शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

डार्क हॉर्स' : नीलोत्पल मृणाल

 

डार्क हॉर्स' नीलोत्पल मृणाल का उपन्यास है जिसकी कहानी सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे छात्रों के इर्द-गिर्द घूमती है।इसकी टैग लाइन है 'एक अनकहीं दास्तां...'।
 ‘‘डार्क हॉर्स’ महज एक उपन्यास भर नहीं हैबल्कि छात्र जीवन की अनगिनत अनकही कहानियों का संग्रह हैजो सभी छात्रों के जीवन से ताल्लुक रखता है।खासकर वैसे छात्र जो मुखर्जीनगर में जाकर सिविल सर्विस की तैयारी कर रहें होते हैं।

'डार्क हॉर्स’ का मुख्य किरदार संतोष बिहार के भागलपुर से सिविल सर्विस की तैयारी के लिए दिल्ली आता है। उत्तर प्रदेशबिहार जैसे हिंदी पट्टी के राज्यों से सिविल सर्विस की तैयारी करने के लिए लड़के या तो इलाहाबाद का रुख करते हैं या तो दिल्ली का। खास तौर से हिंदी माध्यम से तैयारी करने वाले लड़कों के लिए ये दो जगहें ही महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। जो थोड़े कमजोर घर से होते हैंवे इलाहाबाद रह कर तैयारी करते हैंऔर जो थोड़े साधन-संपन्न होते हैंवे दिल्ली के मुखर्जी नगर में अपना ठीकाना बनाते हैं।
‘जेतना दिन में लोग एमए - पीएचडी करेगा, हौंक के पढ़ दिया तो ओतना दिन में तो आईएसे बन जाएगा।’  नीलोत्पल मृणाल की यह लाइन काफी अच्छी लगी ,प्रभावशाली भी।साथ ही सिविल सर्विस के तैयारी कर रहे हैं उन छात्रों के लिए है जो बिहार- यूपी से तमाम ख़्वाब लेकर दिल्ली, इलाहाबाद जाते हैं।
इस उपन्यास को पढ़ते समय ऐसा महसूस होता है कि हम स्वयं मुखर्जीनगर के उन गलियारों में घूम रहे हैं जहाँ के हर-गली,मोहल्ला सिविल सर्विसेज के छात्रों से भरा पड़ा रहता है।जहां सबके जुबान पर भोजपुरिया टोन के माहौल देखने को मिलता है।यह भी नजर आता है कि छात्र किस तरह से खुद को माहौल के अनुसार समझौता कर लेता है।
इस किताब में सिर्फ सिविल सर्विस के तैयारी ही छात्रों की कहानी ही नहीं, बल्कि उनके गांव - शहर,संस्कृति, भाषा ,रहन-सहन, खानपान से लेकर उनके विचारों को दिखाने का प्रयास किया है। 'नीलोत्पल मृणाल' ने। 

दिल्ली के मुखर्जीनगर से लेकर यूपी-बिहार  गांवो का सफर करना चाहते या सिविल सर्विस के तैयारी कर रहें छात्रों के जीवंत घटनाओं से परिचय होना चाहते हैं तो 'डार्क हॉर्स' पढ़ सकते हैं।



गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

नल जल योजना के हकीकत

 जिस तरह से बिहार में कोरोना टेस्टिंग के घोटाले सामने आ रहे हैं उस तरह से नल जल योजना भी सवालों के घेरे में है।हर घर नल का जल योजना की शुरूआत 2017 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने की थी। लेकिन तीन वर्ष बाद भी योजना पूर्ण नहीं हो पाया है। इसके साथ ही कई जगहों पर तमाम घोटाले देखने को मिल रहे हैं।सरकार सिर्फ यह प्रचार करने में लगी रहती है कि हमने नलजल योजना के माध्यम से हर घर पानी पहुँचाने में सफल रहें।लेकिन क्या सरकार कोई सर्वे करा पाई है,क्या कोई डाटा है सरकार के पास ,इस योजना के अंतर्गत कितने लोग पानी का इस्तेमाल कर रहें हैं या नहीं? कई ऐसे जगह देखने को मिल रहा है जहां देखने केलिए टंकी लगा दिया गया है लेकिन पानी आज तक किसी के घर पहुँच नहीं पाया।कई ऐसे जगह है जहां कार्य शुरू होकर भी आज तक समाप्त नहीं हो पाया है।कई ऐसे जगह है जहाँ सिर्फ उदघाटन  होने के साथ पानी पहुँचना शुरू तो हुआ लेकिन उसके बाद आज तक लोग तरस रहे हैं पानी के लिए।कई वार्ड ऐसे हैं, जहां योजना पूरा कर लिया गया है, लेकिन हर घर तक पानी नहीं पहुंच पाया है।आये दिन इन योजना में घोटाले सामने आरहे हैं।




बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

महंगाई की मार

 कोरोना काल में आम आदमी की जेब तो ऐसे ही ढ़ीली पड़ गई है।अब ये महंगाई आम आदमी का जीना मुश्किल कर दिया है।पिछले कुछ दिनों से लगातार पेट्रोल, डीज़ल और गैसों के दाम में बढ़ोतरी हो रही जिसे आम आदमी महंगाई के बोझ तले दबता चले जा रहा है।

एक तरफ पेट्रोल कुछ शहरों में शतक लगा चुका है ,दूसरी तरफ गैसों के दाम में आए दिन बढ़ोतरी की जा रही है।अगर ऐसे ही गैसों के दाम बढ़ते रहे तो आम आदमी फिर से जीवाश्म ईंधन प्रयोग करने केलिए मजबूर हो जाएंगे।

पिछले 10 दिनों के भीतर  रसोई गैस के सिलेंडर में 75 रुपये की बढ़ोतरी की गई है।यही नहीं, दो महीने के भीतर सिलेंडर की कीमत में 175 रुपये की वृद्धि की जा चुकी है. आज के समय में राजधानी दिल्ली में एक सिलेंडर 769 रुपये का बिक रहा है।इससे आम जन जीवन प्रभावित हो रहा है।सरकार को चाहिए कि आम आदमी के समस्याओं को समझते हुए महंगाई को कम करने का कोशिश करें।

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

हिंसक होना देशहित व समाज हित कतई नहीं

 युवाओं को हिंसक गतिविधियों में शामिल होना बड़ा चिंतनीय विषय है।हाल ही में बिहार सरकार ने एक नई दिशा-निर्देश जारी की है कि हिंसक-गतिविधि में शामिल युवाओं को अनुबंध के आधार पर सरकारी नौकरी में शामिल नहीं की जायेगी।सरकार चाहती है कि हमारे युवा हिंसक न हो।बेशक हिंसक होना देशहित व समाजहित में कतई नहीं है।लेकिन सरकार के इस नियमावली में एक बड़ा सवाल खड़ा करती है कि अगर युवा जायज मांग केलिए आंदोलन-प्रदर्शन कर रहें हो और कुछ असामाजिक तत्वों के लोग आंदोलन को हिंसक रूप में परिवर्तित कर दें तब क्या होगा? ज्यादातर देखा गया है कि हिंसक आंदोलन में निर्दोष लोग ही फंस जाते हैं।पुलिस की क्या भूमिका रहती है इसे कहने की जरूरत नहीं है?राजनीतिक दलों की क्या भूमिका रहती है यह भी कहने की जरूरत नहीं है?

