सोयी हुई है।अब भी समय है प्रधानसेवक जी यूपी (पंचायत चुनाव) समेत पांच राज्यों के मतगणना को रोक दीजिए।नहीं तो आगे क्या होगा? अब  भगवान ही मालिक हैं।

अगर अब भी सरकार चुप रहती है और मतगणना कराई जाती है तो हमें यह समझ लेना होगा कि सरकारों को आपके जान से कोई लेना देना नहीं है।आप सरकार के लिए सिर्फ संख्या मात्र हैं।इनको लाशों के ढ़ेर में चुनाव लड़ने में कई दिक्कत नहीं है।

आपको याद होगा हाल ही में मद्रास हाईकोर्ट ने कहा था कि चुनाव आयोग ने रैली क्यों नहीं रोकी? कोर्ट ने चुनाव आयोग को गैर-जिम्मेदार संस्था भी कहा था एवं इसके अधिकारियों पर हत्या का मामला चलाना चाहिए।लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह मामला चलायेगा कौन? क्योंकि इसके पीछे तो सरकार ही खड़ी है।



Arunesh Kumar

गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

आप प्रधानमंत्री हैं प्रचारमंत्री नहीं

 हे महाराज! चुनाव आप अपने देश में लड़ते हो तो यहीं लड़ो न।क्यों दूसरे देश में जाकर प्रचार करते हैं? इससे बनी बनाई रिश्ते खराब होते हैं।लीजिए बाइडेन ने भी कह दिया कि अब हम भारत को वैक्सीन बनाने वाले कच्चे माल नहीं देंगे।आपको तो सिर्फ चमचागिरी करना था।अबकी बार ट्रम्प सरकार-अबकी बार ट्रम्प सरकार।तो कीजिए एक के बाद एक रैली।इसलिए कहते हैं लुबुर-लुबुर करने से छवि ही खराब होती है।लेकिन ये बात आपको तोसमझ आएगी भी नहीं।

पिछले साल आप ट्रम्प को हाइड्रोऑक्सीड भेज रहे थे।दे- दना- दन भेजते जा रहे थे।लेकिन अंत में क्या हुआ कूटनीति सब धरे-के-धरे रह गया।

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

ऐसे में जनता क्या करें?

 हमें लगता है भारतीय नेताओं जैसी घोषणा दुनिया के किसी देश के नेता नहीं करते होंगे।घोषणा करके लोगों का ध्यान भटकाना कोई भारतीय नेताओं से सीखें।इस समय, जब देश को सबसे ज्यादा जरूरत अस्पतालों में ऑक्सीजन, बेड, दवाई ,डॉक्टर्स एवं अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की है, तब हमारे देश के नेतागण इस पर ठोस बात न करके एक मई से अठारह (18) वर्ष के ऊपर सभी लोगों को टीका लगाने की घोषणा कर रहें। भला यह कैसे होगा? इसका अभी तक कोई खाका तैयार नहीं किया गया। अमेरिका जैसे देश की आबादी हमारे देश की चौथाई भर है इसके बावजूद भी वहां टीके बनाने वाले कई कम्पनियां हैं।उसने अब जाकर सभी युवाओं को टीका देने की शुरुआत की है।मगर अपने यहां तो सिर्फ दो ही कम्पनियां है,जो सीमित मात्रा में टीके का उत्पादन कर रही है।हालांकि कुछ टीके का आयात करने का फैसला भी किया गया है लेकिन यह कब तक सम्भव होगा, पता नहीं।ऐसे में यह सवाल बड़ा गंभीर है कि  जब हम 45 साल के ऊपर वाले सभी लोगों को टीका नहीं दे पा रहे हैं, तो लगभग 70 करोड़ नई आबादी केलिए कहां से टीका आएगा? ऐसे तो पूरे देश में अफरा-तफरी मच जायेगी।

