बुधवार, 16 अक्टूबर 2024

शरद पूर्णिमा

 शरद पूर्णिमा हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जिसे अश्विन माह की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इसे रास पूर्णिमा या कोजागरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। शरद पूर्णिमा को विशेष इसलिए माना जाता है क्योंकि इस दिन चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है और अपनी किरणों से धरती पर अमृत बरसाता है।


इस दिन से जुड़ी एक खास परंपरा है कि लोग रात में खुले आसमान के नीचे खीर रखते हैं, ऐसा माना जाता है कि चंद्रमा की किरणें इस खीर पर पड़ती हैं, जिससे उसमें औषधीय गुण आ जाते हैं। अगले दिन यह खीर प्रसाद के रूप में ग्रहण की जाती है।


शरद पूर्णिमा के साथ कई धार्मिक मान्यताएं भी जुड़ी हैं, जैसे इस दिन भगवान कृष्ण ने गोपियों के साथ रासलीला की थी। वहीं, इसे माता लक्ष्मी की आराधना के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है, खासतौर पर "कोजागरी व्रत" रखने वालों के लिए, जो रात भर जागकर मां लक्ष्मी से धन और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।


बुधवार, 21 सितंबर 2022

राहुल गांधी की पदयात्रा,भाजपा में खलबली

 राहुल गांधी की पदयात्रा,भाजपा में खलबली


जब राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा पर निकलने से पहले हल्ला बोल रैली किए।तब सबसे पहले लीटर और आटा का विवाद सामने आ गया।जैसे कुछ वर्ष पहले आलू से सोना वाला बयान को वारयल किया गया था।इस बार भी वीडियो को वायरल करने की कोशिश की गई।लेकिन भाजपा को बहुत बड़ी कामयाबी नहीं मिली।क्योंकि अब लोगों को बहुत ज्यादा पसंद नहीं आता। सच बात तो यही है भाजपा ने राहुल गांधी पर वार करने की कोई कसर नहीं छोड़ा है।और भाजपा को सबसे बड़ी कामयाबी भी मिली है।चाहे तो 2014 का चुनाव हो या 2019 का।लेकिन मुझे लगता है इस बार यानि 2024 के चुनाव ये वार काम नहीं आने वाला। भाजपा को अब कुछ और तरीके तलाशने होंगे। क्योंकि हाल ही जैसे ही भाजपा ने टी-शर्ट पर सवाल उठाया उसमें वो खुद फंसने लगी। जैसे ही भारत जोड़ो यात्रा को भारत छोड़ो कहने की कोशिश की गई।लेकिन दांव उलटी पड़ गयी।जैसे ही स्मृति ईरानी ने विवेकानंद को लेकर राहुल गांधी पर सवाल किया।लेकिन फिर से भाजपा की फजीहत हुई।

भारत जोड़ो यात्रा जैसे जैसे बढ़ रही है वैसे वैसे कई पुरानी यात्राओं का जिक्र सामने आ रहा है।चाहे वो राजीव गांधी की यात्रा हो,चाहे वो विनोद भावे की यात्रा हो ,चाहे वो पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की यात्रा हो। इन सारी यात्राओं को याद करने की वजह यह है को इन सारी यात्राओं के बाद भारत की सियासत में बदलाव हुए हैं। तो क्या कांग्रेस देश का माहौल बदलने में कामयाब होगी?

राहुल गांधी ने यात्रा की शुरुआत दक्षिण से किया है।दक्षिण वो कमजोर कड़ी है जहां पर भाजपा आज भी कमजोर है।तब जब वो अपने सबसे अच्छे दौर में है।हालांकि भाजपा को अनुमान है कि इस बार दक्षिण में बेहतर प्रदर्शन करेगी।भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का यह बयान नहीं भूलना चाहिए जब उन्होंने कहा था कि बीजेपी के अलावा कोई पार्टी इस देश में नहीं बचेगी।चाहे वो क्षेत्रीय दल हो या राष्ट्रीय। इस बयान का मतलब सिर्फ राजनीति ही हो सकता है। क्योंकि अगर कांग्रेस ख़त्म हो जाती है उसके बाद क्षेत्रीय दल भी खत्म हो जाएंगे फिर बचेगा कौन? कुछ दिन पहले शरद पवार ने भी कहा था कि जैसे जैसे कांग्रेस कमजोर हो रही है वैसे वैसे क्षेत्रीय दल मजबूत होती जा रही है।निश्चित तौर पर शरद पवार की बात सही भी लगती है जैसे अगर देखा जाए केजरीवाल की पार्टी एक क्षेत्रीय पार्टी है जिस तरह से उन्होंने दिल्ली से पंजाब तक विस्तार किया अब गुजरात में भी कोशिश कर रहे हैं। वैसे ही बंगाल में ममता बनर्जी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।हालांकि नीतीश कुमार और शरद यादव ने पहले ही कह दिया है कि कांग्रेस के बिना केंद्र की राजनीति सम्भव नहीं है।


दरअसल लोकसभा की राजनीति अलग क़िस्म की होती है।जहां दो दल आमने सामने होते हैं। जैसे एनडीए और यूपीए। आज के दौर में बीजेपी जितना मजबूत स्थिति में है उसके इर्दगिर्द भी कांग्रेस नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे एक जमाने में कांग्रेस भी हुआ करती थी। लेकिन एक सवाल यह भी है कि आज जिस स्थिति में बीजेपी है क्या वह अपने प्रदर्शन को बरकरार रख सकती है? यह अपने आप में बहुत बड़ा सवाल है। क्योंकि कांग्रेस को जितना खोना था उतना खो चुकी है।कांग्रेस के लिए इससे बुरी स्थिति क्या हो सकती है पार्टी के शीर्ष नेता ही पार्टी छोड़ कर जा चुके हो। चाहे वो गुलाम नबी आजाद हो या कपिल सिब्बल जैसे दिग्गज नेता।इसलिए देखा जाए तो कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं है। लेकिन फिलहाल बीजेपी को भरोसा है कि वो अपने प्रदर्शन को बरकरार रख सकती है।लेकिन फिर भी बीजेपी के लिए 2024 का चुनाव चुनौतीपूर्ण होने वाला है।


अरुणेश कुमार, चंपारण

शुक्रवार, 12 अगस्त 2022

बचपन सीरीज : 3

 बचपन : 2


रक्षाबंधन का वो दिन भी याद है।जब राखी अपने पसंद से ख़रीदवाते थे।अगर अपने पसन्द का राखी नहीं हुआ तो बंधवाते भी नहीं थे।


हमारे यहां नागपंचमी के दिन से ही हर चौक पर मेला लगता था।उस मेले में हम लोग जाया करते थे।मेला जाने के लिए अलग से तैयारी होती थी।जब पता चल जाता था कि नागपंचमी आने वाला है तो हमलोग पैसा जमा करना शुरू कर देते थे।मुश्किल से 5-10रुपये तक जमा कर पाते थे।तब तक मेला का दिन आ जाता था।घर से भी मुश्किल से 10-15 रुपये मिलते थे।उतना ही में पूरा मेला घूम लेते थे।उसी मेला से राखी भी ख़रीदवाते थे।


एक बार की बात है कि राखी के सुबह में ही बहन से झगड़ा हो गया।मार-पीट भी हुई।गुस्सा में बहन को बोले - हम तुमसे राखी नहीं बांधवाएंगे। वो भी बोली तुमको बांधने कौन जा रहा है।फिर पापा जी आते थोड़ा डांट लगाते।उसके बाद राखी बांधवा लेते।कभी कभी ऐसा भी होता था कि बहन के हिस्से वाला मिठाई भी छीनकर खा जाते थे।


ऐसे ही एक बार छोटे थे तब मेरी दीदी भी छोटी ही थी।दीदी से भी राखी बाँधवाने जाते थे। दीदी राखी के पहले से ही बोल देती थी कि इस बार बिना पैसा के राखी नहीं बांधेंगे।मेरा हमेशा की तरह जवाब रहता था ठीक है।जब दीदी के पास राखी बांधवाने जाते थे तब वो पहले ही पूछ लेती थी पैसा लाए हो।मैं झूठ बोल देता था हां।तब दीदी भी राखी बांधने के बाद पैसा मांगती थी। मेरे पास पैसा नहीं रहता तो दीदी बोलती थी।मेरा पैसा दो राखी बांधे हैं मिठाई खिलाए है।सबका पैसा दो तब ही जाने देंगे।उसके बाद लड़ाई झगड़ा होता था।फिर कोई आता झगड़ा शांत कराता।हम गुस्से में राखी तोड़ कर फेंक देते थे।उसके बाद चले आते थे। घर आओ तो राखी तोड़ने के लिए भी कुटाई होती थी।