गंभीर आपराधिक रूप से लिपटे लोगों के लिए तो पहले से ही कानून थे लेकिन अब हिंसा में शामिल लोगों केलिए यह प्रावधान लाई जा रही है।ताकि युवा इस डर से सरकार के विरोध में कोई आंदोलन न करें।
लेकिन ये प्रावधान तो सिर्फ युवाओं के लिए है तो क्या सरकार उन नेताओं पर अंकुश लगाएगी जो किसी राजनीतिक आंदोलन को हिंसक रूप देते हैं? क्या उन नेताओं के लिए चुनाव न लड़ने का कोई प्रावधान ला सकती है? 



बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

पत्रकारिता का संकट

सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले पत्रकारों पर कार्रवाई को लेकर इन दिनों लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं।अभी खबरें आ रही है कि न्यूज़क्लिक के ऑफिस में ईडी ने छापा मारा है।  हाल ही में सिंघु बॉर्डर पर किसान आंदोलन को कवर कर रहे पत्रकार मनदीप पूनिया को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया था। इसका भी सोशल मीडिया पर जोरदार विरोध हुआ था। इसके बाद दिल्ली की एक अदालत ने पूनिया को जमानत दे दी थी। 
किसान आंदोलन से जुड़ी ख़बरों को लेकर वरिष्ठ पत्रकार राजदीप ,मृणाल पाण्डेय, कांग्रेस सांसद शशि थरूर सहित पत्रकार परेश नाथ, अनंत नाथ और विनोद के जोस के ख़िलाफ़ दिल्ली, नोएडा में एफ़आईआर हो चुकी है। इसे लेकर सोशल मीडिया पर सरकार की खासी आलोचना हो रही है। 
हालांकि मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए छह पत्रकारों और कांग्रेस सांसद शशि थरूर को बड़ी राहत दी है। अदालत ने कहा है कि अगले आदेश तक इन लोगों को गिरफ़्तार नहीं किया जा सकता है। 


मंगलवार, 9 फ़रवरी 2021

विपक्ष का संकट

 

एक स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए एक मज़बूत सरकार के सामने एक मजबूत विपक्ष का होना ज़रूरी समझा जाता है. विपक्ष सरकार के कार्यों और नीतियों पर सवाल उठाता है और उसे निरंकुश होने से रोकता है.



संसद में अगर विपक्ष कमज़ोर होता है तो मनमाने तरीके से सत्ता पक्ष कानून बना सकता है और सदन में किसी मुद्दे पर अच्छी बहस मज़बूत विपक्ष के बिना संभव नहीं है.लेकिन मौजूदा वक्त में वही विपक्ष अगर सवाल करता है तो बड़ा हास्यास्पद लगता है।क्या आप के पास कोई आकड़ा है कि किसान आंदोलन में अभी तक कितने किसानों ने खुदख़ुशी की है?तब सरकार का जवाब आता है नहीं हमारे पास कोई आकड़ा नहीं है।यहां तक मौजूदा वक्त में विपक्ष के साथ कैसा बर्ताव किया जा रहा है चाहे वो सकारात्मक सवाल क्यों न उठा रहा हो लेकिन सत्ता पक्ष जवाब देने के बजाए नकारात्मक साबित करने केलिए एक अलग माहौल चला देती है।

दरअसल बीते अस्सी दिनों से चल रहे आंदोलन में लगभग दो सौ से अधिक किसानों की जाने जा चुकी है।लेकिन सरकार के पास कोई आकड़ा नहीं है।यह आंदोलन एक बड़ा सवाल खड़ा कर रही है।अगर किसान बिल किसानों के हित में है तो क्यों आज तक मोदी सरकार किसानों को समझाने में नाकाम रही है?

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2021

कांग्रेस का संकट

 देश की सबसे पुरानी पार्टी के अध्यक्ष पद का चुनाव लगातार चर्चा का विषय बनते जा रहा है।पहले बताया गया था कि मई में चुनाव होगा परंतु अब जून में होगी।भले ही अब जून में  होगा लेकिन क्या पता जून में होगा भी या नहीं ये कहना मुश्किल है।क्योंकि जिस प्रकार से नेतृत्व कांग्रेस कर रही है ये विचारणीय तो है ही।लगातार कांग्रेस कमजोर होती नजर आ रही है।हाल ही में लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद राहुल गांधी ने यह कहते हुए अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था कि अब गांधी परिवार से बाहर से कोई अध्यक्ष पद केलिए चयनित होगा।लेकिन आखिर में फिर से सोनिया गांधी को बना दिया गया।उसके बाद भी माना जा रहा था कि यह चुनाव कुछ समय केलिए ही की गई है,पर अब एक साल से ज्यादा हो चुकी है लेकिन अब तक कुछ हुआ नहीं।यह सत्य भी है कि राहुल गांधी अध्यक्ष पद पर न रहते हुए भी पार्टी का फैसला लेते रहें हैं।जब राहुल गांधी के निशाने पर सीधा प्रधानमंत्री मोदी होते हैं तब कांग्रेस अपने ही नेता अपने ही से लड़ रहे होते हैं।चाहे वो मध्यप्रदेश में कमलनाथ और सिंधिया हो या फिर राजस्थान में गहलोत और पायलट हों।  पिछले कुछ सालों में देख गया है कि पार्टी अपने किसी एक स्टैंड पर खड़ी नहीं होती है।हाल ही में  कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल समेत कई नेताओं ने पार्टी नेतृत्व पर सवाल खड़ा कर चुके हैं।


मेरा मानना है कि कांग्रेस मतलब गांधी परिवार पार्टी के ही कुछ चाटुकारों से घिर गया है।ये चाटूकार अपने स्वार्थ केलिए गाँधी परिवार की चमचागिरी करते रहते हैं।यह मैं इसलिए कह रहा हूँ कि पार्टी के सदस्यगण खुद फैसला लेने के बजाए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर छोड़ देते हैं।तब यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सोनिया गांधी अपनी  पार्टी के अंदरूनी मामला को सुलझा पायेगी? यह कहना भी मुश्किल है कि कब कांग्रेस नेतृत्व अपने को मजबूत कर पाएगी और अध्यक्ष पद का चुनाव कब तक करेगी ?