दूसरी स्थिति यह है कि जिन वरिष्ठ नागरिकों के टीके की दूसरी खुराक  नहीं मिल पा रही है,जिनके टीकाकरण का वक्त आगया है।समस्या यह हो चुकी है कि अस्पतालों में न टीके उपलब्ध हैं न इसकी आस-पास कोई व्यवस्था हो पा रही है।हालात तो ऐसे हो गए हैं कि बुजुर्ग लोग अस्पताल जा रहे हैं लेकिन टीका उपलब्ध न होने के कारण लौटकर  आ जा रहे हैं। ऐसे में बुजुर्ग क्या करें? कोरोना के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए हर अस्पताल के चक्कर भी नहीं लगाए जा सकते हैं।यानी कोरोना के मरीज लगातार बढ़ रहें हैं।लेकिन सरकार टीकाकरण अभियान का उचित प्रबंधन नहीं कर पा रही है।जहां भी कमियां सामने आ रही है,वहां हमारी सरकार को पूरी मुस्तैदी से काम करना चाहिए।लेकिन आलम यह है कि आज देश में कोरोना से कम लेकिन सरकार की व्यवस्था के कारण ज्यादा लोग मर रहें।



अरुणेश कुमार,

सोमवार, 19 अप्रैल 2021

बिहार के स्वास्थ्य व्यवस्था

 कोरोना वायरस लगातार बढ़ रहा है. बढ़ता कोरोना एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल रहा है. बिहार की राजधानी पटना में इलाज न मिलने से कई मरीजों की मौत हुई है. राजधानी पटना के सबसे बड़े दूसरे अस्पताल NMCH में कोरोना संक्रमित मरीजों की हो रही लगातार मौत से पीड़ित परिजनों में खासा आक्रोश है. पटना में कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच NMCH अस्पताल में सभी बेड भर गए हैं. अस्पताल के बाहर एम्बुलेंस में पड़े मरीज की मौत होने से परिजनों का रो-रो कर बुरा हाल है.

 

बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था हो या शिक्षा व्यवस्था आए दिन सवालों  के घेरे में रहता है।हैरानी तो तब हुई जब NMCH के सुपरिटेंडेंट ने सरकारी व्यवस्था के कारण इस्तीफे की पेशकश कर दी।कारण यह था कि अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी होई गई थी।सुपरिटेंडेंट के सभी प्रयास विफल हो रहे थे,अंत में इस्तीफे की पेशकश कर दी।

अफवाहों से बचे

 जब से कोरोना का कहर भारत मे शुरू हुआ है,तब से संक्रमण तो फैला ही है,पर उससे कहीं ज्यादा अफवाहें फैली है।कई तरह की बात सोशल मीडिया पर की जा रही है।खानपान से लेकर इलाज संबंधी जानकारियां लोगों द्वारा शेयर की जा रही है , अब इसमें कितनी सच्चाई है कोई नहीं जानता।अब एक बात तो स्पष्ट हो चुकी की जैसे जैसे कोरोना का संक्रमण बढ़ते जा रहा है वैसे वैसे झोला छाप डॉक्टरों की संख्या भी बढ़ती जा रही है।अब एक उदाहरण मास्क का ही ले लीजिए। चुनावी रैलियों में तमाम तस्वीरें दिखाकर मज़ाज बनाया जा रहा है।लोग तो यह कहने लगे हैं कि जहां चुनाव है वहां कोरोना नहीं है।वैसे लोगों को समझना चाहिए कि राजनीतिक दल तो अपनी अपनी सियासी रोटियां सेंककर निकल जाएंगे,लेकिन बाद में झेलना तो जनता को ही है।इसलिए अपनी सुरक्षा का ख़्याल रखना प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है।हमें ऐसी अफवाहें पर ध्यान न देते हुए कोरोना से बचाव के उपाय करने चाहिए।

शनिवार, 10 अप्रैल 2021

नैना : संजीव पालीवाल

 किताब : नैना -'एक मशहूर न्यूज एंकर की हत्या'

लेखक : संजीव पालीवाल

प्रकाशक : एका (वैस्टलैंड)

पृष्ठ : 272


'नैना' मर्डर मिस्ट्री पर आधारित लेखक और साहित्यकार संजीव पालीवाल की पहली उपन्यास है।इस किताब की कहानी नेशनल चैंनल के न्यूज़ एंकर के जीवन पर आधारित है।जिसका नाम नैना वशिष्ठ है।नैना एक खुशमिजाज लड़की है जिसको  अपने जीवन में करियर को लेकर  खुद को केंद्रित रहना ज्यादा पसंद है।नैना अपने जीवन में ऊंचाईयों पर जाने की चाह रखती है।उसकी हर वो सपना साकार होता है जो वो करना चाहती है। उसकी ज़िन्दगी में रुतबा, पैसा सब कुछ है। लेकिन एक रोज़ उसका कत़्ल हो जाता है। शक नैना के पति समेत दो लोग पर जाता है।लेकिन क़त्ल कौन करता है? ये तो किताब पढ़ने के बाद ही पता चलेगा। इस किताब में सबसे मजेदार तब लगती है जब नैना की मौत एक दिन पहले हो जाती है।लेकिन जब कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है सस्पेंस बढ़ते जाता है।  