समय बीतता गया अगले साल फिर राखी आयी।दीदी तो पहले ही बोल दी थी।इस बार बिना पैसा के राखी नहीं बांधना है।हम सुबह पर नहाकर दीदी के पास गए।इस बार तो दीदी पहले ही बोली पैसा देगा तब ही राखी बांधेंगे। थोड़ा बहस किए।लेकिन इस बार दीदी मनाने वाली नहीं थी।हम रोते हुए वापस आए।पापा जी दीदी बोली है पैसा मिलेगा तब राखी बांधेंगे।तो मेरे पापा जी बोले कि पूछकर आओ कितना पैसा चाहिए।फिर हम वापस दीदी के पास गए।वो बोली हमको पांच रुपया चाहिए।हम फिर पापा जी से आकर बोले।वो बोले कि अभी पैसा नहीं है जाकर पूछो कि दूध लेगी। क्योंकि मेरे उस समय मेरे घर गाय थी जो दूध दे रही थी। फिर हम दीदी से पूछे कि दीदी मेरे पास गाय का दूध है वही दे देंगे। तब दीदी मान गई। उसके बाद राखी तो बांध दी लेकिन मिठाई नहीं खिलाई।हम फिर वापस रोते गए। घर से ढाई सौ ग्राम दूध लाए।उसके पास मिठाई खाए।फिर दौड़ते हुए वापस आए।

ऐसे ही कभी दूध देकर तो कभी आम खिलाकर राखी बाँधवाते थे।उसके बाद भी प्यार बना रहता था।


अरुणेश कुमार 

Arunesh Kumar #RakshaBandhan

मोदी के लिए खतरा हो सकते हैं नीतीश

 *मोदी के लिए खतरा हो सकते हैं नीतीश*


नीतीश कुमार में क्या है कि भाजपा से अलग होते ही राजनीतिक गर्म हो चुकी है।कुछ लोगों का कहना है कि नीतीश की राजनीति खत्म हो गयी।जब उनकी राजनीति खत्म हो गयी तो फिर क्यों चर्चा हो रही है? क्या यह पहली बार है कोई पार्टी भाजपा से अलग हुई है? इसके पहले भी शिवसेना अलग हुई थी। अकाली दल भी अलग हुई। बिहार में ही उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी अलग हुई थी। तब तो कोई बात नहीं हुई थी।अब जदयू के अलग होने पर बवाल क्यों ? 

इसका सीधा मतलब है कि भाजपा के अंदर छटपटी होने लगी है।शायद अंदर ही अंदर डर हो रही है। क्योंकि यही नीतीश कुमार हैं जो सबसे पहले नरेंद्र मोदी का विरोध किए थे। वही उस समय जब पूरे देश में मोदी लहर बनाया जा रहा था।यहां तक मोदी के DNA वाले बयान को एक मुद्दा बनाकर पूरे बिहार में घूमे।

अगर देखा जाए तो बिहार के सबसे बड़े खिलाड़ी नीतीश ही हैं।चेहरा भी नीतीश हैं।फिर भी नीतीश बीजेपी के सामने नतमस्तक रहें।2020 के चुनाव में नीतीश के खिलाफ साजिश करके जदयू को BJP के द्वारा हानि पहुँचाया गया।फिर भी नीतीश भाजपा के साथ ही रहें।फिर अचानक क्या हुआ कि पार्टी तोड़ने का आरोप लगा कर नीतीश अलग होकर भाजपा के विपक्ष में चले गए। वो भी तक जब पूरे देश में विपक्ष को डराया जा रहा हो।

नीतीश कुमार राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं।नीतीश कैसे अपने सामने से बड़े बड़े राजनेताओं को बाहर का रास्ता दिखा देते हैं कोई समझ नहीं पाया।चाहे वो जॉर्ज फर्नांडिस हो ,दिग्विजय सिंह हो , शरद यादव हो या फिर राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले प्रशांत किशोर हो।

याद होगा 2020 के चुनाव में नीतीश कुमार ने आखरी दांव खेलकर सबको चौका दिया था।जब उन्होंने एक रैली में कहा था कि यह मेरा आखिरी चुनाव है।उसके बाद रिजल्ट क्या हुआ यह किसी से छिपा नहीं है।


दरअसल नीतीश कुमार का यह आखिरी दांव है। अब वो देख रहे हैं कि कांग्रेस की सोनिया गांधी बीमार हैं।राहुल ग़ांधी की छवि को बिगाड़ा जा चुका है।उधर शरद पवार की स्थिति उतनी अच्छी नहीं है।बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की हालत क्या है यह बताने की जरूरत नहीं है।नवीन पटनायक का भी वही हाल है।मतलब विपक्ष के तरफ से नीतीश कुमार को टक्कर देने वाला कोई है नहीं।इसलिए भाजपा से नाता तोड़ते ही नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा था।यहाँ ध्यान देने की बात है कि पिछली बार कांग्रेस ,जदयू और राजद के साथ गठबंधन हुआ था तब इनके सामने मोदी लहर भी फेल हो गयी थी और इसबार तो सात राजनीतिक पार्टियों का समर्थन है।अब महागठबंधन के पास नीतीश कुमार जैसे नेता हैं।अगर जातीय समीकरण से देखा जाए तो सबसे ज्यादा समर्थन बल है। इसी कारण से नीतीश कुमार देश की सक्रिय में फिट बैठ रहे हैं।

अगर नीतीश कुमार विपक्षी पार्टियों को एक जुट करने में सफर रहते हैं तो नरेन्द्र मोदी के लिए नीतीश खतरे से कम नहीं होंगे।क्योंकि नीतीश के साथ सिर्फ बिहार ही नहीं सारी विपक्षी राज्यों का समर्थन मिलेगा। चाहे वो झारखंड,उड़ीसा, बंगाल, आंध्र प्रदेश, राजस्थान ,तेलंगाना, तमिलनाडु,पंजाब या दिल्ली हो। सबका समर्थन नीतीश को मिल सकता है। क्योंकि ये सभी चाहते हैं कि भाजपा को सत्ता से बाहर करना है।

नीतीश एक ऐसे चेहरे हैं जिनके ऊपर भ्रष्टाचार जैसे कोई आरोप नहीं लगे हैं।जो BJP के लिए मुश्किल पैदा कर सकते हैं।अगर BJP कुछ आरोप लगाती भी है तो उसके लिए वो स्वयं जिम्मेदार हो सकते हैं।क्योंकि नीतीश के साथ बिहार में सबसे ज्यादा दिन वहीं रही है।




मंगलवार, 9 अगस्त 2022

बचपन सीरीज : 2

 बचपन से ही क्रिकेट कमेंट्री सुनने से ज्यादा मजा क्रिकेट देखने में आता था। टीवी पर देखने का विकल्प नहीं मिल पाता तब रेडियो तो था ही। ऐसे ही एक बार भारत और पाकिस्तान का मैच शुरू होने वाला था। लेकिन लाइट पिछले कई दिनों से आई नहीं थी। और हवा भी तेज चल रही थी क्योंकि उस समय लाइट की स्थिति उतनी अच्छी नहीं थी इसलिए थोड़ा भी हवा बहना शुरू होती थी कि लाइट गायब।इसलिए पता था कि टीवी देखने का जुगाड़ नहीं लग पायेगा।फिर हमने तय किया कि रेडियो पर ही सुना जायेगा।

उस समय स्कूल मॉर्निंग ही चल रही थी।तो हम स्कूल चले गए। संयोग से दिन शुक्रवार था।हर शुक्रवार के शुक्रवार हमारे स्कूल में हाफ टाइम के बाद खेल खेलाया जाता था। हमलोगों को खेलने के क्लास से बाहर निकाला गया। उसी बीच में पता चला कि स्कूल के बगल में ही मेरे दोस्त के घर मैच चल रहा है। हम बिना पूछे स्कूल से निकल गए क्रिकेट देखने। अभी 3-4 ओवर ही देखे थे कि किसी ने स्कूल में खबर कर दी।

हमें बुलाने के लिए स्कूल से बुलावा आया।हम नहीं गए।कुछ ही समय बाद 2-3 लड़के आए मुझे टांग कर ले गए।स्कूल में पहुँचने के बाद खूब धुलाई हुई। क्योंकि एक गलती यह भी थी कि मेरे साथ 4-5 लड़के और भी थे। सबने मेरा नाम ही लिया।कि इसी के कहने पर गए थे। जिसके चलते मेरी धुलाई थोड़ा ज्यादा हुई। 

अब समय 11 बजे चुके थे।स्कूल की छुट्टी हुई।हम फिर मैच देखने निकल गए।तब तक हवा भी तेज हो चुकी थीं। उस समय टीवी देखने के लिए एंटीना का इस्तेमाल किया जाता था।हवा तेज होने के चलते टीवी पर पिक्चर फ्रेश नहीं आ रहा था।एंटीना को बांस के सहारे खड़ा किया गया था।हवा तेज होने के चले बार बार एंटीना दिशाहीन हो जा रहा था।