समस्या यह नहीं है कि हर फैसला सोनिया गांधी के नाम पर टाला जा रहा है बल्कि यह है कि उन मुद्दों पर कहीं कोई समाधान निकलता नहीं दिख रहा है।

कांग्रेस केलिए बेहतर होगा कि नेतृत्व को मजबूत करें और यही भी समझे कि इन सबका जिम्मेदार वह स्वयं खुद है।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

डायरी -3

 प्यार हमारा अमर रहेगा याद करेगा जहान

तु मुमताज हैं मेरे ख्वाबो की मै तेरा शाहेजहा


ये गीत जब भी सुनता हूँ।सबसे पहले तुम्हारा ही ख्याल आता है।आज भी मैं तुम्हारी  ही आवाज में सुनना पसंद करता हूँ।अरे आज कल  तो पहले से ज्यादा सुनने लगा हूँ।

पता नहीं मुझे , तुम्हें याद है या ये भी भूल गई।पर मैं तो चाह कर भी नहीं भूल सकता हूँ।

चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते, खाते-पीते हर वक्त याद आती रहती  हो।तुम में क्या बात है, वो मैं भी नहीं जानता, लेकिन तुम  में कुछ न कुछ तो जरूर है।इसलिए तो चाह कर भी नहीं भूल पाता हूँ।

मानता हूं अब सिर्फ औपचारिकता ही रह गया है।अब पहले जैसा कुछ नहीं पर मैंने हर वो पल को बचा रखी है जो कभी हमने महसूस किए थे।

जब तक हम एक थे तब तक बिना एक दूसरे का हाल जाने बगैर चैन से न रह पाते थे।पर अब तो ऐसा कुछ न होता है।नाराजगी तो उस वक्त भी होती थी पर रूठना मनाना तो अहम हिस्सा था।

सच पूछो तो मैंने कभी सोचा नहीं था कि इतनी छोटी वक्त के लिये आओगी।

सच में ये उम्मीद भी कितनी अजीब है नlसब जानते हुए भी एक उम्मीद बची है कि सब कुछ पहले जैसा हो जाने की उम्मीद।घण्टों बात करने की उम्मीद,फिर से वही फ़ोन कॉल की उम्मीद।उम्मीद है लौट आने की।पर ये उम्मीद तो हर रोज टूटी है फिर पता न ये उम्मीद होती क्यों है?


शनिवार, 30 जनवरी 2021

गांधी से महात्मा गांधी का सफर

 

महात्मा गाँधी की पुण्य तिथि पर शहीद दिवस हर वर्ष 30 जनवरी को मनाया जाता है। 30 जनवरी, 1948 का ही वह दिन था, जब शाम की प्रार्थना के दौरान सूर्यास्त के पहले महात्मा गाँधी पर हमला किया गया था। वे भारत के महान् स्वतंत्रता सेनानी थे और लाखों शहीदों के बीच में महान् देशभक्त के रूप में गिने जाते थे। भारत की आजादी, विकास और लोक कल्याण के लिये वे अपने पूरे जीवन भर कड़ा संघर्ष करते रहे। 30 जनवरी को नाथूराम गोड़से ने महात्मा गाँधी की गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी, जिसके कारण यह दिन भारत सरकार द्वारा शहीद दिवस के रूप में घोषित किया गया है। तब से, महात्मा गाँधी को श्रद्धंजलि देने के लिये हर वर्ष 30 जनवरी को शहीद दिवस मनाया जाता है। 30 जनवरी, 1948 देश के लिये सबसे दु:ख का दिन है, जो भारतीय इतिहास के लिये सबसे जहरीला दिन बन गया था। गांधी स्मृति वह जगह है, जहाँ शाम की प्रार्थना के दौरान बिरला हाऊस में 78 वर्ष की उम्र में महात्मा गाँधी की हत्या हुई थी।

"पाँच फ़रवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के चौरी चोरा नामक स्थान पर गांधी जी के ‘असहयोग आंदोलन’ में भाग लेने वाले प्रदर्शनकारियों के एक बड़े समूह से पुलिसकर्मियों की भिड़ंत हो गई थी।जवाबी कार्रवाई में प्रदर्शनकारियों ने एक पुलिस चौकी में आग लगा दी थी जिसके कारण बाईस पुलिसकर्मी और तीन नागरिक मारे गए थे।हिंसा की इस घटना से व्यथित होकर गांधी जी ने अपने ‘असहयोग आंदोलन’ को रोक दिया था।पर उन्होंने अपनी माँगों को लेकर किए जा रहे संघर्ष पर विराम नहीं लगाया; उसमें बड़ा संशोधन कर दिया।



गांधी ने अपनी रणनीति पर विचार पुनर्विचार किया। दो साल बाद 12 मार्च 1930 को ‘नमक सत्याग्रह’ के सिलसिले में जब अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से चौबीस दिनों के लिए 378 किलो मीटर दूर दांडी तक यात्रा निकाली तो उसमें सिर्फ़ अस्सी अहिंसक सत्याग्रही थे। एक-एक व्यक्ति का चयन गांधी ने स्वयं किया था और उसमें समूचे भारत का प्रतिनिधित्व था।ज़्यादातर सत्याग्रहियों की उम्र सोलह से पच्चीस वर्ष के बीच थी। छह अप्रैल 1930 को जब गांधी ने दांडी पहुँचकर नमक का कानून तोड़ा तो अंग्रेज़ी हुकूमत हिल गई थी।"

जब महात्मा गाँधी चम्पारण पहुँचे तो उन्होंने पाया कि वहां हजारों भूमिहीन एवं गरीब किसान खाद्यान के बजाय नील की फसलों की खेती करने के लिये बाध्य हो रहे थे. नील की खेती करने वाले किसानों पर अंग्रेज़ों के अलावा कुछ बगान मालिक भी जुल्म ढा रहे थे. चम्पारण के किसानों से अंग्रेज़ बाग़ान मालिकों ने एक अनुबंध करा लिया था जिसके अंतर्गत किसानों को ज़मीन के 3/20वें हिस्से पर नील की खेती करना अनिवार्य था जिसे  'तिनकठिया पद्धति' कहते थे.

यहीं से मोहनदास करमचंद गांधी को 'महात्मा' के तौर पर पहचान मिला तथा चम्पारण सत्याग्रह को भारत की आज़ादी के इतिहास का मील का पत्थर माना जाने लगा. कहा तो ये भी जाता है कि इसी आंदोलन से प्रभावित होकर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें 'महात्मा" नाम से संबोधित किया था और तभी से लोग उन्हें महात्मा गांधी कहने लगे थे.



जब महात्मा गाँधी 15 अप्रैल, 1917 को मोतिहारी पहुँचे थे तब पूरे महात्मा गांधी, चम्पारण, बिहार में किसानों के भीतर आत्म-विश्वास का जबर्दस्त संचार हुआ था जिसके कारण गांधीजी को धारा-144 के तहत सार्वजनिक शांति भंग करने के प्रयास की नोटिस भेजी गई थी. लेकिन इसका कुछ भी असर उन पर नहीं पड़ा बल्कि उनका कद और ख्याति बढ़ती ही चली गई. अब मार्च 1918 आते-आते 'चंपारण एगरेरियन बिल' पर गवर्नर-जनरल के हस्ताक्षर के साथ तीनकठिया समेत कृषि संबंधी अन्य अवैध कानून भी समाप्त हो गए थे.  मोहनदास करमचंद गांधी द्वारा 1917 में संचालित यह सत्याग्रह भारतीय इतिहास की एक ऐसी घटना थी, जिसने ब्रिटिश साम्राज्यवाद को खुली चुनौती दी थी. गांधीजी की अगुवाई वाले इस आंदोलन से न सिर्फ नील के किसानों की समस्याओं का फौरन हल हुआ था, बल्कि सत्य, अहिंसा और प्रेम के संदेश ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध भारतीयों को एकजुट भी किया था.