लेखक ने बताने की कोशिश की है टीवी के चकाचौंध के पीछे की हकीकत कैसी होती है? कैसे ज़िन्दगी दौड़ती है, जिसमें आप इतनी तेज़ होते हैं कि वक्त पीछे छूटता सा लगता है। टीवी न्यूज़ चैनलों की दुनिया में क्या घटता है, कोई घुटता है, कैसे होता है वो सब जो हम बाहर से नहीं जान पाते, और किस तरह वो उसे महसूस करते हैं जो उस शोहरत भरी ज़िन्दगी को जी रहे हैं।

इस कहानी के जरिए टीवी की चकाचौंध की सच्चाई जाने पढ़कर चौंक सकते हैं।यह किताब में आजकल के समाज के रिश्तों को भी बयाँ करती है।

कुल मिलाकर इस किताब की कहानी रोचक और रहस्यमयी है।किताब की भाषा सरल और साधारण होने के कारण पाठक को अंत अंत बांधे रहता है।

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

इंडियन एक्सप्रेस की यह रिपोर्ट बेरोजगारी केलिए चिंता का विषय

 

कोरोना महामारी के बीच अनियोजित तरीके से लागू किए गए लॉकडाउन के चलते करोड़ों की संख्या में दिहाड़ी मजदूर अपने गांवों की ओर लौटने को मजबूर हुए थे. ऐसे में ग्रामीण रोजगार योजना मनरेगा उनकी आजीविका का एकमात्र जरिया बना.
साल 2006-07 में मनरेगा की शुरूआत के बाद से पहली बार ऐसा हुआ है कि इस योजना के तहत किसी एक वित्तीय वर्ष (2020-21) में 11 करोड़ से अधिक लोगों ने कार्य किया है. यह रिपोर्ट दिखाता है कि लॉकडाउन के कारण बेरोजगारी कितना चिंता जनक है।

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, एक अप्रैल तक के आंकड़ों के मुताबिक 2020-21 में 11.17 करोड़ लोगों ने कार्य किया, जो 2019-20 में कार्य किए 7.88 करोड़ लोगों की तुलना में 41.75 फीसदी अधिक है.

उपलब्ध आंकड़े दर्शाते हैं कि इससे पहले 2013-14 से 2019-20 के बीच 6.21 करोड़ से 7.88 करोड़ लोगों ने मनरेगा के तहत रोजगार प्राप्त किया था.

वहीं यदि परिवारों के आंकड़ों को देखें तो वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान सबसे ज्यादा 7.54 करोड़ परिवारों ने मनरेगा में काम किया. यह 2019-20 में काम किए 5.48 करोड़ परिवारों की तुलना में 37.59 फीसदी अधिक है. इससे पहले सबसे ज्यादा परिवारों द्वारा मनरेगा में काम करने का रिकॉर्ड वर्ष 2010-11 का था, जब 5.5 करोड़ परिवारों ने काम किया था.

इसके साथ ही 2020-21 में सबसे ज्यादा 68.58 लाख परिवारों ने मनरेगा में 100 दिन के लिए काम किया, जो कि इससे पहले 2019-20 में 40.60 लाख परिवारों द्वारा पूरा किए गए 100 दिन के कार्य की तुलना में 68.91 फीसदी अधिक है.

कुल मिलाकर वित्त वर्ष 2020-21 में प्रति परिवार ने औसतन 51.51 दिन काम किया, जो कि इससे पहले 2019-20 में 48.4 दिन की तुलना में थोड़ा अधिक है.

याद हो कि कोरोना वायरस के चलते उत्पन्न हुए अप्रत्याशित संकट के समाधान के लिए मोदी सरकार ने ‘आत्मनिर्भर भारत योजना’ के तहत मनरेगा योजना के बजट में 40,000 करोड़ रुपये की वृद्धि की थी.

इस तरह पूर्व में निर्धारित 61,500 करोड़ रुपये को मिलाकर मौजूदा वित्त वर्ष 2020-21 के लिए मनरेगा योजना का बढ़कर 1.01 लाख करोड़ रुपये हो गया. किसी वित्त वर्ष के लिए यह अब तक का सर्वाधिक मनरेगा बजट था.