बुधवार, 24 मार्च 2021

अक्टूबर जंक्शन : दिव्य प्रकाश दुबे

 

अक्टूबर जंक्शन दिव्य प्रकाश दुबे की एक ऐसी किताब है। जिसकी कहानी दिल और दिमाग में चढ़ते जाता है
कहानी बनारस से शुरू होती है जहाँ चित्रा और सुदीप धोखे से एक-दूसरे से मिलते हैं और दुनिया की एक खूबसूरत प्रेम कहानी बनती चली जाती है। चित्रा और सुदीप की यह कहानी हर किसी के पढ़ने लायक है।

किताब की कुछ पंक्तियां जो दिल छू लेती हैं :-

एक अधूरी उम्मीद ही तो है जिसके सहारे हम बूढ़े होकर भी बूढ़े नहीं होते। किसी बूढ़े आशिक़ ने मरने से ठीक पहले कहा था कि एक छंटांक भर उम्मीद पर साली इतनी बड़ी दुनिया टिक सकती है तो मरने के बाद दूसरी दुनिया में उसकी उम्मीद बांधकर तो मर ही सकता हूँ। बूढों की उम्मीद भरी बातों को सुनना चाहिए।

किसी के साथ बैठकर चुप हो जाना और इस दुनिया को रत्ती भर भी बदलने की कोई भी कोशिश न करना ही तो प्यार है!

हर आदमी में एक औरत और हर औरत में एक आदमी होता है। हर आदमी अपने अंदर की अधूरी औरत को जिंदगी भर बाहर ढूँढता रहता है लेकिन वो औरत बड़ी मुश्किल से मिलती है। वैसे ही हर औरत अपने अंदर का अधूरा आदमी ढूँढती रहती है लेकिन वो अधूरा आदमी बड़ी मुश्किल से मिलता है। और कई बार वो अधूरा मिलता ही नहीं। लेकिन अगर एक बार अधूरा हिस्सा मिल जाए तो आदमी मरकर भी नहीं खोता। तू ध्यान से देख वो कहीं नहीं गया तेरे अंदर है। आधी तू आधा वो।

नदी और जिंदगी दोनों बहती हैं और दोनों ही धीरे-धीरे सूखती रहती हैं।

 


किताबः      अक्टूबर जंक्शन
लेखकः        दिव्य प्रकाश दुबे
पृष्ठः           150
मूल्यः          125 रुपए
प्रकाशकः     हिंद युग्म

बुधवार, 17 मार्च 2021

जुहू चौपाटी : साधना जैन

 

जुहू चौपाटी , साधना जैन का उपन्यास है जिसकी कहानी एक फ़िल्म अभिनेत्री के इर्दगिर्द घूमती है।यह साधना जी की पहली किताब है।इनकी भाषा की पकड़ जानना हो तो इस किताब को पढ़ सकते हैं।किसी भी राईटर केलिए  सरल और सहज भाषा में लिखना बहुत मुश्किल होता है।
इस किताब में एक भूतपूर्व अभिनेत्री की कहानी है जो मर चुकी है।उस अभिनेत्री का नाम मीरा है।मीरा की अचानक मृत्यु हो जाती है।जब उसकी आत्मा खुद को मृत देखती है तो उसको बिल्कुल विश्वास नहीं होता है। "दुनिया से भागा जा सकता है, खुद से नहीं।" मीरा वहां से अचानक घबराई हुई लड़की की तरह भाग जाती है।जिस दिशा में वह जा रही थी वो रास्ता 'जुहू चौपाटी' की तरफ जाता था।जुहू चौपाटी मुंबई शहर का सबसे प्रसिद्ध तट है।मीरा भी इसी तट पर बैठकर अपने मरने की वजह खोज रही है।दरअसल उसको यह भी नहीं मालूम है कि उसकी हत्या किसने की? सब कुछ वो यही से याद करती है।शिमला वाला घर छोड़ कर दिल्ली क्यों आई थी? वहां से मुंबई क्यों गई? कैसे बॉलीवुड में अभिनेत्री बनी? क्यों उसने बॉलीवुड की बड़ी अभिनेत्री होने के बावजूद फिल्मों से काम करना छोड़ दिया? मीरा की मृत्यु कैसे और क्यों होती है? राजी,संदीप,राजीव, रीना ,शास्त्री जी और मीठी से क्या संबंध थे मीरा की।इन सब प्रश्नों का उत्तर उपन्यास पढ़ने के बाद ही मिल सकता है।


कुछ पंक्तियां जिन्होंने बहुत कुछ कह दिया उनका उल्लेख जरूरी है-
"हमारा वर्तमान हमारे अतीत का अपग्रेड वर्जन ही तो है।हम चाहें भी तो अपने ओल्डसेल्फ़ मे वापस नहीं जा सकते।जिस तरह मुँह से निकले हुए हमारे शब्द पराए हो जाते हैं, उसी तरह हमारा जिया हुआ कल हमारे आज से अजनबी होता जाता है।"


"हमारी सोच ,हमारे विचार हमारी भावनाएं, हमारी पसंद सब वक्त के साथ बदल जाते हैं।और ये बदलाव पलक झपकते ही नहीं हो जाता।ये प्रक्रिया हर सेकेंड चालू रहती है जिसका हमें पता भी नहीं चलता।और एक दिन हम पाते हैं हम वह रहे ही नहीं जो कल थे।"


"कई बार हम ऐसा कुछ कर जाते हैं जिसे करने के बाद हमें खुद हैरानी  होती है।कुछ ऐसा जो हम कब का करना छोड़ चुके होते हैं या वह हमने अपनी जिंदगी में कभी किया ही नहीं होता।फिर अचानक ऐसा कुछ घट जाता है जिसके बाद हम वह काम इस तरह से कर जाते हैं, मानो ये प्यास लगने पर पानी पीने जैसी आम बात हो।"


"जिस पल रात सुबह में बदल रही होती है उस पल को देखकर ऐसा लगता है जैसे पूरा आसमान हमसे कहना चाहता हो कि कुछ भी हमेशा के लिए नहीं रहता।हर रात की मंजिल सुबह है।हर दुःख का अंत सुख है।और सुख की भी एक निश्चित उम्र है।"


"दो लोगों के बीच की वैचारिक क्षमता का वजन जब होने वाली बातचीत के तराजू के दोनों पलड़ों में बराबर पड़ता है तभी यह तय होता है कि उनके बीच बनने वाला रिश्ता कितना गहरा होगा!दूर कितना जाता है इस बात से कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता है।"