बुधवार, 13 जनवरी 2021

युवाओं के प्रेरणा स्रोत रहे हैं स्वामी विवेकानंद

 

स्वामी विवेकानंद जी की जन्मतिथि को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में हमारे देश में मनाया जाता है। वो युवाओं के लिए सच्चे आदर्श हैं। वे कई पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत रहे हैं और आगे भी रहेंगे। 1984 में भारत सरकार ने स्वामी विवेकानंद जयंती पर इसे मनाने की घोषणा की थी। प्रेरणा के अपार स्रोत रहे और आज भी युवाओं के लिए स्वामी विवेकानंद की कही एक-एक बात ऊर्जा से भर देती है। अपने छोटे से जीवन में ही उन्होंने पूरे दुनिया पर भारत और हिंदुत्व की गहरी छाप छोड़ी। शिकागो में दिया गया भाषण आज भी गर्व से भर देता है। विवेकानंद ने अमेरिका के शिकागो में 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था. उन्होंने शिकागो में अपने भाषण से सभी आश्चर्यचकित किया था. इसके बाद अमेरिका और यूरोप में भारतीय वेदांत दर्शन के प्रति दिलचस्पी जगने लगी थी.
शिकागो सम्मेलन में उन्हें 02 मिनट का ही समय दिया गया था लेकिन जब उन्होंने भाषण की शुरुआत "मेरे अमेरिकी बहनों एवं भाइयों" से की, तो इस संबोधन ने सबका दिल जीत लिया. इसके बाद उनके संबोधन के दौरान ना केवल खूब तालियां बजीं बल्कि उनकी बातों को बहुत ध्यान से सुना गया.इनके विचार आज भी जोश भर देता है।



'उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य ना प्राप्त हो जाये।'

'उठो मेरे शेरो, इस भ्रम को मिटा दो कि तुम निर्बल हो, तुम एक अमर आत्मा हो, स्वच्छंद जीव हो, धन्य हो, सनातन हो, तुम तत्व नहीं हो, ना ही शरीर हो, तत्व तुम्हारा सेवक है तुम तत्व के सेवक नहीं हो।'

'जिस तरह से विभिन्न स्रोतों से उत्पन्न धाराएं अपना जल समुद्र में मिला देती हैं, उसी प्रकार मनुष्य द्वारा चुना हर मार्ग, चाहे अच्छा हो या बुरा भगवान तक जाता  है।'

12 जनवरी, 1863 एक बंगाली परिवार में उनका जन्म हुआ, नाम रखा गया नरेंद्रनाथ दत्ता। वो अपनी माँ की सात संतानों में से एक थे। बचपन से ही, नरेंद्रनाथ बहुत ही तीव्र बुद्धि के धनी थे, पढ़ाई लिखाई में हमेशा अच्छे थे। अपने शुरूआती जीवन में वो अंग्रेज़ी भाषा पढने लिखने से परहेज़ करते थे, ऐसा इसलिए क्यूंकि उनको लगता था कि अंग्रेज़ी ब्रिटिश वासियों की भाषा है। लेकिन बाद में  उनको यह भाषा सीखनी पड़ी क्यूंकि यह उनके पाठ्यक्रम का हिस्सा थी। वो अन्य दुसरे विषय जैसे खेलकूद, संगीत,  कुश्ती इत्यादि में भी काफ़ी आनंद लिया करते थे।उन्होंने कलकत्ता के एक कॉलेज से दार्शनिक शास्त्र में स्नात्कोत्तर कि उपाधि प्राप्त की, उसके बाद आगे चलकर वो दार्शनिक शास्त्र के बड़े शास्त्री बने। उनकी शिक्षा का धर्म, श्रद्धा, विद्या, अध्यात्म और मानवतावाद पर अधिक ज़ोर होता था। वो अपने गुरु, रामकृष्ण परमहंसजी के ज्ञान को आगे फ़ैलाने के लक्ष्य को लेकर आगे बढ़े।आगे चलकर, नरेंद्रनाथ स्वामी विवेकानंद के नाम से पहचाने जाने लगे। उनके बहुत के कामों के अलावा ब्रम्हो समाज और रामकृष्ण मिशन के सामाजिक कार्यों को लेकर, विभिन्न धर्मों में मैत्री भाव, दुःख और दरिद्रता को दूर करना ही उनके जीवन का लक्ष्य था

स्वामी विवेकानंद का मानना है कि किसी भी राष्ट्र का युवा जागरूक और अपने उद्देश्य के प्रति समर्पित हो, तो वह देश किसी भी लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। युवाओं को सफलता के लिये समर्पण भाव को बढ़ाना होगा तथा भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिये तैयार रहना होगा, विवेकानंद युवाओं को आध्यात्मिक बल के साथ-साथ शारीरिक बल में वृद्धि करने के लिये भी प्रेरित करते हैं।

सोमवार, 11 जनवरी 2021

जननी है वो

 एक औरत है वो

सहनशील है वो 

क्षमाशील है वो

जननी   है   वो

भगिनी  है  वो

हर पल एक नई

भूमिका अपनाती है वो

पूज्यनीय  नारी   है वो



जीवन के हर मोड़ पर साथ देती

आदर्श  पत्नी है वो

शक्ति है वो

प्रेरणा है वो

सृष्टि के रचनाकार है वो

क्योंकि खुद में ही सम्पूर्ण

नारी है वो।

रविवार, 10 जनवरी 2021

नारी हूँ मैं

 अबला नहीं

नारी हूँ मैं,

दुर्गा का स्वरूप हूँ मैं

ममता की छांव हूँ मैं

मां-बाप की शान हूँ मैं

बेटी हूँ मैं

पापा की प्यारी हूँ मैं

माता की दुलारी हूँ मैं

अबला नहीं

नारी हूँ मैं।


फिर क्यों जन्म से पहले

मार दी जाती हूं मैं?

मां, बहन, बेटी और पत्नी भी हूँ मैं

फिर क्यों संसार में

बलात्कारियों के सर चढ़ी जाती हूँ मैं?

अबला नहीं

नारी हूँ मैं।


जननी हूँ मैं

न जाने कितने युगों से पीड़ित हूँ मैं

फिर भी जीवित हूँ मैं

क्योंकि जीवन का आधार हूँ मैं?