उसके लिए एक जुगाड़ लगाया गया कि एक-एक ओवर एक लड़का बांस को पकड़े रखेगा।फिर दूसरे ओवर के बाद दूसरा लड़का।चूंकि मैच देखने वाले 10-12 लोग थे इसलिए हर 10-12 ओवर के बाद मौका मिलता था। हालांकि अंत तक क्रिकेट देखा गया। जिसमें भारत की जीत भी हुई।


......बने रहे हमारे साथ इसके आगे की कहानी बहुत जल्द ही।


सोमवार, 8 अगस्त 2022

बचपन सीरिज :1

 

कभी कभी दिन के सन्नाटे पुराने लम्हों की याद दिलाते हैं।मुझे याद है बचपन में मुझे टीवी देखने का बड़ा शौख था।उस समय गांवों में जिनके घर ब्लॉक & वाइट टीवी भी होता तो खुद को अमीर समझता था।आप पास में चर्चा भी होती थी अरे उनके टीवी है।  उस समय केबल का जमाना भी नहीं था वहीं  DD1,Metro और एक कोई नेपाली चैंनल पकड़ता था। उसे ही देखने के लिए काफी भीड़ होती थी। उस वक्त बहुत कम गांवों में बिजली भी पहुँची थी।बिजली का पोल और ट्रांफॉर्मेर तो था लेकिन लाइट तो आती नहीं थी।लाइट आती भी थी तो कभी दो-तीन दिन पर तो कभी महीनों दिन पर।
बहरहाल, टीवी देखना पसंद तो था लेकिन अपने घर टीवी थी नहीं।तो हम अपने घर के आसपास टीवी देखने जाया करते थे। घर की आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी थी नहीं कि टीवी खरीदा सकें। तो जब भी टीवी देखना होता तो अपने बगल के घर में जाया करते थे। पहले तो खूब मजे से देखें।मजा भी आने लगा।धीरे धीरे स्थिति ऐसी थी कि स्कूल से आओ बस्ता फेंको और टीवी देखने दौड़ जाओ।उस समय हम शक्तिमान और जूनियर जी देखते थे।


बाद में वे लोग टीवी तभी दिखाते थे।जब तक उनके घर का सारा काम न कर दूं।कभी पानी पिलाओ तो कभी बाहर से कोई सामान खरीद कर लाओ।यहां तो टीवी देखना था उसके खुशी में कोई कुछ भी कराए चाहे वो शोषण ही क्यों न हो।क्या फर्क पड़ता है? समझ तो रहती नहीं।मतलब तो सिर्फ टीवी देखने से रहता था।


कभी कभी ऐसा भी होता था।लाईट आई और हम टीवी देखने के लिए दौड़ जाते थे।उनके घर जाओ तो टीवी बंद कर देते थे।और हम वापस मुँह लटकाए अपने घर आ जाया करते थे। परिस्थिति ऐसी थी कि अपने घर में भी नहीं बता सकते थे।क्योंकि अगर घर पर बताओ तो यहां भी पिटाई खाओ।क्यों गए थे टीवी देखने।इस तरह के तमाम सवालों से गुजरना पड़ता था।


इसके बाद भी कभी कभी मन करता था कि अब से टीवी देखने नहीं जाएंगे।अपने घर टीवी होगा तो देखेंगे।लेकिन जैसे ही शक्तिमान का प्रोमो शुरू होता।सारा दुःख दर्द को भूलकर दौड़ जाते।कई बार तो ऐसा हुआ जैसे ही दौड़कर गए कि लाइट कट गई।फिर मुँह लटकाए वापस आ जाते या कुछ देर वहीं इंतजार करते रहते थे।
खैर उसके कई सालों बाद हमारे घर भी टीवी आई।जिसकी कहानी फिर कभी।


रविवार, 7 अगस्त 2022

यार जादूगर : नीलोत्पल मृणाल

 लेखक नीलोत्पल मृणाल की ये तीसरी किताब है, पहली दो किताब भी मैने पढ़ी है, तीनो किताब बिल्कुल अलग ही विषय वस्तु को आधार बना कर लिखी गई है।

यार जादूगर है गांव-कस्बों में रहते किरदारों की कहानी, व्यवस्था की कहानी, जीवन के सार की कहानी। सार का मतलब  सामाजिक व्यवस्थाओं पर व्यंग्य से लेकर जीवन के अध्यात्म तक का यह पूरा पैकेज है। इसके पात्र हंसाते हैं लेकिन उनकी व्यंगात्मक शैली वर्तमान पर चोट भी करती है। किसी सीरियल की तरह दिमाग़ में दृश्य बनते जाते हैं।

प्रस्तुति अद्भुत है, शब्दो और मुहावरों का प्रयोग अति सुंदर है

पात्रों की भाषा, आम बोलचाल की भाषा है जिसे ठेठ बिहारी कह सकते हैं।

किताब के कुछ व्यंग्य हमें पिछली किताबों के नीलोत्पल मृणाल की याद दिला देते हैं।

अंत में इतना ही कहूंगा कि अगर नए लेखकों में दिलचस्पी रखते हैं तो इस किताब को पढ़ लेने में कोई गुरेज नहीं है।



बुधवार, 13 जुलाई 2022

बिहार में बदहाल है शिक्षा व्यवस्था

 


आज के समय में जिस तरह की शिक्षा व्यवस्था बिहार में है, वह किसी हद तक संतोषजनक नहीं हैं। किसी भी राज्य के विकास में शिक्षा का बहुत बड़ा योगदान होता है।वहीं बिहार सरकार हमेशा शिक्षा में सुधार के दावे करती नजर आती है।लेकिन हकीकत क्या है ये भी किसी से छुपी नहीं है।विद्यालय,महाविद्यालय से लेकर यूनिवर्सिटी तक बदहाल स्थिति में है।आज एक बार फिर बिहार की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़ा हो चुका है।मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जनता दरबार में एक लड़का यह कहते हुए नजर आ रहा है कि 'सर मैं बीए पार्ट वन का छात्र हूँ,मैं वीर कुवांर सिंह विश्वविद्यालय,आरा का छात्र हूँ।सर मेरा एडमिशन 2020 का है और मेरा अभी तक पार्ट वन का रिजल्ट नहीं आया है।जब पार्ट का रिजल्ट निकालने में दो साल का समय लग जा रहा है तो बीए पास करते-करते छः साल लग जाएंगे।' पिछले दिनों भी पाटलिपुत्रा यूनिवर्सिटी के छात्र हजारों की संख्या में सड़कों पर उतरे थे लेकिन सरकार के तरफ़ से सिर्फ सांत्वना ही मिला है।


देश के भविष्य बनाने वाले शिक्षक भी कम नहीं हैं।उनका भी एक मामला बापू की कर्मभूमि चंपारण से आया।जहाँ SDO एक विद्यालय में औचक निरीक्षण करने पहुँच गए।पर्यावरण पढ़ा रहे शिक्षक से जलवायु और मौसम में अंतर पूछ लिया।तो मास्टर साहब का मौसम खराब हो गया। हेडमास्टर के कमरे में गए। हेडमास्टर से पूछा, मैं स्कूल जाता हूँ, अंग्रेजी में क्या बोलेंगे अनुवाद करें।तब हेडमास्टर साहब भी जवाब नहीं दे पाए।


यह कटु सत्य है कि सरकारी विद्यालय/महाविद्यालयों में नियमित क्लासेज नहीं हो रही हैं। राज्य के अधिकांशतः उत्क्रमित माध्यमिक विद्यालय व उच्च माध्यमिक विद्यालय शिक्षक विहीन हैं। बावजूद इसके प्रत्येक वर्ष वहाँ से सैकड़ों विद्यार्थी मैट्रिक व इंटरमीडिएट की परीक्षा पास कर रहे हैं। आश्चर्यजनक है कि मध्य विद्यालयों के शिक्षकों के भरोसे उत्क्रमित माध्यमिक विद्यालय चलाए जा रहे हैं।


फिर भी बिहार बोर्ड से पास होने वाले छात्रों की संख्या अन्य बोर्ड के मामले में प्रतिशत अधिक ही रहता है।शिक्षा विभाग भी डुगडुगी पिटती है कि इस साल बिहार बोर्ड से लगभग 80-85% तक पास हुए। यह बात सही भी है कि बिना अध्यापक और बिना अध्यापन के यदि रिजल्ट रेकॉर्ड तोड़  रहता हो तो फिर शिक्षक बहाली की क्या आवश्यकता है?