"इंसान जिंदा हो या मरा हुआ उसे किसी न किसी का साथ चाहिए।वह अकेले बचा तो रहता है मगर मानसिक तौर पर बीमार होता जाता है।
"

लिखने केलिए तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है लेकिन प्रतिक्रिया की भी अपनी सीमा होती है।अंत में मैं लेखिका को बहुत बहुत धन्यवाद देता हूँ कि जिसने एक नए तरीके से कहानी को पेश की।आशा करता हूँ कि आगे भी ऐसे ही कुछ नया लिखने का कोशिश करेंगी।
पुस्तक : जुहू चौपाटी
लेखिका : साधना जैन
प्रकाशन : हिन्द युग्म
मूल्य : 150 रुपये मात्र


मंगलवार, 16 मार्च 2021

कांग्रेस को आत्मविश्लेषण की जरूरत

 कांग्रेस पार्टी केलिए चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के विधानसभा चुनाव कितने महत्वपूर्ण हैं ये बताने की जरूरत नहीं है।इस समय कांग्रेस की स्थिति क्या हो चुकी है ये भी बताने की जरूरत नहीं है।जाहिर सी बात है कि कांग्रेस की दशा देखकर कट्टर समर्थक भी हताश हो रहे होंगे।दरअसल कांग्रेस की स्थिति इतनी खराब होने के पीछे भी कांग्रेस नेताओं का हाथ है।आपने देखा होगा राहुल गांधी  सिर्फ केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में प्रचार करते दिख रहे हैं। वही प्रियंका गांधी असम में दिख रही है।इसका मतलब क्या है? वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सिर्फ सोशल मीडिया पर अपने उलूल-जलूल बयान देते नजर आ रहें हैं।दरअसल जिस समय कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को जी जान लगाकर चुनावी अभियान लगाना चाहिए था,तब ये लोग अपने ही पार्टी के खिलाफ अजीबोगरीब बयान देकर फंसते नजर आते हैं।चाहे वो राहुल गांधी का बयान हो या किसी अन्य वरिष्ठ नेताओं का,हमेशा से सवालों के घेरे में ही रहता है। विडंबना तो यह है कि अगर कोई नेता पार्टी के हित में सच्चाई दिखाने की कोशिश करता है तो उसके खिलाफ अन्य सदस्य पार्टी से बाहर निकालने केलिए एक अलग मोर्चा खड़ा कर देते हैं।हाल ही में गुलाब नबी आजाद के साथ क्या हो रहा है ये बताने की जरूरत नहीं है। दरअसल यह परिदृश्य सिर्फ कांग्रेस पार्टी की ही नहीं है अन्य पार्टीयों में भी ऐसा होते रहा है।आजकल तो सरकार के नीतियों के खिलाफ कुछ बोलने की कोशिश करते हैं तो उनके समर्थक देशद्रोही घोषित करने लगते हैं।दरअसल यही सच्चाई है।

जिस  समय कांग्रेस को नरेंद्र मोदी और अमित शाह  के खिलाफ मोर्चा संभालना चाहिए था उस समय पार्टी अपने ही नेताओं के बयान से उलझे हुए है।हाल में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा ने पार्टी के हित में बंगाल के पीरज़ादा अब्बास सिद्धिकी के साथ होने वाले  गठबंधन का विरोध किया तो कांग्रेस पार्टी के दूसरे नेता अधीर रंजन चौधरी उनका किस तरह से माजक बनाया यह बताने की आवश्यकता नहीं है।
ध्यान देने की बात है जब कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी के संगठन मजबूत करने केलिए और स्थाई अध्यक्ष केलिए जो पत्र लिखा गया था उसमें भी वही नेता थे जो पार्टी के हित चाहते थे।हालांकि उनके पत्र पर कोई विचार तक नहीं किया गया।दरअसल होना यह चाहिए था कि पार्टी के अध्यक्ष एक बैठक बुलाते सर्वसम्मति से पार्टी के हित मे चर्चा की जाती,विचार विमर्श होती।लेकिन ऐसा हुआ नहीं।अगर ऐसा हुआ रहता तो ऐसी नौबत ही नहीं आती।आज कांग्रेस इस स्थिति हो चुकी है भाजपा के खिलाफ खड़ा होने में भी सोचना पड़ता है।इसका नतीजा पिछले चुनावों के आंकड़ों से देखा जा सकता है।
     कांग्रेस की मौजूदा  स्थिति से यही अनुमान लगाया जा सकता है कि अगर ऐसी हालात रही तो आगामी विधानसभा चुनाव में वही स्थिति रहेगी जो पिछले छः सालों से देखने को मिल रहा है।संयोग से अगर कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहा तो पार्टी के चाटूकार लोग गांधी परिवार की चाटूकारिता करते हुए नज़र आएंगे।इससे कांग्रेस का भविष्य क्या होगा देखना बड़ा दिलचस्प होगा?


रविवार, 14 मार्च 2021

ये कैसी चोट थी,24 घण्टे में कटा प्लास्टर ममता पर रविकिशन का तंज

 

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 के दिन जितने नजदीक आ रहे हैं सियासी माहौल उतना ही गरम होता जा रहा है। प्रदेश में छिटपुट हिंसा के साथ नेताओं के आराेप- प्रत्यारोप का दौर जारी है। ममता बनर्जी पर कथित हमले को बीजेपी के ‘नौटंकी' करार दिया है तो वहीं मुख्यमंत्री का कहना है कि उन पर हमला किया गया है। अभिनेता और बीजेपी के गोरखपुर से सांसद रवि किशन ने ममता बनर्जी के अस्पताल से निकलकर व्हीलचेयर पर चुनाव प्रचार करने पर तंज साधा है। उन्होंने अपने ट्विटर पर एक ट्वीट से माध्यम से कहा कि कैसी चोट थी जो 24 घंटे में ही प्लास्टर कट गया।


रवि किशन ने अपने ट्वीटर पर लिखा, ‘व्हीलचेयर पर दीदी बैठे, सबसे मांगे वोट। 24 घंटे ने प्लास्टर कटा, ये कैसी थी चोट। जोगिरा सा रा रा रा...।'