अबला नहीं

नारी हूँ मैं।

      -@अरुणेश✍️



शनिवार, 9 जनवरी 2021

जब नील का दाग मिटा : चंपारण 1917

 

घुमन्तू पत्रकार एवं लेखक पुष्यमित्र ने ‘जब नील का दाग मिटा: चम्पारण 1917’ नामक किताब में चम्पारण से कलकत्ता तक फैले नील किसानों की बेहद मार्मिक दास्तान और उसके संघर्षपूर्ण इतिहास को बताने की कोशिश की है।इसमें यह भी बताने की कोशिश की है किस तरह मोहनदास करमचन्द गाँधी को महात्मा गाँधी बनाने में चम्पारण के सत्याग्रह की अहम भूमिका थी।
पुष्यमित्र ने नील से किसानों की समस्याओं और उनके बीच से उपजे गाँधी के स्वतंत्रता आंदोलन की हकीकत को पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है।


मैं अदालत में गया तो कलक्टर ने मुझे आवेदन देने को कहा। मैंने कहा कि कृपया खुद निरीक्षण कर लीजिए, बात गलत साबित हो तो मुझे सजा दीजिएगा। मगर वे राजी नहीं हुए। मैंने कहा कि एक बार आवेदन देने की सजा मैं 21 दिनों तक जेल में भुगत चुका हूं, अब दूसरा आवेदन देने की हिम्मत मुझमें नहीं है। इसके बावजूद वे नहीं पसीजे।’

‘चम्पारण का तो यही इतिहास है।’

मोहनदास करमचन्द गाँधी नीलहे अंग्रेज़ों के अकल्पनीय अत्याचारों से पीड़ित चम्पारण के किसानों का दुख-दर्द राजकुमार शुक्ल से सुनकर उनकी मदद करने के इरादे से वहाँ गए थे। वहाँ उन्होंने जो कुछ देखा, महसूस किया वह शोषण और पराधीनता की पराकाष्ठा थी, जबकि इसके प्रतिकार में उन्होंने जो कदम उठाया वह अधिकार प्राप्ति के लिए किए जानेवाले पारम्परिक संघर्ष से आगे बढ़कर ‘सत्याग्रह’ के रुप में सामने आया। अहिंसा उसकी बुनियाद थी। सत्य और अहिंसा पर आधारित सत्याग्रह का प्रयोग गाँधी हालांकि दक्षिण अफ्रीका में ही कर चुके थे, लेकिन भारत में इसका पहला प्रयोग उन्होंने चम्पारण में ही किया। यह सफल भी रहा। चम्पारण के किसानों को नील की जबरिया खेती से मुक्ति मिल गई, लेकिन यह कोई आसान लड़ाई नहीं थी। नीलहों के अत्याचार से किसानों की मुक्ति के साथ-साथ स्वराज प्राप्ति की दिशा में एक नए प्रस्थान की शुरुआत भी गाँधी ने यहीं से की।

इस किताब में महात्मा गांधी को चंपारण लाने में  राजकुमार शुक्ला की किस तरह की भूमिका रही है उसको बताने की कोशिश की है।किस प्रकार से शुक्ल के मित्र वकील ब्रजकिशोर प्रसाद के प्रयास से गाँधी जी तक पहुंचने में भी उन्हें महीनों पापड़ बेलने पड़े थे।कैसे गोपाल कृष्ण गोखले, मदन मोहन मालवीय, लोकमान्य तिलक आदि नेताओं ने सब कुछ जानते हुए भी राजकुमार शुक्ल की बातों को अनदेखा किया था।इस किताब में अनेक ऐसे लोगों के चेहरे दिखलाई पड़ते हैं, जिनका शायद ही कही जिक्र मिलेगा वो मूल रूप से स्वतंत्रता सेनानी थे।
नील की खेती और गांधी को समझने केलिए यह किताब बेस्ट है।
यह किताब सीधी एवं सरल भाषा में लिखी गई है।हम सबको पढ़ना चाहिए।खासकर जो चंपारण, चंपारण सत्याग्रह और गांधी को समझना चाहते हैं उन्हें बिल्कुल पढ़ना चाहिए।

शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

बोलना ही है : रवीश कुमार

वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की किताब ‘बोलना ही है’ एक ऐसी किताब है, जिसे हम सबको मतलब सभी भारतीय को पढ़ना चाहिए ।आप उनकी सोच से असहमत हो सकते हैं, उनकी शैली आपको पसंद नहीं आ सकती है, परंतु  उनकी किताब में लिखा हुआ एक-एक शब्द देश की ज़्यादतर आबादी की सोच, बोलने, बात करने और दूसरों को देखने के नज़रिये की बिल्कुल सटीक कहानी बयान करता है।किताब की भाषा बिल्कुल सरल और साधारण है।इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि पाठक को बांधे रखती है।



किताब की भूमिका ‘लिंचिंग’ की घटनाओं से होती है और नागरिक पत्रकारिता पर समाप्त होती है. पहले अध्याय ‘बोलना’ में लोकतंत्र में नागरिक के लिए बोलना कितना और क्यों जरुरी है.बोलने को लेकर नागरिक के मन में आने वाले भय के बारे में लिखते हुए वो कहते हैं-
बोलना किसी भी दौर में आसान नहीं रहा है. बोलने के लिए आपको अकेलेपन के इम्तहान से गुजरना पड़ता है. आप खुद से पूछिए कि क्या आप अकेले रह सकते हैंएक सवाल यह भी कीजिए कि क्या आप चुप रहकर चैन की नींद सो सकते हैंबोलना मुश्किल नहीं है मुश्किल है बोलने से पहले डर के सुरंग से गुजरना. यह डर हमेशा सत्ता का नहीं होता है. गलती कर जाने का भी डर होता है. बाद की प्रतिक्रियाओं का भय सताता है. डर से मुकाबला तो बोलने के बाद शुरू होता है. तब पता चलता है उसका सामना करने की हिम्मत है या नहींजब दोस्तों के फ़ोन आते हैं कि सतर्क रहा करोचुप रहा करोसमय ख़राब है.”

"9 दिसंबर 2017 को गुजरात चुनाव के समय नरेंद्र मोदी के दिए गए भाषण में फेक न्यूज़ का जिक्र इस किताब में किया गया है किस प्रकार से मणिशंकर अय्यर के घर पर हुई रात्रि भोज को एक गुप्त मीटिंग का नाम देकर पाकिस्तान का गुजरात चुनाव में हस्तक्षेप की बात अपने भाषण में मोदीजी करते हैं, जिसका उद्देश्य गुजरात चुनाव के असली मुद्दों से ध्यान भटकना  है, जब फेक न्यूज़ की चर्चा या जानकारी किसी बड़े पद के व्यक्ति के द्वारा की जाती है तो जनता इसको इसी प्रकार से मानती है कि कुछ तो है। यही बात है जो फेक न्यूज़ के लिए  ईंधन का काम करती है, फेक न्यूज़ ने पहले खबरों और पत्रकारिता को फेंक किया और अब वह जनता को फेक रूप तैयार कर रहा है। फेक न्यूज़ के बहाने एक नए किस्म का सेंसरशिप आ रहा है। आलोचनात्मक चिंतन को दबाया जा रहा है। फेक न्यूज़ का एक बड़ा काम है नफरत फैलाना, फेक न्यूज़ के खतरनाक खेल में बड़े अखबार और टीवी चैनल शामिल हैं, लेकिन भारत में अब कुछ वेबसाइटों ने फेक न्यूज़ से लोहा लेना शुरू कर दिया है। लेकिन यह सब बहुत छोटे पैमाने पर हो रहा है इसकी पहुंच मुख्यधारा के मीडिया के फैलाए फेक न्यूज़ की तुलना में बहुत सीमित है। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री कैबिनेट मिनिस्टर का विरोध या असहमति  दर्ज करने पर कितने ही पत्रकारों आम नागरिकों पर पुलिस केस और मानहानि केस दर्ज भारत में हो रहे हैं। इन्हीं सब तरीकों से नागरिक अधिकारों को कम करने या उनको खत्म करने की सुनियोजित तरीके से योजना सरकारों के द्वारा चल रही है।"
इस किताब में धर्म के नाम पर टेलीविज़न पर चलाये जाने वाले पाखंड पर कटाक्ष किया है।पुराने फेसबुक पोस्ट का भी उल्लेख किया है, जिसे उन्होंने अलग अलग मौकों पर लिखा था।
"भीड़ और प्रोपेगेंडा का नतीजा बताया गया कि किस प्रकार से जर्मनी में हिटलर और उसकी नाजी पार्टी ने  भीड़ को और प्रोपेगंडा को इस प्रकार से तैयार कर दिया था"
इस किताब के ज़रिये रवीश ने देश में मीडिया के रोल और हर दूसरे नागरिक को शक के निगाह से देखे जाने का एक स्व, जो हम सबने अपने अंदर पाल लिया है को आसपास की घटनाओं का उल्लेख कर समझाने की कोशिश की है।
कैसे मीडिया से लेकर धर्म और धर्म के ठेकेदार  व्यापार तंत्र का हिस्सा बन गए हैं, इस सिलसिले पर नज़र डालने के साथ ही, हमारे सोचने और बोलने तक को सीमित करने की साज़िश की बात भी कही गई है।