परीक्षा पास कराने वाले शॉर्टकट से शिक्षा को बेहतर नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में हमारे बच्चे टिक नहीं पाएंगे। विश्व बैंक की 2015 की रिपोर्ट बताती है कि गणित व विज्ञान में हमारे विद्यार्थी कमजोर हैं।


दरअसल बिहार में जो शिक्षक हैं भी तो उनके पास पढ़ाने के लिए समय भी नहीं है। क्योंकि शिक्षकों के पास पढ़ाने के साथ-साथ कई काम हैं।जनगणना करना, जाति गणना करना तो मध्याह्न भोजन बनवाना।ऐसे कई सारे काम में भी उलझ जाते हैं।


राज्य में शिक्षकों के लगभग 2.5 लाख पद खाली हैं। कक्षा 6 से 8 तक के विद्यालयों में शिक्षकों की सबसे अधिक कमी है। राज्य में कोई ऐसा विद्यालय नहीं है, जहां एक साथ सभी विषयों के शिक्षक मौजूद हों। राजधानी पटना के साथ राज्य के लगभग सभी विद्यालयों का हाल ऐसा ही है। टीचरों की कमी से बच्चों को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा नहीं मिल रही है।


एक ओर जहाँ शिक्षकों की घोर कमी है वहीं शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी, एसटीईटी) उत्तीर्ण अभ्यर्थियों की एक बड़ी संख्या सड़कों पर बेरोजगार घुम रही है और लगातार संघर्ष करते हुए पुलिस की लाठियां खा रही है।तो वहीं सरकार रिजल्ट दिखा रही है।


सरकार की दावा की पोल तब खुलती है जब एक सर्वे में बताया गया कि 10% स्कूलों के पास भवन नहीं हैं। 50% में चहारदीवारी नहीं है। 30 % के पास खेल के मैदान हैं। 10 फीसदी के करीब स्कूलों में लड़के या लड़कियों के लिए अलग शौचालय का अभाव है।और जहाँ भवन हैं भी तो वो सिर्फ दिखाने के लिए ही है।क्योंकि भवन कब ध्वस्त हो जायेगा यह कोई नहीं जानता।


सरकार दावा करती है कि शिक्षा के क्षेत्रों में काफी विकास हुआ है लेकिन यह नहीं बताती है कि सरकारी स्कूलों में सभी सुविधाओं के बाद भी बच्चे टिक क्यों नहीं पा रहे हैं? अधिकांश बीच में ही पढ़ाई छोड़ दे रहे।


गुणवतापूर्ण शिक्षा के लिए शिक्षा विभाग, गांव के शिक्षित लोग, संकुल संसाधन केंद्र आदि को पूरी सक्रियता से मिशन की ओर लगना पड़ेगा, तब बदलेगी शिक्षा व्यवस्था तब बिहार देश के अग्रिणी राज्यों में होगा शामिल।


अरुणेश कुमार Arunesh Kumar ✍️

#चंपारण #बिहार #educationsystem

रविवार, 17 अप्रैल 2022

भाजपा कब तक मोदी भरोसे चुनाव जीतती रहेगी?

 हाल ही में पाँच राज्यों का चुनावी नतीजा से साफ साबित होता है कि देश में नरेंद्र मोदी का जलवा कायम है.ये भी सिद्ध हो गया कि पार्टी मोदी के दम पर ही आगे बढ़ रही है.चुनाव का नतीजा साफ-साफ दर्शाता है कि भाजपा में भी क्षेत्रीय नेताओं का कद इतना बड़ा नहीं है कि अपने बूते किसी भी राज्य में सरकार बनवा सके. पंजाब को छोड़ दें तो बाकी के चार राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा में भाजपा की ही सरकार बनी.राजनीतिक पंडितों का मानना था कि लगातार पाँच साल सत्ता में रहने के बाद भाजपा के प्रति लोगों की नाराजगी है इसलिए सरकार बनाने में मुश्किल होगी.ऐसे में सभी प्रदेशों में सरकार बनाना भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी.उत्तर प्रदेश को लेकर भी चुनावी विश्लेषकों का मानना था कि वहां योगी नहीं बल्कि अखिलेश की वापसी होगी.ऐसा दिख भी रहा था क्योंकि यूपी के ब्राह्मण समाज योगी से काफ़ी नाराज़ चल रहे थे.किसान आंदोलन के चलते जाट समुदाय में भी काफी नाराजगी थी.विरोधी दल के नेताओं के द्वारा भी योगी पर जातिवाद का आरोप भी लगाया जा रहा था.ऐसे में चुनाव जीतना ही योगी के लिए सबसे बड़ा चुनौती था.भाजपा के लिए चिंता का विषय भी बना था कि अगर यूपी में भाजपा की हार होती है तो 2024 में प्रधानमंत्री मोदी का राह आसान नहीं होता.

तमाम परिस्थितियों को देखकर प्रधानमंत्री मोदी ने यूपी चुनाव की कमान अपने हाथों में ले ली.मोदी के साथ गृह मंत्री अमित शाह भी मैदान में उत्तर गए.जहां नरेंद्र मोदी एक के बाद एक रैलियां करने लगे वहीं गृहमंत्री जमीन पर उतर के वोट बटोरने लगे.मेरा मानना है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह के मेहनत के बदौलत ही लोगों की नाराजगी दूर हुई और पुनः सत्ता में वापसी का रास्ता साफ हुआ. 

चुनाव के नतीजा भी भाजपा के पक्ष में रहा.हालांकि उत्तराखंड में भाजपा के ही मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी बुरी तरह से चुनाव हार गए.लेकिन इसके बावजूद भी भाजपा सरकार बनाने में कामयाब रही.मणिपुर में भी भाजपा ने 32 सीटों के साथ सरकार बनने में कामयाब रहीं.गोवा में भी पहली बार 20  सीटें जीती.

उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी के चुनाव हारने के बावजूद भी मुख्यमंत्री बनाया गया.वही उत्तर प्रदेश में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य भी बुरी तरह से चुनाव हार गए.इसके बावजूद भी भाजपा ने उन्हें उपमुख्यमंत्री का पद दिया.गोवा में भी युवा चेहरे को आगे रखते हुए दूसरी बार प्रमोद सावंत को मुख्यमंत्री बनाया गया.हालांकि प्रमोद सावंत भी मुश्किल से अपना सीट बचाने में कामयाब हुए थे.

भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लगातार एक के बाद एक चुनाव जीत रही है.सदस्यता के मामले में भी भाजपा सबसे बड़ी पार्टी हो चुकी है.इतना सब कुछ होने के बावजूद भी पार्टी आज भी नरेंद्र मोदी के इर्दगिर्द घूमती है.चाहें वो कोई भी चुनाव हो नरेंद्र मोदी और अमित शाह को उतना ही मेहनत करनी पड़ती है जितना 2014 में किया था.इन दोनों नेताओं के अलावा आज भाजपा में कोई नेता नजर नहीं आता जो अपने दम पर कोई चुनाव जीता सके.कहने के लिए तो भाजपा में नेताओं की कमी नहीं है. कैबिनेट मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक भाजपा में भरें पड़ें हैं लेकिन कोई भी नेता मोदी के जैसा लोकप्रिय नहीं है.भाजपा में भी वैसे नेताओं की कमी नहीं है जो मोदी के नाम पर ही चुनाव जीतते रहें हैं.ऐसे में भाजपा को चाहिए कि सर्वे करा कर उन नेताओं को पार्टी से बाहर के रास्ता दिखाएं जिनका अपना कोई वजूद नहीं सिर्फ मोदी और जातिवाद के नाम पर जीतते रहें हैं.भाजपा को अब युवाओं को आगे बढ़ाना चाहिए.जो आगे चलकर पार्टी का नेतृत्व भी कर सके.



मंगलवार, 5 अप्रैल 2022

कांग्रेस का अध्यक्ष कौन ? गांधी परिवार या गैर-कांग्रेसी

 हाल ही में पाँच राज्यों का चुनावी नतीजे आए हैं।भाजपा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए प्रचंड जीत के साथ सरकार बनाई है।वहीं पंजाब में आम आदमी पार्टी पहली बार जबरदस्त जीत के साथ सरकार बनाई है।इसके साथ देश की सबसे पुरानी पार्टी को करारी हार का सामना पड़ा है।हार का कारण जो हो लेकिन कांग्रेस पार्टी के लिए अच्छी खबर नहीं है।

बीते कुछ विधानसभाओं पर नजर डाले तो कांग्रेस का प्रदर्शन काफ़ी निराशाजनक रहा है।बिहार से लेकर पश्चिम बंगाल और असम तक हर चुनाव में कांग्रेस पतन की ओर बढ़ रही है।इसे देखकर यह कहना उचित होगा कि कांग्रेस का चुनाव हारने का फार्मूला बहुत सफल रहा है।यही बात चुनाव परिणाम आने के बाद बीजेपी के युवा सांसद व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने भी कहा था "चुनाव कैसे हारते हैं ,ये कांग्रेस से सीखना चाहिए"।


दरअसल, कांग्रेस के इतिहास में एक साथ तीन नेता गांधी परिवार से सक्रिय राजनीति में है।ऐसे में पार्टी की ये हालात हो चुकी है कि आए दिन कांग्रेस डूबती जा रही है।पिछले दिनों करारी हार के बाद कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया पार्टी से इस्तीफा की पेशकश कर दी।इस्तीफा देते हुए कहा कि 'अगर हम तीनों यानी सोनिया गांधी ,राहुल गांधी और प्रियंका  गांधी से दिक्कत है तो हम कोई भी त्याग करने को तैयार हैं।हमारा मन बिल्कुल साफ है पार्टी के प्रति, पार्टी से बड़ा कोई नहीं।'