रविवार, 28 फ़रवरी 2021

चुनाव यात्रा

 नेताओं को अपनी भागीदारी को समझना बहुत जरूरी होता है।लेकिन ये नेता लोग खुद को कभी भी उस लायक नहीं बना सकते हैं ताकि गरीब लोग उनको एक मसीहा के तौर पर देखें।अगर कुछ करते भी हैं तो सिर्फ चुनाव लड़ने केलिए किस व्यक्ति से किस प्रकार से वोट लेना या फिर वोट खरीदना है? ये तरीका बखूबी निभाते हैं।

लोकतंत्र में जनता के द्वारा चुना गया व्यक्ति ही प्रतिनिधित्व करता है। लेकिन जमीनी स्तर पर देखा जाए तो बड़ा हास्यास्पद लगता है।

बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में ,जब मैं अपने गांव के  चौक-चौराहे पर घूम रहा था,उस वक्त लोगों से ओपिनियन लेने की कोशिश करता था।कभी कोई मिल गया तो बात कर लेते थे,जैसे कभी कोई कंडीडेट ही मिल गया तब चुनाव संबंधी बात हो जाती थी।सच तो ये भी है कि चुनाव के समय में पूरे देश में कोरोना अपने चरम पर था।ऐसे में बाहर निकलने में रिस्क़ तो था ही। खैर, तो मैं ऐसे ही एक मित्र के किराना दुकान पर बैठा हुआ था।तब ही एक बुजुर्ग औरत आयी,उम्र तकरीबन साठ-सत्तर के आसपास होगा।दुकानदार से सत्तु खरीद रही थी।समय तकरीबन दिन के एक बजे रहे थे।उसी समय चुनाव  प्रचार में निकले भाजपा की गाड़ी आगई। बुजुर्ग महिला गाड़ी को देखते ही बोलने लगी 'नेता सब खाली वोट लेवेला आवेला केहू ग़रीब के कुछ ना देवेला।आज हम दो दिन से भूखे बानी लेकिन केहू नेता हमरा से हाल चाल भी ना पूछे ला।गरीब के केहू करेवाला नइखे।अब आओ ना लोग तब बिना पैसा लेके ना देम।' मुझे बड़ा आश्चर्य लगा कि एक बुजुर्ग महिला वोट पैसे से देने की बात कर रही थी।फिर हमने पूछना शुरु किया। वोट पैसा लेके देम का? महिला का जवाब देते हुए बोली ' एकरा पहिले वोट देनी तब हमरा चापाकल ना मिलल, राशन में नाम कट गइल कोई नेता लोग मदद ना कईल।' अगला सवाल केतना पैसा में वोट देम ? फिर महिला का जवाब था एक हजार।अगला सवाल पूछने ही वाले थे कि महिला अपना समान लेकर चली गई।

कुछ ही देर में एक दूसरी महिला आई और बिना कुछ पूछे ही बोलने लगी 'हम तs वोट मोदी के ही देम'।फिर हमने सोचा कुछ पूछते हैं तब तक वो खुद बोलने लगी 'केहू के नमक खा के नमकखरामी ना करे के।आज हमरा घर मे गेहूँ-चावल ,तेल,बिजली, पानी सब मोदिया ही देले बा.हमनी का वोट ओकरे के देम'. फिर हमने पूछा 'अरे मोदी जी इहा थोड़े खड़ा बारनs'? महिला का बोलने लगी कि 'केहू होखो लेकिन वोट हम फूल छाप के ही देम'. दरअसल बिहार में चुनावी माहौल में जहाँ भी जाइए चौक-चैराहे हर जगह चुनाव पर चर्चा होना तो लाज़मी है।

शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

ट्वेल्थ फेल : अनुराग पाठक

 

अनुराग पाठक की किताब ‘12th फेल.. हारा वही जो लड़ा नहीं’ नियो लिट पब्लिकेशन ने छापी है।अनुराग पाठक पेशे से डिप्टी कमिश्नर हैं।इस क़िताब को 2005 बैच मनोज शर्मा पर लिखी गई है।जो महाराष्ट्र कैडर से आईपीएस हैं।इस किताब में मनोज शर्मा के पूरा जीवन की कहानी लिखी गई है।
कहानी की शुरुआत ट्वेल्थ की पढ़ाई कर रहे मनोज से होता है।जो हर रोज खुद केलिए नहीं आस पास को दिखाने पढ़ता था।मैथ भी बोल कर पढ़ता था ताकि लोगों को यह पता चले कि मनोज पढ़ रहा है।पर ऐसे पढ़ने के कारण ही ट्वेल्थ फेल कर जाता है।इसके बात से ही उसकी जिंदगी में कैसे बदलाव आते हैं? क्या क्या परेशानियां एक गरीब परिवार के बच्चों को आती है? एक ग़रीब परिवार का लड़का कुत्तों को  घूमने का काम करते हुए कैसे आईपीएस का सफर तय करता है? कैसा रहा सफर टेम्पू चलाने से लेकर आईपीएस तक का यह जानने केलिए अनुराग पाठक की 'टवेल्थ फेल' (12th fail) को पढ़ना चाहिए।



बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

बेतुका बयान

अपने खून-पसीने से तैयार की गई फसल को क्या कोई किसान आग लगा सकता है? शायद कभी नहीं। कोई भी किसान बिना सोचे समझे ऐसा नहीं कर सकता है।क्योंकि वह अच्छी तरह से जानता है कि एक फसल को तैयार करने में कितना मेहनत और समय लगता है।हाँ पशुओं को चारा के रूप में खिला सकता है या फिर उसे मिट्टी में नष्ट कर सकता।परंतु जलाना तो शायद किसान नहीं कर सकता है।ऐसे में किसानों के नेता राकेश टिकैत का कहना कि किसान अपने फसलों में आग लगा देंगे, बिल्कुल सही नहीं है।यह बयान काफी आपत्तिजनक एवं हानिकारक बयान है। उन्हें यह बिल्कुल नहीं भूलना चाहिए कि वो एक किसान नेता हैं और एक बड़े आंदोलन का नेतृत्व कर रहें हैं।ऐसे में उनके एक-एक बयान काफी महत्वपूर्ण हो जाता है।इस तरह से बेतुका बयान देने की बजाय उन्हें अपने साथियों के साथ मिलकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी लड़ाई लड़नी चाहिए।

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

रुकतापुर : पुष्यमित्र

 