मुझे लगता है "बोलना ही है" सबको पढ़ना चाहिए।चाहे वो रवीश कुमार के विचारधारा से सहमति रखते हो या नहीं।
खासकर अगर पत्रकारिता के छात्र हैं या पत्रकारिता से तालुकात रखते हैं तो उन्हें जरूर पढ़ता चाहिए।

आरएसएस संघ का सफर : 100 वर्ष

 वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने अपनी नई किताब  ‘आरएसएस- संघ का सफर: 100 वर्ष ‘ में संघ की विचारधारा, उसके संविधान, सफर, चुनौतियों, हिंदुत्व के प्रश्न, संघ पर लगे प्रतिबंध, संगठन के भीतर के अंतर्विरोधों, राजनीतिक प्रश्न और संघ के बदलते सरोकारों को बताने की कोशिश की है।



राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) 1925 में अपने स्थापना वर्ष से ही लगातार कई गंभीर सवालों के घेरे में रहा है. जैसे महात्मा गांधी की मृत्यु में संघ की क्या भूमिका थी, देश को हिंदू अतिवाद के सांप्रदायिक विमर्श में घसीटना और लगातार हिंदू राष्ट्र की बात कर समाज के एक संप्रदाय को नीचा दिखाने की कोशिश. इन्हीं तमाम सवालों के जरिए RSS को हमेशा कटघरे के खड़ा किया जाता रहा है।

"प्रसून जी यही सवाल उठाते हैं कि संघ जिस रूप में अभी खुद को देख रहा है जहां सत्ता के सामने उसे भी नतमस्तक होना पड़ गया है तो ऐसे में क्या भाजपा की सियासत सिमटने की स्थिति में संघ फिर से जनसंघ और उसके बाद भाजपा जैसा प्रयोग करेगा? ये सोचने वाली बात है. न सिर्फ संघ पर दृष्टि रखने वाले लोगों को बल्कि संगठन के भीतर के लोगों को भी. और इस क्रम में कुछ उलझनों को जरूर प्रसून की किताब सुलझाने का काम कर सकती है."

'किताब का पहला अध्याय है " संघ की विचारधारा : सत्ता" से शुरू होती है। शुरुआत में ही  अटलबिहारी वाजपेयी के इस प्रकार के एक कथन से होता है कि विचारधारा पर अटल रह कर राजनीति नहीं की जा सकती है।


इसी में आगे संघ के गुरु गोलवलकर साफ शब्दों में यह कह कर फारिग हो जाते हैं कि, बिल्कुल की जा सकती है और दुनिया में ऐसे तमाम उदाहरण मौजूद हैं।

गोलवलकर की इतनी साफगोई के बाद भी यहां पूरा विषय असमाधित ही रह जाता है। वाजपेयी अंत तक गुरु जी से दिशा-निर्देश मांगते रह जाते हैं और गुरु जी इतना कह कर ही शांत हो जाते हैं कि हमें जो कहना था, कह दिया — समझदार को इशारा ही काफी है — और आगे की गाड़ी इसी ऊहा-पोह में अपनी गति से चलने के लिए छोड़ दी जाती है।


हम यहां यह बुनियादी सवाल उठाना चाहते हैं कि किसी भी राजनीतिक संगठन में विचारधारा और राजनीति को लेकर आखिर यह स्थिति पैदा कैसे होती है ? अक्सर तमाम संगठनों में यह बात किसी न किसी मौके पर सिर उठाती हुई दिखाई देती है। राम मंदिर निर्माण का सफर के साथ किताब का अंत होता है।'


अगर आप आरएसएस और राजनीति में दिलचस्पी रखते हैं तो पुण्य प्रसून जी की "RSS Sangh Ka Safar :100 warsh"(आरएसएस संघ का सफर : 100 वर्ष) पढ़ना चाहिए।

बुधवार, 6 जनवरी 2021

नए साल में टीकाकरण सभी केलिए राहत भरी खबर

 नए साल के शुरू होते होते शुभ संकेत मिलना शुरू होगया है।अब कोरोना टीका लगाएं जाने की खबर आने के बाद पूरा देश राहत की सांस लेरहा है।स्वास्थ्य मंत्री ने कहा है कि प्रथम चरण में स्वास्थ्य कर्मियों और उनके साथ काम करने वाले तीन करोड़ कर्मियों को मुफ्त टीका लगाया जाएगा।

इसके बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल  ने भी घोषणा कर दी है कि दिल्ली के सभी नागरिकों को मुफ्त टीका लगाया जाएगा।
बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान जब प्रधानमंत्री ने घोषणा की थी कि बिहार के सभी लोगों को मुफ्त कोरोना के टीके लगाए जाएंगे, तब उनकी यह कह कर आलोचना की गई थी कि देश के बाकी लोगों को इसका लाभ क्यों नहीं मिलना चाहिए।

तब उस बयान को राजनीतिक और चुनावी कह दिया गया था। फिर स्वास्थ्य मंत्री ने कहा था कि पूरे देश को मुफ्त टीका उपलब्ध कराया जाएगा। सरकार ने अपने उस वादे को निभाया है। कोरोना का टीका तैयार करने में काफी ख़र्च आई है, इसलिए इसकी कीमत भी ज्यादाहोगी ही। जिन देशों में कोरोना के टीके तैयार किए गए हैं, वहां उन्हें लगवाना ज्यादा खर्चीला काम माना जा रहा है।



इसलिए भारत में भी आशंका जताई जा रही थी कि टीका उपलब्ध होने के बाद भी उसकी पहुंच शायद आम लोगों तक आसानी से न हो सके। जब तक इसका टीका सभी तक उपलब्ध न हो जाए, तब तक कोरोना संक्रमण रोकने को लेकर निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता। अब तो वह चिंता दूर हो गई है।भारत सरकार केलिए बहुत बड़ा चुनौती होगा पूरे देशवासियों तक टीका पहुँचाना।