ऐसी प्रतिक्रिया तब आई जब कांग्रेस को 2014 के बाद लगातार हार का सामना करना पड़ रहा है।हालांकि कांग्रेस कमिटी ने अध्यक्ष के चुनाव तक अंतरिम अध्यक्ष बने रहने का अनुरोध किया।इसके साथ ही राजस्थान के मुख्यमंत्री समेत कई कांग्रेसी नेताओं ने राहुल गांधी को फिर से कांग्रेस की कमान संभालने की मांग की।


राजनीतिक पंडितों कहना है कि पार्टी अंदर की राजनीति से जब तक उबड़ नहीं पायेगी तब तक कांग्रेस पार्टी में अध्यक्ष पद का चुनाव नहीं होता।पार्टी के ही कुछ नेता जो राहुल और प्रियंका के समर्थन में मीडिया में बयान देते रहे हैं।यानी उनका कहना है कि कांग्रेस पार्टी का कमान इन दोनों के हाथ में होगा तो पार्टी बेहतर कर पायेगी।कार्यकर्ताओं में हिम्मत बढ़ेगी।

लेकिन राहुल गाँधी के राजनीति की बात करें तो उनका राजनीति ट्विटर से आगे नहीं बढ़ पाता।राहुल गांधी 2019 के  लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया था लेकिन इसके बावजूद भी पार्टी के कड़े निर्णय लेते नजर आए।जैसे पंजाब में मुख्यमंत्री बदलना और सिद्धू को प्रदेश अध्यक्ष बनाना ही पार्टी को डूबा दिया।

वहीं प्रियंका गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में सबसे करारी हार का सामना करना पड़ा।




हालांकि सच्चाई यहीं है कि सोनिया गांधी हो या कांग्रेस पार्टी के सदस्य सभी चाहते हैं कि राहुल गांधी को ही अध्यक्ष बनाना लेकिन पाँच राज्यों में करारी हार के बाद पार्टी का शीर्ष नेतृत्व व गांधी परिवार ही सवालों के घेरे में है।साथ ही एक साथ दो सवाल पार्टी में चल रही है।पहला राहुल गांधी को अध्यक्ष कैसे बनाया जाए? दूसरा, पार्टी को कैसे बचाया जाए?


शनिवार, 29 जनवरी 2022

आम बजट

इस बार लगातार तीसरा साल होगा जब कोरोना संकट के बीच एक फरवरी को आम बजट आएगा। हालांकि पिछले दो सालों के मुकाबले हालात इस बार उतने खराब नहीं हैं। पर यह कहना भी सही नहीं होगा कि अर्थव्यवस्था संकट से निकल चुकी है। पिछले दो साल में अर्थव्यवस्था ने जिस तरह की भारी गिरावट झेली है, उद्योग-धंधे चौपट हुए हैं और उत्पादन गिरा है, उसका असर लंबे समय तक बने रहने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। 

सरकार की प्राथमिकता अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की है। ऐसे में इस बार भी सरकार बजट में ऐसे कदमों को ही प्राथमिकता दे सकती है जो अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने वाले हों। इसके लिए ढांचागत परियोजनाओं पर खर्च करने पर जोर देना पड़ेगा। इधर उद्योग जगत पहले ही करों में राहत से लेकर दूसरी रियायतों की मांग कर रहा है। वहीं छोटे और मझोले उद्योग अभी तक भी महामारी से उपजे संकट से उबर नहीं पाए हैं। इसलिए देखने की बात यह होगी कि सरकार अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले एमएसएमई क्षेत्र के लिए क्या बड़े कदम उठाती है।



बजट पर हर किसी की निगाहें इसलिए भी टिकी होती हैं कि कहीं कुछ मिल जाने की उम्मीद रहती है, चाहे व्यापारी हों या फिर आम आदमी। जहां तक सवाल है आम आदमी का, तो वह ऐसा बजट चाहता है जिसमें कर रियायतें हों, महंगाई बढ़ाने वाला न हो और बचत बढ़ाने वाला हो। आज आम आदमी जिन मुश्किलों से जूझ रहा है, उसमें बजट से उम्मीदें और बढ़ जाना कोई गलत नहीं है। पिछले दो सालों में महामारी से पैदा हालात ने आम आदमी की जेब पर बुरा असर डाला है। बचत तो दूर की बात, रोजाना का खर्च चलाना लोगों को भारी पड़ रहा है।

शनिवार, 18 सितंबर 2021

104 फीट ऊंचा 400 फीट परिधि वाला विश्व का सबसे ऊंचा स्तूप ,सरकारी उपेक्षा का शिकार

 

विश्व का सबसे ऊँचा स्तूप है केसरिया बौद्ध स्तूप :

केसरिया बौद्ध स्तूप की ऊंचाई आज 104 फीट है और इसकी परिधि लगभग 400 फीट है।
इसलिए इसे विश्व का सबसे ऊंचा स्तूप होने का गौरव प्राप्त है।इस बेहतरीन ढाँचा को भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा साल 1998 में खोजा गया था।
बौद्ध स्तूप में लगी ईटें मौर्य कालीन है। सभी मूर्तियां विभिन्न मुद्राओं में है। 1861-62 में इस स्तूप के संबंध में कर्निघम ने लिखा हैं कि केसरिया का यह स्तूप 200 ईसा से 700 ईसा के मध्य बना है। चीनी यात्री फाहियान के अनुसार केसेरिया के देउरा स्थल पर भगवान बुद्ध अपने महापरिनिर्वाण के ठीक पहले वैशाली से कुशीनगर जाने वक्त एक रात का विश्राम किया था। तथा साथ आये वैशाली के भीक्षुओं को अपना भीक्षा पात्र प्रदान कर कुशीनगर के लिए प्रस्थान किया था।

बौद्ध स्तूप की हालत दिन पर दिन ख़राब होते जा रहा है

दुनिया में भारत को पहचान दिलाने वाला बिहार के चंपारण के केसरिया बौद्ध स्तूप की हालत दिन पर दिन ख़राब होती जा रही है।बौद्ध स्तूप धीरे-धीरे खंडहर में बदलते जा रहा है।लेकिन सरकार की ध्यान अब तक नहीं पड़ा।पिछले कई सालों से इस स्तूप को बनाने के लिए सरकार से मांग की जा रही है।लेकिन सिर्फ समय बदल जाता है स्तूप की हालत बद से बदत्तर होती जा रही है।

बौद्ध स्‍तूप का बाढ़ के पानी से घिरना हर साल की समस्‍या है। पिछले साल भी स्‍तूप के प्रांगण में बाढ़ का पानी आ गया था। पानी के दबाव के कारण स्तूप के एक भाग की चारदीवारी भी गिर गई थी।

फिलहाल इस बौद्ध स्तूप की काफी जर्जर हो चुकी है,स्तूप के चारों तरफ जलजमाव है।पानी के बीचों बीच दुनिया के सबसे ऊंचा बौद्ध स्तूप विकास की उम्मीद लगाए बैठा है लेकिन अब तक विकास नहीं हो पाया।

युवाओं ने ट्वीट पर ट्रेंड  गया

पिछले कुछ दिनों में बिहार की युवा शक्ति भी एक जुटता दिखाते हुए ट्विटर पर #save_kesariyabaudhstupa ट्रेंड कराया था।राजद ने भी अपने अधिकारिक ट्विटर हैन्डल से इसके समर्थन में ट्वीट किया था।हालाकिं इस मुहिम को केसरिया विधायक शालिनि मिश्रा के अलावा क्षेत्र के किसी अन्य नेता का सहयोग नहीं मिला।  पूर्वी चंपारण संसदीय क्षेत्र से सांसद पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह और  जिले के अन्य 11 विधायकों ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली। भाजपा बिहार के वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष और पश्चिमी चंपारण के सांसद संजय जायसवाल ने भी इसको लेकर कोई आवाज़ नहीं उठाया।

वर्तमान डीएम और केसरिया विधायक स्तूप के विकास के लिए प्रयासरत

जिले के वर्तमान डीएम शीर्षत कपिल अशोक ने
बौद्ध स्तूप के सौंदर्यीकरण को लेकर कदम उठाये है। स्तूप के आसपास पानी लगने की समस्या के निराकरण और स्तूप तक जाने वाले पथ का निर्माण हेतु भूमि अधिग्रहण का कार्य पूर्ण हो गया है।
शालिनि मिश्रा बिहार विधानसभा में बौद्ध स्तूप को लेकर अपनी आवाज़ भी उठाई थी लेकिन इसके बावजूद भी अब तक विकास नहीं हो पाया।


सोमवार, 26 जुलाई 2021

सोशल मीडिया : लघुकथा

 अरे चाचा ! आपके कलम में तो जादू है जादू। कविता, कहानी,शायरी ,चुटकुले सब- कुछ कितना सुंदर लिखते हैं।

आपको तो 'सोशल मीडिया' पर लिखना चाहिए ताकि  लाखों लोगों के पास आपकी लेखनी पहुँच सके।

दरअसल, पहली बार भतीजा रोहण शहर से अपने गांव चाचा से मिलने आया था।चाचा रमेश अपनी डायरी पलटते हुए रोहण से पूछा ये बताओ सोशल मीडिया क्या होता? 