रुकतापुर' , घुमंतू पत्रकार पुष्यमित्र द्वारा रचित पुस्तक में बिहार के 73 वर्षों का लेख-जोखा है।इस किताब को एक पत्रकार की डायरी कह सकते हैं।जिसमें पुष्यमित्र के द्वारा आँखों देखी घटनाओं को तथ्यपरक विश्लेषण किया गया है।पुष्यमित्र ने  पूरी कहानी एक रिपोर्टर के अंदाज़ में ही लिखी है-
पुष्यमित्र पहले रेलों की ख़बर लेते हैं. किताब का नाम 'रुकतापुर' भी रेलवे की दुनिया से ही लिया गया है. 2015 में वे सहरसा से सुपौल जा रहे हैं. वे जिस ट्रेन में बैठे हैं, वह राघोपुर तक जाती है. बुलेट ट्रेन की कल्पना और चर्चा के इस ज़माने में इस ट्रेन को सहरसा से राघोपुर की 63 किलोमीटर की दूरी तय करने में चार घंटे लगते हैं- यानी 16 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ़्तार. मैदानी इलाक़ों में इतनी धीमी ट्रेन शायद ही दुनिया के किसी हिस्से में हो. पता चलता है, यह ट्रेन कहीं भी रोक ली जाती है. ऐसा ही एक स्टेशन है- मुक्तापुर, जिसकी तर्ज पर लोगों ने रुकतापुर बना लिया- यानी जहां भी ट्रेन रोक दी जाए- वह रुकतापुर स्टेशन है.ट्रेनों की कहानी को पुष्यमित्र बिल्कुल पटना तक ले आते हैं. 2018 तक पटना के हड़ताली मोड़ से चलने वाली एक ट्रेन का ज़िक्र बिल्कुल हैरान करने वाला है. जिसने वाकई वह ट्रेन चलती नहीं देखी है, उसके लिए यक़ीन करना मुश्किल होगा कि बीच पटना से ऐसी ट्रेन भी गुज़रा करती थी जिसे लोगों को सड़क से हटाने के लिए हॉर्न बजाना पड़ता था और कभी-कभी पटरी से लगी किसी गाड़ी के हटाए जाने का इंतज़ार करना पड़ता था. वे इस बात को पहचानते हैं कि बिहार में ट्रेनें बस मज़दूरों को ढोने और बाहर से पूजा के अवसरों पर घर लाने का काम कर रही हैं.

2019 में पूरे देश की नज़रें मुज़फ़्फ़रपुर की तरफ तब जा मुड़ी थी जब वहां इंसेफेलाइटिस यानी चमकी बुखार से बच्चों की मौत की खबरें सामने आ रही थी. लेखक ने प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर एक साफ दृष्टि देने का काम किताब में किया है. जहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर अस्पतालों तक की कमी है और डॉक्टर तो डिबिया लेकर घूमने पर भी नहीं मिलेगा.


आंकड़ों का हवाला देकर लेखक बताता है, ‘राज्य सरकार ने जुलाई 2019 में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर जानकारी दी थी कि उनके राज्य में डॉक्टरों के 57 फीसदी पद और नर्सों के 71 फीसदी पद रिक्त हैं.’

इससे साफ समझा जा सकता है कि प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं का आखिर हाल कैसा होगा. कोरोना काल का ही जिक्र करें तो हमारे सामने ऐसी कई तस्वीरें आई थी जहां अस्पतालों में डॉक्टर नहीं है और स्टाफ की भारी कमी का सामना लोगों को अपनी जान गंवा कर करना पड़ा. ये भी विडंबना ही कही जाएगी कि महामारी के दौरान ही राज्य में कई बार स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव को बदलना पड़ गया.

बिहार में महिलाओं की स्थिति भी कोई बेहतर नहीं है. एक तरफ तो वो शोषण का शिकार होती हैं वहीं सामाजिक दंश को भी झेलती हैं. लेखक उन प्रसंगों का ज़िक्र करता है जहां उत्तर प्रदेश और हरियाणा से आकर लोग प्रदेश की बेटियों से शादी करते हैं. लेकिन इसके पीछे की सच्चाई दिल-दहलाने वाली है. उन प्रदेशों में उनके साथ काफी खराब बर्ताव होता है और तस्करी का पूरा रैकेट काम करता है. लेकिन एक सच्चाई ये भी है कि प्रदेश की महिलाओं की शादियां भी नहीं होती हैं जिसके कारण जीवन काटना उनके लिए दूभर हो जाता है.

रोज़गार के सवाल पर भी प्रदेश की स्थिति काफी खराब है. प्रवास इस राज्य की हकीकत बन गई है. राज्य में नए उद्योग लग नहीं रहे हैं और जो पहले से हैं उनकी उतनी क्षमता नहीं है कि वो लोगों को रोज़गार दे सके. इसलिए दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, गुजरात जैसे राज्यों की तरफ लोगों को रोजगार की तलाश में जाना ही पड़ता है.

बिहार की कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती. रेलवे,बेरोजगारी,गरीबी, स्वास्थ्य, देहव्यापार, बाल विवाह, बिजली ,बाढ़,पानी जैसे तमाम समस्याओं का लेखा-जोखा  अपने कलमों के माध्यम से  उजागर करने का प्रयास किया है।कुल मिलाकर यह किताब कड़वाहट भरा तो है ही दर्द भरा भी है।बिहार के  तमाम घटनाओं को जानने समझने के लिए इस किताब को पढ़ सकते हैं।जो सरकार और बिहार की जमीनी हकीकत को बतलाती है।इस किताब (रुकतापुर) को राजकमल  प्रकाशन ने छापा है।



जनता पस्त , सरकार मस्त

 जो लोग कल तक पेट्रोल-डीजल और गैसों की महंगाई पर साइकिल और गैस सिलेंडर लेकर बाहर निकल जाते थे।वो आज कल चुप्पी साधे हुए हैं।उनके लिए ये महंगाई देशहित है।वो ये बताने में पुर जोर तरीके से जुट गए हैं कि देश के राजस्व में वृद्धि हो रही है।जब 2014 में मोदी सरकार सत्ता में आयी तब लोगों को उम्मीद थी कि महंगाई पर लगाम लगेगी।क्योंकि तत्कालीन विपक्ष में बैठे नेताओं का अहम मुद्दा था "बहुत हुई महंगाई की मार,अबकी बार मोदी सरकार"।नोटबन्दी के बाद प्रधानमंत्री ने एक साक्षात्कार में कहा था कि 2014 से पहले हेडलाइन बनती थी महंगाई, लेकिन अब कोई मुद्दा नहीं है।पर,आज पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छू रहें हैं और गैस की कीमत घर में आग लगा रही है।सच्चाई तो यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमत में कोई खास वृद्धि नहीं हुआ है लेकिन केन्द्र सरकार और राज्य सरकार दोनों मिलकर एक्साइज ड्यूटी और टैक्स लगा कर अपनी अपनी तिजोरी भरने में लगी है।इधर महंगाई आम जनमानस की कमर तोड़ने में लगी है।महंगाई के अनुपात में लोगों की आमदनी भी बढ़ती तो कुछ हद तक जायज होता।लेकिन यहां जनता पस्त और सरकार मस्त हो चुकी है।