भारत में तैयार टीके की बात करें तो इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि उसे ब्रिटेन आदि देशों में तैयार टीकों की तरह बहुत कम तापमान में सुरक्षित रखने की जरूरत नहीं है। उसे घर के सामान्य रेफ्रिजरेटर में रखा जा सकता है। इसलिए जो सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही थी कि तापमान नियंत्रित करने के लिए संसाधन जुटाना आसान नहीं होगा, वह भी अब कोई मुश्किल काम नहीं रह गया है।


दूर-दराज के गांवों, पहाड़ी क्षेत्रों,  गरम इलाकों तक भी इसे आसानी से पहुंचाया जा सकता है। विशाल आबादी में सभी तक पहुंच सुनिश्चित कराना एक चुनौतीपूर्ण काम जरूर है, मगर सरकार ने इसकी बहुत व्यावहारिक रूपरेखा तैयार कर ली है, इसलिए इसे कठिन नहीं माना जा सकता।



सोमवार, 4 जनवरी 2021

अरुणेश की डायरी-2

 कभी तो मुझे समझा करो तुम।तुम तो कहा करती थी कि कुछ भी हो जायेगा मैं कभी नहीं भूलूंगी।मुझे मालूम है तू भूल नहीं सकती।मेरे बिना तुम पर क्या गुजरती है ये सिर्फ मैं समझ सकता हूँ? फिर भी तुमसे विनती है तुम ऐसा कुछ न करना जिससे मेरी घबराहट और बढ़ जाए।बस इतना समझना जैसी हो जैसे रहोगी दिल से मेरी रहोगी। 

तुम्हारा दिया हुआ हर वो वादा याद है मुझे।जब तुम हमसे पूछा करती थी कि तुम हमको कभी छोड़ोगे नहीं न।सच में उस वक्त मेरी आँखें भर आती थी और मैं बिल्कुल लाचार बेसहारा जैसा बोल देता कभी नहीं।



मैं कैसे मान लूं तुम मुझे भूल जाओगी? एक बार जब तुमसे झगड़कर मोबाईल को स्वीच ऑफ़ कर दिया था तब तुम कितना बेचैन हो गयी थी।कितनी टेंसन में थी कहाँ कहाँ नहीं कॉल की थी तुम।गुस्से में तुम अपना सिर फोड़ ली थी,मोबाईल को दाँत से तोड़ दी थी।सच पूछो तो मैं खुद टेंसन में था पर मै भी विवश था।मैं तुम्हारी घुटन को समझ सकता था क्योंकि मेरे साथ भी कई बार गुजरा है।

एक बार तुमको मज़ाक में बोल दिऐ थे कि मैं अब बात नहीं करूंगा।तब क्या हाल बना ली थी रो रो कर तुम? वो मुझे आज भी याद है।दिसम्बर की वो रात तकरीबन एक बज रहा होगा।जब तुम्हारी दीदी का कॉल आया मेरे पास मैं बिल्कुल घबरा गया था और तुम्हारी सिसकती हुई आवाजें सुनाई दे रही थी।सिसक - सिसक कर बोल रही थी कि अगर तुम बात नहीं करोगे तो ये मेरी आख़री रात होगी।

हाँ माना कि मजबूरियां थी तुम्हारी,पर उतनी भी नहीं थी कि मुझे भुलने पर मजबूर हो जाओ चाहे कितनी भी कोशिश करलो नहीं भूल पाओगी।ये बात तुम खुद बोलती थी कि मैं चाह कर भी नहीं भूल सकती हूँ।

मुझे बार बार खोने का डर सताती रहती थी मुझे मालूम है मेरे लिखें शब्दों में खुद को पाने की कोशिश तुम्हें आज भी उत्साहित करती है।अगर कुछ न लिखूं तो खुद ही मन ही मन कोसती भी थी और शिकायत भी करती थी।


अब तो कई महीनों गुजरने को आए पता नहीं किस हाल में होगी तुम।जिद्द तो हम दोंनो की थी।दोनों ने दिल को बहुत समझाया था कि अब दोनों भूल जाएं।पर ऐसा हुआ नहीं।


आज तुम अपना दिया हुआ वादा तोड़ रही हो मैं फिर वैसे ही लाचार बेसहारा बैठा हूँ।हर वो वादा याद आ रही है जो तुम मुझसे हर वक्त किया करती थी।मुझे मालूम है तुम भी विवश हो हालांकि तुम्हारी खुशी में ही मेरी खुशी है।बस खुश रहो तुम नई जिंदगी की शुरुआत कर रही हो उसके लिए बधाई।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020

'मैं अविवाहित हूं लेकिन कुंवारा नहीं हूं।'-वाजपेयी

 हमेशा से राजनीतिक विश्लेषकों का मानना रहा है कि अटल बिहारी वाजपेयी दस वर्ष पहले प्रधानमंत्री बन जाते तो आज भारत का भविष्य कुछ और रहता। 

आज देश के पूर्व पीएम और भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती हैं। बीजेपी सरकार अटल बिहारी के जन्मदिवस को सुशासन दिवस के रूप में मनाती है। 

भारत के राजनीतिक इतिहास में अटल बिहारी वाजपेयी का संपूर्ण व्यक्तित्व शिखर पुरुष के रूप में दर्ज है. उनकी पहचान एक कुशल राजनीतिज्ञ, प्रशासक, भाषाविद, कवि, पत्रकार व लेखक के रूप में है.जनसंघ के संस्थापकों में से एक वाजपेयी जी के राजनीतिक मूल्यों की पहचान बाद में हुई और उन्हें भाजपा सरकार में भारत रत्न से सम्मानित किया गया.



इंदिरा गांधी के खिलाफ जब विपक्ष एक हुआ और बाद में जब देश में मोरारजी देसाई की सरकार बनी तो अटल जी को विदेशमंत्री बनाया गया. इस दौरान उन्होंने अपनी राजनीतिक कुशलता की छाप छोड़ी और विदेश नीति को बुलंदियों पर पहुंचाया. बाद में 1980 में जनता पार्टी से नाराज होकर पार्टी का दामन छोड़ दिया. इसके बाद बनी भारतीय जनता पार्टी के संस्थापकों में वह एक थे. उसी साल उन्हें भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष की कमान सौंपी गयी. इसके बाद 1986 तक उन्होंने भाजपा अध्यक्ष पद संभाला. उन्होंने इंदिरा गांधी के कुछ कार्यों की तब सराहना की थी तब जब संघ उनकी विचारधारा का विरोध कर रहा था.कहा जाता है कि संसद में इंदिरा गांधी को दुर्गा की उपाधि उन्हीं की तरफ से दी गई. उन्होंने इंदिरा सरकार की तरफ से 1975 में लादे गए आपातकाल का विरोध किया. लेकिन, बंग्लादेश के निर्माण में इंदिरा गांधी की भूमिका को उन्होंने सराहा था.