चाचा सोशल मीडिया पर आप कोई भी बात विचार लिख सकते हैं ,पढ़ सकते हैं ,आप अपने पसन्द के दोस्तों को जोड़ सकते हैं,कविता, कहानी लिखकर डाल सकते हैं ताकि देश के अन्य लोग भी पढ़ सकेंगे।

बेटा रोहण अब ये कैसे लिखेंगे, कैसे डालेंगे ये सब मुझे समझ में नहीं आता है?

नहीं आता तो क्या हुआ मैं हूँ न ,मैं सिखाऊंगा ?, कुछ ही दिनों में रोहण ने चाचा को फेसबुक पर पोस्ट करना और ब्लॉग लिखना सीखा दिया।फिर रोहण ने चाचा के लिए सोशल साइट पर एकाउंट बना दिया।

अब हर रोज रमेश अपने ब्लॉग पर और फेसबुक पर कविता ,कहानी लिखता है।धीरे-धीरे लाखों लोग रमेश के वॉल पर आ गए। ढ़लती उम्र के इस पड़ाव पर चाचा रमेश को एक नई पहचान मिल गई।

शुक्रवार, 9 जुलाई 2021

पडरौना से वाल्मीकिनगर की यात्रा

 


कोरोना महामारी के साथ लोगों की जिंदगी में आए बदलावों में वर्क फ्रॉम होम एक अहम हिस्सा है. वर्क फ्रॉम होम कोविड-19 से पहले भी मौजूद था, लेकिन महामारी के आने पर सोशल डिस्टैंसिंग की जरूरत की वजह से यह लोगों के लिए अनिवार्य हो गया. भारत में यह मार्च 2020 से ज्यादातर सरकारी और निजी कर्मचारी अपने दफ्तर का काम घर से ही कर रहे हैं. शुरुआत में, वर्क फ्रॉम होम को ज्यादातर लोगों ने पसंद किया.लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया वर्क फ्रॉम होम सर दर्द बनता गया. क्योंकि जब हम काम नहीं कर रहे होते हैं तो घर पर समय व्यतीत करने में कभी परेशानी नहीं होती है. लेकिन जब हम काम घर से कर रहे होते हैं तो घर पर रहना परेशानी का सबब बनते जाता है. ऐसे में काम से जब भी छुट्टी मिलती है तो हम सीधे कहीं न कहीं घूमने को सोचते हैं.


हम जहाँ रहते हैं वहां से घूमने के लिए कुशीनगर जा सकते हैं. जो मेरे यहाँ से लगभग 25 km की दूरी पर है लेकिन कोरोनाकाल में सब कुछ बंद होने की वजह से वहां जाना नामुमकिन है. लेकिन मेरे यहाँ से दूरी कम होने के कारण  बिहार जाना भी ज्यादा आसान है. पडरौना से वाल्मीकि नगर जाने के लिए दो रास्ते हैं. एक तरफ से 65 km तो दूसरा 95 km. हम दोनों रास्ते से जा सकते हैं लेकिन बारिश के मौसम होने के वजह से सड़क जर्जर हो चुकी है इसलिए मैं फिलहाल 95km वाला मार्ग को चुनता हूँ.वाल्मीकि नगर जाने में तकरीबन 2 घण्टे लगते हैं.सड़क कहीं ज्यादा खराब है तो कहीं कम.अभी बारिश के समय में कहीं कहीं सड़क के ऊपर से पानी का बहाव देखने को मिलता है.अब हम बगहा पहुँचते हैं,तो देखते हैं कि बहुत जगह सड़क के ऊपर से पानी बहने लगता है.देख कर डर भी लगता है।मन ही मन सोचने लगता हूँ.क्या इस समय वाल्मीकि नगर जाना सही था या नहीं? क्या हमें यही से लौट जाना चाहिए? 

वहां से थोड़ा सा आगे बढ़ते हैं तो एक रेलवे स्टेशन आता है 'वाल्मीकि नगर रोड'. वहां से लगभग 6-7km तक सिंगल मेन रोड था जहाँ से दूसरी गाड़ी को साइड देना भी मुश्किल ही लग रहा था क्योंकि दोनों तरफ पानी ही पानी नजर आ रहा था. फिर मन ही मन सोचता हूँ कि अगर और आगे जाऊंगा तो कहीं और ख़राब दौर से गुजरना न पड़े।हालांकि मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ते जाता हूँ. थोड़ी दूर जाने के बाद पता चलता है कि आगे सड़क काफी अच्छी है और दोनों तरफ जंगल.साथ ही तराई का इलाका. प्रकृति का सुंदर दृश्य देखकर मन प्रफुल्लित हो गया.कुछ दूर चलने के बाद वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से संबंधित सूचना बोर्ड दिखायी देने लगे थे।जंगली जानवरों से संबंधित सूचनाएं मिलने लगी थीं।


वाल्मीकि नगर :


 वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान पश्चिमी चंपारण में शिवालिक पर्वत श्रेणी के बाहरी सीमा में स्थित है।यह राष्ट्रीय उद्यान मुख्य रूप से लुप्तप्राय प्राणियों का आवास है जैसे की चीता। यह अभयारण्य पूरी तरह से हरियाली से आच्छादित है।

900 गज में फैला वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना वर्ष 1990 में हुई थी। यह पार्क उत्तर में नेपाल के रॉयल चितवन नेशनल पार्क और पश्चिम में हिमालय पर्वत की गंडक नदी से घिरा हुआ है।यहां पर आप बाघ, स्‍लॉथ बीयर, भेडिए, हिरण, सीरो, चीते, अजगर, पीफोल, चीतल, सांभर, नील गाय, हाइना, भारतीय सीवेट, जंगली बिल्लियां, हॉग डीयर, जंगली कुत्ते, एक सींग वाले राइनोसिरोस तथा भारतीय भैंसे कभी कभार चितवन से चलकर वाल्‍मीकि नगर में आ जाते हैं। इस उद्यान में आप चीतल, काला हिरण, फिशिंग कैट्स, तेंदुए आदि भी देख सकते हैं।


हालांकि कोरोना के वजह से जंगल तो बंद है।अंदर घूमने की अनुमति नहीं मिलती है।फिर यहां से लगभग ढाई किलोमीटर पैदल चलने के बाद जटाशंकर मंदिर पहुँचते हैं,वहां घूमने के बाद हम वापस चले जाते हैं।क्योंकि गर्मी बहुत ज्यादा थी और साथ में छोटी बच्ची भी थी जो रोने लगती  है।तब हम सभी वही पर खाना खाते हैं और वापस चले आते हैं।खाना घर से ही लाये थे क्योंकि कोरोना के वजह से बाहर का खाना खाना सुरक्षित नहीं है।हम सभी कोरोना गाइडलाइंस को फॉलो करते हुए घूम रहे थे लेकिन यहां हमें कोई नहीं मिला जो फॉलो कर रहे हों सिर्फ हमारे सिवा।



वाल्मीकि नगर टूरिज्म के हिसाब से बहुत अच्छा जगह है. लेकिन उतना विकास नहीं हो सका है जितना होना चाहिए था.इसे बिहार का कश्मीर भी कहा जाता है.इस समय नदी में पानी बहुत ज्यादा थी,पानी का बहाव ज्यादा तेज थी. नदी के उस पार नेपाल दिख रही थी.रास्ता भी दिख रही थी लेकिन रास्ता बंद होने की वजह से वहां नहीं जा सका.

शुक्रवार, 25 जून 2021

आपातकाल का इतिहास

 

25 जून 1975, भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में इस दिन को देश के सबसे दुर्भाग्यपूर्ण दिन की संज्ञा दी जाती है. 46 साल पहले आज के ही दिन देश के लोगों ने रेडियो पर एक ऐलान सुना और पूरे देश में खबर फैल गई कि सारे भारत में अब आपातकाल की घोषणा कर दी गई है. 46 साल के बाद भले ही देश के लोकतंत्र की एक गरिमामयी तस्वीर सारी दुनिया में प्रशस्त हो रही हो, लेकिन आज भी अतीत में 25 जून का दिन डेमॉक्रेसी के एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है. 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 के बीच देश में 21 महीने तक आपातकाल लगाया गया. तत्कालीन राष्ट्रपति फख़रुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के अधीन देश में आपातकाल की घोषणा की थी. 25 जून और 26 जून की मध्य रात्रि में तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के हस्ताक्षर करने के साथ ही देश में पहला आपातकाल लागू हो गया था. अगली सुबह समूचे देश ने रेडियो पर इंदिरा की आवाज में संदेश सुना था, 'भाइयो और बहनो, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है. इससे आतंकित होने का कोई कारण नहीं है.'