आश्चर्य की बात तो यह है कि जिस सरकार की बुनियाद ही महंगाई थी वो आज महंगाई पर चुप्पी साधे हुए  कैसे बैठ सकती है।यह अपने आप में  हास्यास्पद लगता है।




अतिक्रमण

शहर की प्रमुख सड़कों पर अतिक्रमण के कारण आए दिन जाम लग रहा है। नगर पालिका प्रशासन व अन्य जिम्मेदार तमाम प्रयासों के बाद भी शहर की प्रमुख सड़कों से अतिक्रमण हटवाकर जाम की समस्या का निराकरण नहीं करा पा रहे हैं। इसका खामियाजा शहरवासियों को जाम में फंसकर भुगतना पड़ता है।हालांकि समय-समय पर अतिक्रमण हटाने के लिए कार्रवाई भी की जाती है लेकिन उसके कुछ दिन बाद उन स्थानों पर अतिक्रमण फिर से हो जाता है।कहीं-कहीं दुकानों के आगे ठेले वालों ने मार्ग को घेर रखा है. साथ ही कस्बे के मुख्य चौराहे पर डग्गामार वाहनों और टेंपो वालों का कब्जा रहता है. इसके कारण यहां से एक गुजरने वाले वाहनों को घंटों जाम से जूझना पड़ता है. इस कारण आए दिन कोई न कोई घटना होती रहती है. आलम यह है कि एंबुलेंस तक जाम में फंस रह जाती है लेकिन प्रशासन का इस तरफ कोई ध्यान नहीं है. अब प्रशासन से मांग  है कि जल्द ही शहर को अतिक्रमणमुक्त किया जाए. ताकि जाम के झाम से लोगों को निजात मिल सके.

रविवार, 21 फ़रवरी 2021

स्वच्छता मिशन की हकीकत

  2 अक्टूबर, 2014 को स्वच्छ भारत मिशन देश भर में व्यापक तौर पर राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में शुरू किया गया था।साथ ही केंद्र सरकार ने 2 अक्टूबर 2019 तक खुले में शौंच मुक्त  भारत को हासिल करने का लक्ष्य रखा था और महात्मा गांधी के जन्म की 150 वीं वर्षगांठ तक ग्रामीण भारत में 1.96 लाख करोड़ रुपये की अनुमानित लागत के 1.2 करोड़ शौचालयों का निर्माण करने का भी लक्ष्य रखा गया था।जिसे सरकारी आंकड़ों के अनुसार पूरा भी किया जा चुका है।सरकारी योजनाएं कोई भी हो भ्रष्टाचारी अधिकारी कर्मचारी उसमें पैसे कमाने का तरीका खोज ही लेते है। इसी तरह से स्वच्छ भारत अभियान में पैसे कमाने के लिए अधिकारियों ने अनोखे जुगाड़ बनाया। ‘स्वच्छ भारत मिशन’ के तहत शौचालय निर्माण के लिए लाभार्थियों को 12-12 हजार रुपये देने के बजाय कथित तौर पर दलालों के जरिये हड़प लिए गए जा रहें।अगर जाँच हो तो मिशन के तहत बनने वाले शौचालय में लाखो का घोटाला सामने आ सकती है, एक ही शौचालय की फोटो को कई कई शौचालय की फोटो दिखाकर  योजनाओं का लाभ उठा जा चुका है।जितने भी शौचालय बनाये गए थे वो अब जर्जर हालात में पाए जा रहे हैं।फिर से लोग बाहर जाने को मजबूर हो गए।इसकी स्वतंत्र न्यायिक जांच होनी चाहिए।


शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

डार्क हॉर्स' : नीलोत्पल मृणाल

 

डार्क हॉर्स' नीलोत्पल मृणाल का उपन्यास है जिसकी कहानी सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे छात्रों के इर्द-गिर्द घूमती है।इसकी टैग लाइन है 'एक अनकहीं दास्तां...'।
 ‘‘डार्क हॉर्स’ महज एक उपन्यास भर नहीं हैबल्कि छात्र जीवन की अनगिनत अनकही कहानियों का संग्रह हैजो सभी छात्रों के जीवन से ताल्लुक रखता है।खासकर वैसे छात्र जो मुखर्जीनगर में जाकर सिविल सर्विस की तैयारी कर रहें होते हैं।

'डार्क हॉर्स’ का मुख्य किरदार संतोष बिहार के भागलपुर से सिविल सर्विस की तैयारी के लिए दिल्ली आता है। उत्तर प्रदेशबिहार जैसे हिंदी पट्टी के राज्यों से सिविल सर्विस की तैयारी करने के लिए लड़के या तो इलाहाबाद का रुख करते हैं या तो दिल्ली का। खास तौर से हिंदी माध्यम से तैयारी करने वाले लड़कों के लिए ये दो जगहें ही महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। जो थोड़े कमजोर घर से होते हैंवे इलाहाबाद रह कर तैयारी करते हैंऔर जो थोड़े साधन-संपन्न होते हैंवे दिल्ली के मुखर्जी नगर में अपना ठीकाना बनाते हैं।
‘जेतना दिन में लोग एमए - पीएचडी करेगा, हौंक के पढ़ दिया तो ओतना दिन में तो आईएसे बन जाएगा।’  नीलोत्पल मृणाल की यह लाइन काफी अच्छी लगी ,प्रभावशाली भी।साथ ही सिविल सर्विस के तैयारी कर रहे हैं उन छात्रों के लिए है जो बिहार- यूपी से तमाम ख़्वाब लेकर दिल्ली, इलाहाबाद जाते हैं।
इस उपन्यास को पढ़ते समय ऐसा महसूस होता है कि हम स्वयं मुखर्जीनगर के उन गलियारों में घूम रहे हैं जहाँ के हर-गली,मोहल्ला सिविल सर्विसेज के छात्रों से भरा पड़ा रहता है।जहां सबके जुबान पर भोजपुरिया टोन के माहौल देखने को मिलता है।यह भी नजर आता है कि छात्र किस तरह से खुद को माहौल के अनुसार समझौता कर लेता है।
इस किताब में सिर्फ सिविल सर्विस के तैयारी ही छात्रों की कहानी ही नहीं, बल्कि उनके गांव - शहर,संस्कृति, भाषा ,रहन-सहन, खानपान से लेकर उनके विचारों को दिखाने का प्रयास किया है। 'नीलोत्पल मृणाल' ने। 