वाजपेयी जी हमेशा पाकिस्तान से अच्छे रिश्ते की बात करते थे।उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में दिल्ली-लाहौर बस सेवा की शुरुआत की थी।पहली बार बस सेवा के वो खुद गए और तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ मिलकर लाहौर दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए।इस यात्रा के दौरान वे  मीनार-ए-पाकिस्तान भी गए।यह वैसी जगह है जहाँ सबसे पहले पाकिस्तान बनाने का प्रस्ताव पास किया था।मीनार-ए-पाकिस्तान एक ऐसी जगह है जहाँ भारत के किसी भी प्रधानमंत्री  जाने का हिम्मत नहीं जुटा पाया था।



देश में दूरसंचार क्रांति और गांव-गांव में का श्रेय भी वाजपेयी जी को ही जाता है।इन्होंने ही BSNL के एकाधिकार को खत्म करके नई दूरसंचार नीति को लागू किया था।इसके चलते की देश में सस्ती कॉल दरे और मोबाईल का प्रचलन भी बढ़ा।

वाजपेयी जी ने ही सबसे पहले देश की सभी सड़को को एक सूत्र में जोड़ने का अहम फैसला लिया था।इन्होंने ने चारों महानगरों को जोड़ने केलिए स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना की शुरुआत की।

'सर्व शिक्षा अभियान' के तहत  छह से चौदह वर्ष के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने का अभियान को शुरू किया।आर्थिक मोर्चे पर भी अहम योगदान दिया।


अटल बिहारी वाजपेयी आजीवन कुंवारे रहे। अक्सर विपक्ष के नेता और मीडिया उनसे यह सवाल कर ही देते थी कि आप ने शादी क्यों नहीं की ? अटल जी ने एक बार ऐसे ही बातों ही बातों में अपनी हाजिर जवाबी का परिचय देते हुए जवाब दिया था। अटल बिहारी वाजपेयी से एक बार सवाल पूछा गया कि आप अब तक कुंवारे क्यों हैं ? पत्रकारों को जवाब देते हुए उन्होंने कहा था कि 'मैं अविवाहित हूं लेकिन कुंवारा नहीं हूं।'

         -अरुणेश✍️

सोमवार, 14 दिसंबर 2020

बिहार के तीस वर्षों का लेखा-जोखा छपा है : गांधी मैदान

 वरिष्ठ पत्रकार व संपादक अनुरंजन झा ने अपनी पुस्तक 'गांधी मैदानः Bluff of Social Justice' में बिहार के पिछले 30 सालों का लेखा-जोखा उधेड़ने की कोशिश की है।पिछले 30 सालों में किस प्रकार की घटनाएं घटी,बिहार ने क्या पाया,क्या खोया? इन्हीं तमाम मुद्दों की चर्चा इस पुस्तक (गांधी मैदान) में की गई है।


'इस किताब की कहानी बिहार के दो मुख्यमंत्री लालू यादव और नीतीश कुमार के इर्दगिर्द घूमती है।शुरुआत होती है लालू यादव के राजनीतिक संघर्ष से,किस प्रकार लालू यादव को सत्ता मिलती है।सत्ता में काबिज होने के बाद किस प्रकार राजनीति से अपराध की दुनिया में कदम रखते हैं।किस प्रकार से लगातार एक के बाद एक घोटाले करके जेल के अंदर-बाहर हो रहे थे।'



'फिर बिहार को एक नए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मिलते हैं।नीतीश राज्य में एक नया सिस्टम खड़ा कर दिया,वह सिस्टम जो लालू राज में लालू ही सिस्टम थे।उस सिस्टम पर नकेल कसने की कोशिश की।जो अपराधी लालू राज में सत्ता के हिस्सेदार थे,वो नीतीश राज में जेल की सलाखों के पीछे थे।नीतीश की पूरी राजनीति 15 सालों के जंगलराज के इर्दगिर्द घूमती रही। जयप्रकाश नारायण के दोनों चेले लालू और नीतीश बारी-बारी से बिहार की सत्ता पर काबिज तो हुए लेकिन लेकिन सामाजिक न्याय के नाम पर पिछले 30 सालों में बिहार की जनता के साथ धोखा ही किया।'


"इस किताब में वीर कुँअर सिंह का आरा कैसे ब्रह्मेश्वर मुखिया का आरा कैसे हो गया? जेपी और कर्पूरी ठाकुर का बिहार कैसे लालू और नीतीश का होगया।देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र बाबू के गाँव जीरादेई से खरतनाक गुंडों में से एक शाहबुद्दीन विधायक और संसद बनगया।गांधी के चंपारण में कैसे गैंगवार ने जगह लेली।वाल्मीकि के जंगल को कैसे डकैतों ने मिनी चंबल बना दिया।"



अनुरंजन झा की पुस्तक रामलीला मैदान के बाद दूसरी क़िताब है "गांधी मैदान"।उस किताब में उन्होंने ने अन्ना आंदोलन से आम आदमी पार्टी के राजनीतिक सफर की सच्चाई सामने लाने की कोशिश की थी।उसी प्रकार 'गांधी मैदान' में 30 सालों का हिसाब बताने की कोशिश की है।


बुद्ध-महावीर की धरती बिहार के पिछले 30 सालों की राजनीति को समझने के लिए "गांधी मैदानः Bluff of Social Justice" को सबको पढ़नी चाहिए।खासकर अगर बिहारी हैं तो बिल्कुल पढ़ना चाहिए, अगर राजनीति में दिलचस्पी रखते हैं तो उनको जरूर पढ़ना चाहिए।

        - अरुणेश कुमार

गुरुवार, 10 दिसंबर 2020

सभी के लिए आदर्श हैं श्री राम

सभी के लिए आदर्श हैं श्री राम

 


एक पुत्र के रूप में जब राजा दशरथ ने श्री राम को माता कैकेयी के कहने पर 14 वर्ष का वनवास दिया तो श्री राम ने एक बार भी नहीं सोचा और आदेश का पालन किया। एक भाई के रूप में श्री राम अपने सभी भाईयों लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न से अत्यंत स्नेह करते थे। जब उनको वनवास और भरत को शासन देने की बात हुई तो भी श्री राम को हर्ष ही हुआ कि भरत राजा बनकर शासन करेंगे। लक्ष्मण तो जैसे श्री राम की परछाईं ही थे। दोनों ने कभी भी एक दूसरे का साथ नहीं छोड़ा। आज भी अनेकों घरो में भाइयों का नाम राम-लक्ष्मण रखा जाता है।


एक पति के रूप में श्री राम ने अपने सभी धर्म निभाए। वो उनका स्नेह और धर्म का पालन ही था माता सीता के प्रति जो उनको हज़ारों किलोमीटर दूर लंका तक लेकर गया उनकी खोज में, माता सीता और श्री राम भारतीय दंपतियों के लिए आदर्श है। श्री राम का नैतिक आचरण, सत्य, त्याग, धैर्य, करुणा, पराक्रम हर भारतीय को प्रेरित करती है।


लंका पर विजय पाने के बाद भी उन्होंने उसपर कब्ज़ा नहीं किया, बल्कि रावण के भाई वि‍भीषण को ही वहां का राजा बनाया। किसी का दमन करना, अतिक्रमण करना, यह हमेशा से भारत की परंपरा के विरुद्ध रहा है। इसीलिए राम मंदिर का निर्माण विश्व भर के लिए एक जीवंत सन्देश है। प्रभु श्री राम की तरह धर्म आधारित जीवन जीने की प्रेरणा देने वाला एक मंदिर।

      -अरुणेश कुमार