अभिव्यक्ति का अधिकार तो छिना ही जीवन का अधिकार तक गया
आपातकाल की घोषणा के साथ ही सभी नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे. अभिव्यक्ति का अधिकार ही नहीं, लोगों के पास जीवन का अधिकार भी नहीं रह गया था. 25 जून की रात से ही देश में विपक्ष के नेताओं की गिरफ्तारियों का दौर शुरू हो गया था. जयप्रकाश नारायण, लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी, जॉर्ज फर्नाडीस आदि बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया गया था. जेलों में जगह नहीं बची थी. आपातकाल के बाद प्रशासन और पुलिस के द्वारा भारी उत्पीड़न की कहानियां सामने आई थीं. प्रेस पर भी सेंसरशिप लगा दी गई थी. हर अखबार में सेंसर अधिकारी बैठा दिया गया, उसकी अनुमति के बाद ही कोई समाचार छप सकता था. सरकार विरोधी समाचार छापने पर गिरफ्तारी हो सकती थी. यह सब तब थम सका, जब 23 जनवरी 1977 को मार्च महीने में चुनाव की घोषणा हो गई.

न्यायपालिका से टकराव बना आपातकाल की पृष्ठभूमि
लालबहादुर शास्त्री की मौत के बाद देश की प्रधानमंत्री बनीं इंदिरा गांधी का कुछ कारणों से न्यायपालिका से टकराव शुरू हो गया था. यही टकराव आपातकाल की पृष्ठभूमि बना था. आपातकाल के लिए 27 फरवरी, 1967 को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने बड़ी पृष्ठभूमि तैयार की. एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सुब्बाराव के नेतृत्व वाली एक खंडपीठ ने सात बनाम छह जजों के बहुमत से से सुनाए गए फैसले में यह कहा था कि संसद में दो तिहाई बहुमत के साथ भी किसी संविधान संशोधन के जरिये मूलभूत अधिकारों के प्रावधान को न तो खत्म किया जा सकता है और न ही इन्हें सीमित किया जा सकता है.

रायबरेली चुनाव निरस्त होने से खफा हो गई थीं इंदिरा गांधी
1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी ने अपनी पार्टी को अभूतपूर्व जीत दिलाई थी और खुद भी बड़े अंतर से जीती थीं. खुद इंदिरा गांधी की जीत पर सवाल उठाते हुए उनके चुनावी प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने 1971 में अदालत का दरवाजा खटखटाया था. संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर इंदिरा गांधी के सामने रायबरेली लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ने वाले राजनारायण ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया है. मामले की सुनवाई हुई और इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त कर दिया गया. इस फैसले से आक्रोशित होकर ही इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाने का फैसला किया. इंदिरा गांधी इतना क्रोधित हो गई थीं कि अगले दिन ही उन्होंने बिना कैबिनेट की औपचारिक बैठक के आपातकाल लगाने की अनुशंसा राष्ट्रपति से कर डाली, जिस पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने 25 जून और 26 जून की मध्य रात्रि में ही अपने हस्ताक्षर कर डाले और इस तरह देश में पहला आपातकाल लागू हो गया.

आपातकाल में हर कदम पर संजय के साथ थीं मेनका
इंदिरा गांधी के प्राइवेट सेक्रेटरी रहे दिवंगत आरके धवन ने कहा था कि सोनिया और राजीव गांधी के मन में आपातकाल को लेकर किसी तरह का संदेह या पछतावा नहीं था. और तो और, मेनका गांधी को आपातकाल से जुड़ी सारी बातें पता थीं और वह हर कदम पर पति संजय गांधी के साथ थीं. वह मासूम या अनजान होने का दावा नहीं कर सकतीं. दिवंगत आरके धवन ने यह खुलासा एक न्यूज चैनल को दिए गए इंटरव्यू में किया था. धवन ने बताया था कि पश्चिम बंगाल के तत्कालीन सीएम एसएस राय ने जनवरी 1975 में ही इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाने की सलाह दी थी. आपातकाल की योजना तो काफी पहले से ही बन गई थी. धवन ने बताया था कि तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को आपातकाल लागू करने के लिए उद्घोषणा पर हस्ताक्षर करने में कोई आपत्ति नहीं थी. वह तो इसके लिए तुरंत तैयार हो गए थे. धवन ने यह भी बताया था कि किस तरह आपातकाल के दौरान मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाकर उन्हें निर्देश दिया गया था कि आरएसएस के उन सदस्यों और विपक्ष के नेताओं की लिस्ट तैयार कर ली जाए, जिन्हें अरेस्ट किया जाना है. इसी तरह की तैयारियां दिल्ली में भी की गई थीं.

पहले इस्तीफा देने को तैयार थीं इंदिरा
धवन ने कहा था कि आपातकाल इंदिरा के राजनीतिक करियर को बचाने के लिए नहीं लागू किया गया था, बल्कि वह तो खुद ही इस्तीफा देने को तैयार थीं. जब इंदिरा ने जून 1975 में अपना चुनाव रद्द किए जाने का इलाहाबाद उच्च न्यायालय का आदेश सुना था, तो उनकी पहली प्रतिक्रिया इस्तीफे की थी और उन्होंने अपना त्यागपत्र लिखवाया था. उन्होंने कहा था कि वह त्यागपत्र टाइप किया गया लेकिन उस पर हस्ताक्षर कभी नहीं किए गए. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी उनसे मिलने आए और सबने जोर दिया कि उन्हें इस्तीफा नहीं देना चाहिए



मंगलवार, 15 जून 2021

चिराग के खिलाफ हुए 5 सांसद

 

लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के छह लोकसभा सदस्यों में से पांच ने, दल के मुखिया चिराग पासवान को संसद के निचले सदन में पार्टी के नेता के पद से हटाने के लिए हाथ मिला लिया है और उनकी जगह उनके चाचा पशुपति कुमार पारस को इस पद के लिए चुन लिया है।

वहीं, पारस ने सोमवार को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सराहना करते हुए उन्हें एक अच्छा नेता तथा ‘‘विकास पुरुष’’ बताया और इसके साथ ही पार्टी में एक बड़ी दरार उजागर हो गई क्योंकि पारस के भतीजे चिराग पासवान जद (यू) अध्यक्ष के धुर आलोचक रहे हैं।

हाजीपुर से सांसद पारस ने कहा, ‘‘ मैंने पार्टी को तोड़ा नहीं, बल्कि बचाया है।’’ उन्होंने कहा कि लोजपा के 99 प्रतिशत कार्यकर्ता पासवान के नेतृत्व में बिहार 2020 विधानसभा चुनाव में जद (यू) के खिलाफ पार्टी के लड़ने और खराब प्रदर्शन से नाखुश हैं।

पारस ने कहा कि उनका गुट भाजपा नीत राजग सरकार का हिस्सा बना रहेगा और पासवान भी संगठन का हिस्सा बने रह सकते हैं।

चिराग पासवान के खिलाफ हाथ मिलाने वाले पांच सांसदों के समूह ने पारस को सदन में लोजपा का नेता चुनने के अपने फैसले से लोकसभा अध्यक्ष को अवगत करा दिया है। हालांकि पारस ने इस संदर्भ में कोई टिप्पणी नहीं की।

पारस के पत्रकारों से बात करने के बाद चिराग पासवान राष्ट्रीय राजधानी स्थित उनके चाचा के आवास पर उनसे मिलने पहुंचे। पासवान के रिश्ते के भाई एवं सांसद प्रिंस राज भी इसी आवास में रहते हैं।

पारस और प्रिंस के आवास पर करीब 90 मिनट तक रुकने के बाद पासवान वहां से मीडिया से बात किए बिना ही चले गए। ऐसा माना जा रहा है कि दोनों असंतुष्ट सांसदों में से उनसे किसी ने मुलाकात नहीं की। एक घरेलू सहायक ने बताया कि पासवान जब आए तब दोनों सांसद घर पर मौजूद नहीं थे।

सूत्रों ने बताया कि असंतुष्ट लोजपा सांसदों में प्रिंस राज, चंदन सिंह, वीना देवी और महबूब अली कैसर शामिल हैं, जो चिराग के काम करने के तरीके से नाखुश हैं। 2020 में पिता रामविलास पासवान के निधन के बाद लोजपा का कार्यभार संभालने वाले चिराग अब पार्टी में अलग-थलग पड़ते नजर आ रहे हैं।

उनके करीबी सूत्रों ने जनता दल (यूनाइटेड) को इस विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि पार्टी लंबे समय से लोजपा अध्यक्ष को अलग-थलग करने की कोशिश कर रही थी क्योंकि 2020 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ जाने के चिराग के फैसले से सत्ताधारी पार्टी को काफी नुकसान पहुंचा था।

 