दिल्ली के मुखर्जीनगर से लेकर यूपी-बिहार  गांवो का सफर करना चाहते या सिविल सर्विस के तैयारी कर रहें छात्रों के जीवंत घटनाओं से परिचय होना चाहते हैं तो 'डार्क हॉर्स' पढ़ सकते हैं।



गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

नल जल योजना के हकीकत

 जिस तरह से बिहार में कोरोना टेस्टिंग के घोटाले सामने आ रहे हैं उस तरह से नल जल योजना भी सवालों के घेरे में है।हर घर नल का जल योजना की शुरूआत 2017 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने की थी। लेकिन तीन वर्ष बाद भी योजना पूर्ण नहीं हो पाया है। इसके साथ ही कई जगहों पर तमाम घोटाले देखने को मिल रहे हैं।सरकार सिर्फ यह प्रचार करने में लगी रहती है कि हमने नलजल योजना के माध्यम से हर घर पानी पहुँचाने में सफल रहें।लेकिन क्या सरकार कोई सर्वे करा पाई है,क्या कोई डाटा है सरकार के पास ,इस योजना के अंतर्गत कितने लोग पानी का इस्तेमाल कर रहें हैं या नहीं? कई ऐसे जगह देखने को मिल रहा है जहां देखने केलिए टंकी लगा दिया गया है लेकिन पानी आज तक किसी के घर पहुँच नहीं पाया।कई ऐसे जगह है जहां कार्य शुरू होकर भी आज तक समाप्त नहीं हो पाया है।कई ऐसे जगह है जहाँ सिर्फ उदघाटन  होने के साथ पानी पहुँचना शुरू तो हुआ लेकिन उसके बाद आज तक लोग तरस रहे हैं पानी के लिए।कई वार्ड ऐसे हैं, जहां योजना पूरा कर लिया गया है, लेकिन हर घर तक पानी नहीं पहुंच पाया है।आये दिन इन योजना में घोटाले सामने आरहे हैं।




बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

महंगाई की मार

 कोरोना काल में आम आदमी की जेब तो ऐसे ही ढ़ीली पड़ गई है।अब ये महंगाई आम आदमी का जीना मुश्किल कर दिया है।पिछले कुछ दिनों से लगातार पेट्रोल, डीज़ल और गैसों के दाम में बढ़ोतरी हो रही जिसे आम आदमी महंगाई के बोझ तले दबता चले जा रहा है।

एक तरफ पेट्रोल कुछ शहरों में शतक लगा चुका है ,दूसरी तरफ गैसों के दाम में आए दिन बढ़ोतरी की जा रही है।अगर ऐसे ही गैसों के दाम बढ़ते रहे तो आम आदमी फिर से जीवाश्म ईंधन प्रयोग करने केलिए मजबूर हो जाएंगे।

पिछले 10 दिनों के भीतर  रसोई गैस के सिलेंडर में 75 रुपये की बढ़ोतरी की गई है।यही नहीं, दो महीने के भीतर सिलेंडर की कीमत में 175 रुपये की वृद्धि की जा चुकी है. आज के समय में राजधानी दिल्ली में एक सिलेंडर 769 रुपये का बिक रहा है।इससे आम जन जीवन प्रभावित हो रहा है।सरकार को चाहिए कि आम आदमी के समस्याओं को समझते हुए महंगाई को कम करने का कोशिश करें।

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

हिंसक होना देशहित व समाज हित कतई नहीं

 युवाओं को हिंसक गतिविधियों में शामिल होना बड़ा चिंतनीय विषय है।हाल ही में बिहार सरकार ने एक नई दिशा-निर्देश जारी की है कि हिंसक-गतिविधि में शामिल युवाओं को अनुबंध के आधार पर सरकारी नौकरी में शामिल नहीं की जायेगी।सरकार चाहती है कि हमारे युवा हिंसक न हो।बेशक हिंसक होना देशहित व समाजहित में कतई नहीं है।लेकिन सरकार के इस नियमावली में एक बड़ा सवाल खड़ा करती है कि अगर युवा जायज मांग केलिए आंदोलन-प्रदर्शन कर रहें हो और कुछ असामाजिक तत्वों के लोग आंदोलन को हिंसक रूप में परिवर्तित कर दें तब क्या होगा? ज्यादातर देखा गया है कि हिंसक आंदोलन में निर्दोष लोग ही फंस जाते हैं।पुलिस की क्या भूमिका रहती है इसे कहने की जरूरत नहीं है?राजनीतिक दलों की क्या भूमिका रहती है यह भी कहने की जरूरत नहीं है?

गंभीर आपराधिक रूप से लिपटे लोगों के लिए तो पहले से ही कानून थे लेकिन अब हिंसा में शामिल लोगों केलिए यह प्रावधान लाई जा रही है।ताकि युवा इस डर से सरकार के विरोध में कोई आंदोलन न करें।
लेकिन ये प्रावधान तो सिर्फ युवाओं के लिए है तो क्या सरकार उन नेताओं पर अंकुश लगाएगी जो किसी राजनीतिक आंदोलन को हिंसक रूप देते हैं? क्या उन नेताओं के लिए चुनाव न लड़ने का कोई प्रावधान ला सकती है? 



बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

पत्रकारिता का संकट

सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले पत्रकारों पर कार्रवाई को लेकर इन दिनों लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं।अभी खबरें आ रही है कि न्यूज़क्लिक के ऑफिस में ईडी ने छापा मारा है।  हाल ही में सिंघु बॉर्डर पर किसान आंदोलन को कवर कर रहे पत्रकार मनदीप पूनिया को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया था। इसका भी सोशल मीडिया पर जोरदार विरोध हुआ था। इसके बाद दिल्ली की एक अदालत ने पूनिया को जमानत दे दी थी। 
किसान आंदोलन से जुड़ी ख़बरों को लेकर वरिष्ठ पत्रकार राजदीप ,मृणाल पाण्डेय, कांग्रेस सांसद शशि थरूर सहित पत्रकार परेश नाथ, अनंत नाथ और विनोद के जोस के ख़िलाफ़ दिल्ली, नोएडा में एफ़आईआर हो चुकी है। इसे लेकर सोशल मीडिया पर सरकार की खासी आलोचना हो रही है। 
हालांकि मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए छह पत्रकारों और कांग्रेस सांसद शशि थरूर को बड़ी राहत दी है। अदालत ने कहा है कि अगले आदेश तक इन लोगों को गिरफ़्तार नहीं किया जा सकता है। 


मंगलवार, 9 फ़रवरी 2021

विपक्ष का संकट

 

एक स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए एक मज़बूत सरकार के सामने एक मजबूत विपक्ष का होना ज़रूरी समझा जाता है. विपक्ष सरकार के कार्यों और नीतियों पर सवाल उठाता है और उसे निरंकुश होने से रोकता है.



संसद में अगर विपक्ष कमज़ोर होता है तो मनमाने तरीके से सत्ता पक्ष कानून बना सकता है और सदन में किसी मुद्दे पर अच्छी बहस मज़बूत विपक्ष के बिना संभव नहीं है.लेकिन मौजूदा वक्त में वही विपक्ष अगर सवाल करता है तो बड़ा हास्यास्पद लगता है।क्या आप के पास कोई आकड़ा है कि किसान आंदोलन में अभी तक कितने किसानों ने खुदख़ुशी की है?तब सरकार का जवाब आता है नहीं हमारे पास कोई आकड़ा नहीं है।यहां तक मौजूदा वक्त में विपक्ष के साथ कैसा बर्ताव किया जा रहा है चाहे वो सकारात्मक सवाल क्यों न उठा रहा हो लेकिन सत्ता पक्ष जवाब देने के बजाए नकारात्मक साबित करने केलिए एक अलग माहौल चला देती है।

दरअसल बीते अस्सी दिनों से चल रहे आंदोलन में लगभग दो सौ से अधिक किसानों की जाने जा चुकी है।लेकिन सरकार के पास कोई आकड़ा नहीं है।यह आंदोलन एक बड़ा सवाल खड़ा कर रही है।अगर किसान बिल किसानों के हित में है तो क्यों आज तक मोदी सरकार किसानों को समझाने में नाकाम रही है?

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2021

कांग्रेस का संकट

 देश की सबसे पुरानी पार्टी के अध्यक्ष पद का चुनाव लगातार चर्चा का विषय बनते जा रहा है।पहले बताया गया था कि मई में चुनाव होगा परंतु अब जून में होगी।भले ही अब जून में  होगा लेकिन क्या पता जून में होगा भी या नहीं ये कहना मुश्किल है।क्योंकि जिस प्रकार से नेतृत्व कांग्रेस कर रही है ये विचारणीय तो है ही।लगातार कांग्रेस कमजोर होती नजर आ रही है।हाल ही में लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद राहुल गांधी ने यह कहते हुए अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था कि अब गांधी परिवार से बाहर से कोई अध्यक्ष पद केलिए चयनित होगा।लेकिन आखिर में फिर से सोनिया गांधी को बना दिया गया।उसके बाद भी माना जा रहा था कि यह चुनाव कुछ समय केलिए ही की गई है,पर अब एक साल से ज्यादा हो चुकी है लेकिन अब तक कुछ हुआ नहीं।यह सत्य भी है कि राहुल गांधी अध्यक्ष पद पर न रहते हुए भी पार्टी का फैसला लेते रहें हैं।जब राहुल गांधी के निशाने पर सीधा प्रधानमंत्री मोदी होते हैं तब कांग्रेस अपने ही नेता अपने ही से लड़ रहे होते हैं।चाहे वो मध्यप्रदेश में कमलनाथ और सिंधिया हो या फिर राजस्थान में गहलोत और पायलट हों।  पिछले कुछ सालों में देख गया है कि पार्टी अपने किसी एक स्टैंड पर खड़ी नहीं होती है।हाल ही में  कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल समेत कई नेताओं ने पार्टी नेतृत्व पर सवाल खड़ा कर चुके हैं।


मेरा मानना है कि कांग्रेस मतलब गांधी परिवार पार्टी के ही कुछ चाटुकारों से घिर गया है।ये चाटूकार अपने स्वार्थ केलिए गाँधी परिवार की चमचागिरी करते रहते हैं।यह मैं इसलिए कह रहा हूँ कि पार्टी के सदस्यगण खुद फैसला लेने के बजाए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर छोड़ देते हैं।तब यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सोनिया गांधी अपनी  पार्टी के अंदरूनी मामला को सुलझा पायेगी? यह कहना भी मुश्किल है कि कब कांग्रेस नेतृत्व अपने को मजबूत कर पाएगी और अध्यक्ष पद का चुनाव कब तक करेगी ?

समस्या यह नहीं है कि हर फैसला सोनिया गांधी के नाम पर टाला जा रहा है बल्कि यह है कि उन मुद्दों पर कहीं कोई समाधान निकलता नहीं दिख रहा है।

कांग्रेस केलिए बेहतर होगा कि नेतृत्व को मजबूत करें और यही भी समझे कि इन सबका जिम्मेदार वह स्वयं खुद है।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

डायरी -3

 प्यार हमारा अमर रहेगा याद करेगा जहान

तु मुमताज हैं मेरे ख्वाबो की मै तेरा शाहेजहा


ये गीत जब भी सुनता हूँ।सबसे पहले तुम्हारा ही ख्याल आता है।आज भी मैं तुम्हारी  ही आवाज में सुनना पसंद करता हूँ।अरे आज कल  तो पहले से ज्यादा सुनने लगा हूँ।

पता नहीं मुझे , तुम्हें याद है या ये भी भूल गई।पर मैं तो चाह कर भी नहीं भूल सकता हूँ।

चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते, खाते-पीते हर वक्त याद आती रहती  हो।तुम में क्या बात है, वो मैं भी नहीं जानता, लेकिन तुम  में कुछ न कुछ तो जरूर है।इसलिए तो चाह कर भी नहीं भूल पाता हूँ।

मानता हूं अब सिर्फ औपचारिकता ही रह गया है।अब पहले जैसा कुछ नहीं पर मैंने हर वो पल को बचा रखी है जो कभी हमने महसूस किए थे।

जब तक हम एक थे तब तक बिना एक दूसरे का हाल जाने बगैर चैन से न रह पाते थे।पर अब तो ऐसा कुछ न होता है।नाराजगी तो उस वक्त भी होती थी पर रूठना मनाना तो अहम हिस्सा था।

सच पूछो तो मैंने कभी सोचा नहीं था कि इतनी छोटी वक्त के लिये आओगी।

सच में ये उम्मीद भी कितनी अजीब है नlसब जानते हुए भी एक उम्मीद बची है कि सब कुछ पहले जैसा हो जाने की उम्मीद।घण्टों बात करने की उम्मीद,फिर से वही फ़ोन कॉल की उम्मीद।उम्मीद है लौट आने की।पर ये उम्मीद तो हर रोज टूटी है फिर पता न ये उम्मीद होती क्यों है?


शनिवार, 30 जनवरी 2021

गांधी से महात्मा गांधी का सफर

 

महात्मा गाँधी की पुण्य तिथि पर शहीद दिवस हर वर्ष 30 जनवरी को मनाया जाता है। 30 जनवरी, 1948 का ही वह दिन था, जब शाम की प्रार्थना के दौरान सूर्यास्त के पहले महात्मा गाँधी पर हमला किया गया था। वे भारत के महान् स्वतंत्रता सेनानी थे और लाखों शहीदों के बीच में महान् देशभक्त के रूप में गिने जाते थे। भारत की आजादी, विकास और लोक कल्याण के लिये वे अपने पूरे जीवन भर कड़ा संघर्ष करते रहे। 30 जनवरी को नाथूराम गोड़से ने महात्मा गाँधी की गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी, जिसके कारण यह दिन भारत सरकार द्वारा शहीद दिवस के रूप में घोषित किया गया है। तब से, महात्मा गाँधी को श्रद्धंजलि देने के लिये हर वर्ष 30 जनवरी को शहीद दिवस मनाया जाता है। 30 जनवरी, 1948 देश के लिये सबसे दु:ख का दिन है, जो भारतीय इतिहास के लिये सबसे जहरीला दिन बन गया था। गांधी स्मृति वह जगह है, जहाँ शाम की प्रार्थना के दौरान बिरला हाऊस में 78 वर्ष की उम्र में महात्मा गाँधी की हत्या हुई थी।

"पाँच फ़रवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के चौरी चोरा नामक स्थान पर गांधी जी के ‘असहयोग आंदोलन’ में भाग लेने वाले प्रदर्शनकारियों के एक बड़े समूह से पुलिसकर्मियों की भिड़ंत हो गई थी।जवाबी कार्रवाई में प्रदर्शनकारियों ने एक पुलिस चौकी में आग लगा दी थी जिसके कारण बाईस पुलिसकर्मी और तीन नागरिक मारे गए थे।हिंसा की इस घटना से व्यथित होकर गांधी जी ने अपने ‘असहयोग आंदोलन’ को रोक दिया था।पर उन्होंने अपनी माँगों को लेकर किए जा रहे संघर्ष पर विराम नहीं लगाया; उसमें बड़ा संशोधन कर दिया।



गांधी ने अपनी रणनीति पर विचार पुनर्विचार किया। दो साल बाद 12 मार्च 1930 को ‘नमक सत्याग्रह’ के सिलसिले में जब अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से चौबीस दिनों के लिए 378 किलो मीटर दूर दांडी तक यात्रा निकाली तो उसमें सिर्फ़ अस्सी अहिंसक सत्याग्रही थे। एक-एक व्यक्ति का चयन गांधी ने स्वयं किया था और उसमें समूचे भारत का प्रतिनिधित्व था।ज़्यादातर सत्याग्रहियों की उम्र सोलह से पच्चीस वर्ष के बीच थी। छह अप्रैल 1930 को जब गांधी ने दांडी पहुँचकर नमक का कानून तोड़ा तो अंग्रेज़ी हुकूमत हिल गई थी।"

जब महात्मा गाँधी चम्पारण पहुँचे तो उन्होंने पाया कि वहां हजारों भूमिहीन एवं गरीब किसान खाद्यान के बजाय नील की फसलों की खेती करने के लिये बाध्य हो रहे थे. नील की खेती करने वाले किसानों पर अंग्रेज़ों के अलावा कुछ बगान मालिक भी जुल्म ढा रहे थे. चम्पारण के किसानों से अंग्रेज़ बाग़ान मालिकों ने एक अनुबंध करा लिया था जिसके अंतर्गत किसानों को ज़मीन के 3/20वें हिस्से पर नील की खेती करना अनिवार्य था जिसे  'तिनकठिया पद्धति' कहते थे.

यहीं से मोहनदास करमचंद गांधी को 'महात्मा' के तौर पर पहचान मिला तथा चम्पारण सत्याग्रह को भारत की आज़ादी के इतिहास का मील का पत्थर माना जाने लगा. कहा तो ये भी जाता है कि इसी आंदोलन से प्रभावित होकर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें 'महात्मा" नाम से संबोधित किया था और तभी से लोग उन्हें महात्मा गांधी कहने लगे थे.



जब महात्मा गाँधी 15 अप्रैल, 1917 को मोतिहारी पहुँचे थे तब पूरे महात्मा गांधी, चम्पारण, बिहार में किसानों के भीतर आत्म-विश्वास का जबर्दस्त संचार हुआ था जिसके कारण गांधीजी को धारा-144 के तहत सार्वजनिक शांति भंग करने के प्रयास की नोटिस भेजी गई थी. लेकिन इसका कुछ भी असर उन पर नहीं पड़ा बल्कि उनका कद और ख्याति बढ़ती ही चली गई. अब मार्च 1918 आते-आते 'चंपारण एगरेरियन बिल' पर गवर्नर-जनरल के हस्ताक्षर के साथ तीनकठिया समेत कृषि संबंधी अन्य अवैध कानून भी समाप्त हो गए थे.  मोहनदास करमचंद गांधी द्वारा 1917 में संचालित यह सत्याग्रह भारतीय इतिहास की एक ऐसी घटना थी, जिसने ब्रिटिश साम्राज्यवाद को खुली चुनौती दी थी. गांधीजी की अगुवाई वाले इस आंदोलन से न सिर्फ नील के किसानों की समस्याओं का फौरन हल हुआ था, बल्कि सत्य, अहिंसा और प्रेम के संदेश ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध भारतीयों को एकजुट भी किया था.