शुक्रवार, 11 जून 2021

बिखरता कुनबा

 वैसे तो कांग्रेस पार्टी हमेशा सुर्खियों में रहती है,लेकिन इस बार राहुल गांधी के करीबी रहे जितिन प्रसाद के भाजपा में शामिल होने से यह फिर से चर्चा आई है।उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ऐन पहले जितिन प्रसाद का पार्टी छोड़ना भाजपा के लिए फायदेमंद होगा, उससे कहीं ज्यादा  कांग्रेस केलिए नुकसानदेह हो सकता है।आये दिन कांग्रेस के नेतागण पार्टी छोड़कर जा रहे हैं, जिससे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर सवाल उठना लाजिमी है।ज्योतिरादित्य सिंधिया के बाद जितिन प्रसाद का जाना राहुल गांधी के लिए बहुत बड़ा झटका है।अब तो राजस्थान कांग्रेस का भी विवाद फिर से सुर्खियों में है और पंजाब में मुख्यमंत्री और नवजोत

सिंह सिद्धू आमने- सामने हैं।इन सबसे पता चलता है कि कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं है और उसके अन्दरखाने का विवाद  पूरी तरह से सतह पर आ चुका है।देखना अब यह है कि पार्टी अपना कुनबा कितना संभाल सकती है? बेहतर होगा कि शीर्ष नेतृत्व इसको लेकर संजीदगी दिखाए।


गुरुवार, 10 जून 2021

हाशिये पर कांग्रेस

 ऐसे तो कांग्रेस पार्टी हमेशा सुर्खियों में रहती है।लेकिन इस बार राहुल गांधी के करीबी रहें जितिन प्रसाद के बीजेपी शामिल होने के बाद सुर्खियों में है।यूपी विधानसभा चुनाव से पहले जितिन प्रसाद का जाना भाजपा के लिए जितना फायदा होगा उससे ज्यादा कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।आये दिन कांग्रेस पार्टी के एक के बाद एक नेता पार्टी छोड़कर जा रहे हैं ऐसे में शीर्ष नेतृत्व पर सवाल उठना लाजिमी है।ज्योतिरादित्य सिंधिया के बाद जितिन प्रसाद का जाना राहुल गांधी के लिए सबसे बड़ा झटका है।अब तो राजस्थान कांग्रेस में भी विवाद फिर से सुर्खियों में है।राहुल गांधी के करीबी सचिन पायलट भी नाराज चल रहे हैं।उधर पंजाब में भी मुख्यमंत्री और सिद्दू आमने-सामने हैं। इससे पता चलता है कि कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं है।कांग्रेस की परेशानी साफ दिखाई दे रही है।इतनी परेशान तो कांग्रेस कभी नहीं थी आज इस हालत में हो चुकी है कि अभी तक अपना अध्यक्ष का चुनाव भी नहीं करा पा रही है। क्या पता जून में होगा भी या नहीं ये कहना मुश्किल है? क्योंकि जिस प्रकार से नेतृत्व कांग्रेस कर रही है ये विचारणीय तो है ही।लगातार कांग्रेस कमजोर होती नजर आ रही है।हाल ही में लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद राहुल गांधी ने यह कहते हुए अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था कि अब गांधी परिवार से बाहर से कोई अध्यक्ष पद केलिए चयनित होगा।लेकिन आखिर में फिर से सोनिया गांधी को बना दिया गया।उसके बाद भी माना जा रहा था कि यह चुनाव कुछ समय केलिए ही की गई है,पर अब एक साल से ज्यादा हो चुकी है लेकिन अब तक कुछ हुआ नहीं।

ऐसा देखा गया है कि जो नेता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर सवाल करता है या गांधी परिवार से बाहर के नेता को अध्यक्ष बनाने की बात करता है वो या तो पार्टी से बाहर चला जाता है या वो पार्टी के नजरों में आ जाता है।

जहाँ तक जितिन प्रसाद की बात है तो वो एक समय में मनमोहन सिंह के सरकार में मंत्री हुआ करते थे लेकिन पिछले दो चुनाव में खुद अपना शीट नहीं बचा सके थे।बताया जा रहा है कि जब से उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी सक्रिय हुई है उसके बाद से ही जितिन प्रसाद हाशिये पर चले गए थे।अब सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अपने नेताओं को बचा पायेगी या ऐसे ही पार्टी के नेता जाते रहेंगे और कांग्रेस हाथ पर हाथ रख के सोयी रहेगी या कोई स्थायी समाधान निकालने में सफल रहेगी।

कांग्रेस के लिए बेहतर होगा कि नेतृत्व को मजबूत करें और यही भी समझे कि इन सबका जिम्मेदार वह स्वयं खुद है।



रविवार, 6 जून 2021

बिहार के अनपढ़ महिला के मुख्यमंत्री बनने की कहानी दिखाती है 'महारानी,

 महारानी वेब सीरीज में एक अनपढ़ ग्रामीण महिला का किरदार निभा रही हैं, जिन्हें बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया जाता है।जिसको कहा जा रहा है कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी पर फिल्माया गया है।लेकिन मेरे नजर में 'महारानी' वेब सीरीज़ में लालू यादव-राबड़ी देवी की कहानी नहीं है, लेकिन उनकी जैसी राजनीति को क़रीब से दिखाने का प्रयास किया गया है। राबड़ी देवी ने अपने शासनकाल में किस तरह बिहार की राजनीति को प्रभावित किया, क्या बेहतर किया, क्या बर्बाद किया, यह सब समझना और जानना चाहते हैं तो वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक अनुरंजन झा की किताब गांधी मैदान पढ़ना चाहिए।

अभिनेत्री हुमा कुरैशी ने ‘महारानी’ सीरीज में ‘रानी भारती’ की भूमिका निभाई है।रानी भारती बिहार के एक गांव की  अनपढ़ साधारण औरत है और गाय,भैंस ,बकरी पाल कर अपना जीवन यापन करती है।हालांकि उसके पति बिहार राज्य के मुख्यमंत्री हैं।रानी भारती के जीवन में एक ऐसा  मोड़ आता है कि उसके पति को गोली मार दिया जाता है अचानक तबियत बिगड़ने लगती है।इसके बाद उस अनपढ़ महिला को मुख्यमंत्री बनाया जाता है।जो राजनीति को भी नहीं समझती है।हालांकि धीरे-धीरे राजनीति को भी समझती है और भ्रष्टाचार पर भी नकेल कसने की कोशिश भी करती है।पशुपालन जैसे तमाम घोटाले को उजागर भी करती है और अपने पति यानी पूर्व मुख्यमंत्री को जेल भी भेजवाती है।

अभिनेत्री का अभिनय काबिलेतारीफ है।जैसे किरदार है हूबहू उतारने का प्रयास की है।ठेठ बिहारी के रूप में जो अभिनय किया है वो देखने लायक है।बाकी कलाकारों ने भी कमाल का अभिनय किया है।

सीरीज की डायलॉग की बात करें तो डायलॉग एक से एक है एक डायलॉग जो मुझे काफी पसंद आई और याद भी है।जिसमें रानी भारती कहती है -"आप अपनी पत्नी से मिलना चाहेंगे, तो मैं मिलूंगी, अगर सीएम से मिलना चाहेंगे तो रानी भारती से मुलाकात होगी"।इस सीरीज की डायलॉग एक मजबूत कड़ी है।

अगर हम इस सीरीज की कमी की बात करें तो कई जगह खामियां नजर आई।कहीं कहीं कहानी को खींचने का प्रयास किया गया है जिसको थोड़ा कम करके भी दिखाया जा सकता था।सीरीज के बीच में एक बाबा को प्रवेश कराया जाता है जिसकी आवश्यक ही नहीं थी।

अंत में बस यहीं कहेंगे, सब कुछ नजरअंदाज करके थोड़ा समय महारानी सीरीज को दे दीजिए, राजनीति भी समझ जाएंगे, एंटरटेनमेंट भी हो जाएगा और कोरोना काल में एक शानदार सीरीज भी देख लेंगे और हाँ गांधी मैदान जरूर पढ़ें।



गुरुवार, 3 जून 2021

तीसरी लहर का डर

 कोरोना की पहली लहर और दूसरी लहर के बाद अब तीसरी लहर की चर्चा जोरों पर है।वैज्ञानिक अभी से ही कमर कसने की बात कर रहे हैं। वाकई, आग लगने पर कुआं खोदने से बेहतर होगा अविलंब तीसरी लहर के खिलाफ आगे की रणनीति बना लेनी चाहिए।तीसरी लहर में बच्चों के संक्रमित होने की आशंका सबसे ज्यादा जताई जा रही है।इसका ख़ास ध्यान रखकर पूरी योजना बना लेनी चाहिए,तब ही हम इस तीसरी लहर से सामना कर सकते हैं। अब सरकार को भी शिक्षा और स्वास्थ्य पर बजट बढ़ा देनी चाहिए।अगर हमारा समाज शिक्षित होगा तब ही इस अदृश्य वायरस से लड़ने में कामयाब हो सकते हैं।


अरुणेश कुमार, चंपारण (मोतिहारी)